Social Activities

आसाराम बापू की समाज सेवा विश्व वंदनीय है


आसाराम बापू की समाज सेवा विश्व वंदनीय है

Asaram Bapuji

कौन कहता है कि बापू जी गुनाहगार हैं ? आसाराम बापू जी की   समाज सेवा की सूचि  तो इतनी लंबी है कि बयान करना मुश्किल है :

• ये सत्संग आयोजित करते है जिसमे व्यक्ति की घरेलू, रोजी-रोजगार तथा सामाजिक और धार्मिक समस्याओं से निपटने के उपाय बताये जाते हैं जिससे व्यक्ति को सुख-शांति मिलती है !

• ये सत्संग में आये लोगों को शराब-कबाब और दूसरे प्रकार के नशों से मुक्ति पाने के उपाय बताते हैं जिससे लोग नशा मुक्त हो स्वस्थ और सुखी जीवन जीते हैं !

• ये सत्संग में ध्यान-योग शिविरों का आयोजन करते हैं जिस मे तन और मन को स्वस्थ रखने के उपाय बताये जाते हैं जिस से लोग तन से स्वस्थ और मन से प्रसन्न रहते हैं !

• ये बच्चों और बड़ों को गुरु-दीक्षा देकर ऐसे मन्त्र और उपाय बताते हैं जिससे बच्चे शिक्षा के क्षेत्र तरक्की करते हैं और बड़े लौकिक और अलौकिक क्षेत्र में तरक्की करते हैं !

• इनके मार्गदर्शन में देशभर में 17000 से ज्यादा बाल-संस्कार केन्द्र चलते हैं जिस मे बच्चों को स्कूली शिक्षा के अलावा नैतिक, धार्मिक और संस्कारी शिक्षा दी जाती है जिस से इन मे बड़ों के प्रति सम्मान एवं कर्त्तव्य और देश के प्रति निष्ठा, देशभक्ति और संस्कृति अपनाने का भाव विकसित होता है ऐसे बच्चे ही आगे चलकर देश के आदर्श नागरिक बनते हैं !

• इनके देश-विदेश के सैकड़ों आश्रमों में भजन-कीर्तन और सत्संग आदिके द्वारा लोगों को तन-मन-धन से सुखी और संपन्न बनने केसाथ उनके दुर्गुणों और व्यसनों को छुडाने तथा देश भक्त और आदर्श नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर किया जाता है !

• इनकी सेवा समितियां, साधकगण, सेवादार देश में आयी किसी भी प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, भूकंप या तूफ़ान आदि से पीड़ित लोगों की सेवा के लिए अपने बूते पर बिना किसी सरकारी सहायता के पहुँच जाते हैं और पीड़ित लोगों की अन्न, धन, वस्त्र, दवा आदि और हर संभव सेवा करते हैं !

• ये ईसाइयत फैलानेवाली मिशनरियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं और जिन लोगों का जबरन या लालच देकर धर्मपरिवर्तन करवायाजाता हैं उनको वापिस हिंदू-धर्म में लाने का काम करते हैं !

• ये गौ-सेवा करते हैंऔर गौ माता के मांसाहार पर पाबन्दी चाहते हैं ये वध के लिए भेजी जाने वाली गौओं को प्रयास कर अपनी गौशाला में लाकर उसकी सेवा करते हैं और उसके दूध और गौ-मूत्र का सद्पुयोग करके लाखों लोगों को लाभ पहुंचाते हैं !

• इन के मार्गदर्शन और सहायता से कई वैधशालायें चलायी जाती हैं जिन मे लोगों का इलाज नाम मात्र खर्च पर और बड़े और असाध्य रोगों का इलाज तक बिना आपरेशन और साइड इफ्फेक्ट के किया जाता है !

• ये हिंदू धर्म की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं और इस सम्बन्ध में आयोजित सभा-कार्यकर्मों में बढ़-चढ कर तन-मन-धन से सहयोग करते हैं और हिंदू धर्म और संस्कृतिकी रक्षा में काम और विरुद्ध में काम करने वालों से लोहा लेते हैं !

• ये आदिवासीक्षेत्रों के दरिद्र नारायणों के लिए उनके क्षेत्र में रोटी, कपड़ा और मकान का यथा संभव प्रबंध करते हैं और उनको समाज की मुख्य धारा में लाने की भूमिका निभाते हैं !

• ये देश को लुटने वाले और जनता को मूर्ख बनाने वाले नेताओं से लोगों को सावधान करते हैं और घोटाले और कुकर्म करने वाले नेताओं को खरी-खरी बिना डरे-सहमे सुना डालते हैं !

• इनके गुरुकुलों में विद्यार्थियों को बहुत ही वाजिब खर्च पर उच्च शिक्षा संस्कारों सहित निस्वार्थ भाव से प्रदान की जाती है जिस से इन गुरुकुलों के नतीजे बहुत ही अच्छे आतेहैं इससे निजीक्षेत्र के अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों को चलाने वाले ईसाई मिशनरी के लोगों की नींद हराम है जिन्होंने शिक्षा को संस्कार रहित और व्यापार बना रखा है!

• ये सादा जीवन और उच्च विचार का समर्थन करते हैं और देश में स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर ज्यादा जोर देते हैं ताकि देश आत्मनिर्भर हो सके और देश विदेशी कर्ज जाल से मुक्त हो तथा देश की अर्थव्यव्यस्था मजबूत हो तथा देशवासी आर्थिक रूप से संपन्न हों!

बस भाई मेरे तो हाथ थक गए बापूजी के गुनाहों की पोल खोलते-खोलते शायद आप भी पढ़-पढ़ कर थक रहे होंगे इसलिए अब और नहीं लिखता पर धन्यवाद देता हूँ देश के नेताओं, मंत्रियों और शासकों को जो इतने बड़े-बड़े गुनाहों के लिए इस संत को छोटे-मोटे आरोप लगा कर इतने छोटे से जेल में डाल दिया…..कुछ बड़ा सोचो ….और मेरे प्यारे देशवासियों जब तक तुम्हारा घर सुरक्षित है तब तक तुम भी घर में हाथ पर हाथ धरे बैठ कर तमाशा देखो इस संत का…… जिस दिन देश का बेड़ा गर्क हो जाये तब फिर किसी विदेशी की गुलामी में रोना खून के आंसू !

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Chetichand Utsav by Sadhak and Ashram of Sant Asharam Bapu


चेटीचंड महोत्सव निमित्त शरबत वितरण,फल वितरण,जल वितरण,चना वितरण सेवा संत श्री आशाराम बापूजी के प्यारे साधकों ने की |

चेटीचंड महोत्सव निमित्त सेवा

संत श्री आशाराम बापूजी की प्रेरणा से रायपुर छ.ग.में साधक परिवार

द्वारा शीतल जल सेवा गुरुनानक चौक पर ,ऐसे आयोजन में मुख्य रूप

से नगर के छ.ग.के पयार्वरण मंडल के उपाध्यक्ष राज्य मंत्री दर्जा श्री

केदार गुप्तजी व् वार्ड के पार्षद श्री विट्ठल जी व् पार्षद श्री भावेश

पिथारिया जी बड़ी संख्या में साधक व् गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

अहमदाबाद आश्रम में साईं झूलेलाल कीर्तन यात्रा का आगमन हुआ । बड़ी ही संख्या में भक्तगण झूलेलाल आयोलाल की गूँज करते-करते आश्रम पधारे ।

अहमदाबाद आश्रम का बड़ा ही आध्यात्मिक मनमोहक वातावरण
साथ ही जाबाल्य ऋषि की तपोभूमि और लगातार 55 वर्षों से जप-तप-साधना के संस्कार बिखेरती ये मनमोहक ऋषिभूमि भक्तों के लिए रसमयता प्रदान करती है ।

गुड़ी पड़वा, चेटीचंड पर्व, नूतन वर्ष के निमित्त प्रति वर्ष सत्संग भजन कीर्तन भंडारे का आयोजन किया जाता है । लाखों की संख्या में भक्तगण इस द्वार पर आते हैं और पूज्य संत श्री आशाराम बापूजी की प्रत्यक्षता का अनुभव करते हैं । आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं ।

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Chatichand Utsav by Sadhak Parivar

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Satsang

छ: दुर्गुणों का निकास, लाए जीवन में सर्वागीण विकास


jivan me vikas
महात्मा विदुरजी राजा धृतराष्ट्र से कहते हैं :
षड दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता |
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ||
‘ऐश्वर्य या उन्नति चाहनेवाले व्यक्तियों को नींद, तन्द्रा (ऊँघना). भय, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता इन छ: दुर्गणों को त्याग देना चाहिए |’ (महाभारत, उद्योग पर्व:३७.७८)

अतिनिद्रा : असमय तथा अधिक शयन करने से आरोग्य व आयुष्य का ह्रास होता है | अधिक नींद करनेवालों में उत्साह तथा दक्षता की कमी पायी जाती है लेकिन ब्राम्हमुहूर्त में उठकर वायुसेवन करनेवालों की स्मरणशक्ति बढती है, दिनभर उत्साह बना रहता है | तामसी आहार (लहसुन,प्याज तथा बासी, तीखे-चरपरे व तले हुए पदार्थ आदि) का त्याग करने तथा आसन-प्राणायम करने से अतिनिद्रा का नाश होता है |

तन्द्रा : तन्द्रा अर्थात ऊँघना, झोंके खाना | तन्द्रा दो कारणों से होती है – एक तो रात्रि की नींद पूरी न हुई हो; दूसरा, तमस हो | नींद भलीप्रकार पूरी हो सके इसलिए रात्रि ९ से सुबह ३ – ४ बजे के बीच की आवश्यकतानुसार नींद पर्याप्त होती है | इस समय ली हुई नींद से शरीर की आधी तकलीफें तो बिना दवा के ही ठीक हो जाती हैं | अर्धरोगहरि निद्रा…. दिन में सोने से कई रोग बिन बुलाये आ जाते हैं | तमस को जीतने के लिए मिताहार व प्राणायाम करने चाहिए |

भय : भयभीत व्यक्ति की बनी हुई बात भी बिगड़ जाती हैं | सामर्थ्य होते हुए भी वह उसका उपयोग नहीं कर पाता | इसलिए निर्भय बनना चाहिए | प्रतिदिन पूज्य बापूजी के सत्संग का श्रवण, ॐकर का गुंजन व गर्जना तथा ‘निर्भय नाद’ व ‘जीवन रसायन’ पुस्तकों का पठन, मनन, अनुसरण करने से निर्भयता, निश्चिंतता आ जाती है | निर्भयता की अनोखी कुंजी देते हुए पूज्य बापूजी बताते हैं : “जब डर लगे तो अपने शुद्ध ‘मैं’ की ओर भाग जाओ | हो-होकर क्या होगा ? मैं निर्भीक हूँ | ॐ … ॐ … ॐ …. मैं अमर आत्मा हूँ | हरि ॐ … ॐ…. ॐ…. ‘ ऐसा चिंतन करों तो भय भाग जायेगा |”
वैसे तो डर पतन का कारण है लेकिन गुरु, भगवान, सत्शास्त्र की अवज्ञा का डर व सामाजिक नियमों के उल्लंघन का डर संसार से पार लगा देता है | रज्जबजी कहते हैं :
हरि डर गुरु डर जगत डर, डर करनी में सार |
रज्जब डरिया सो उबरिया, गाफिल खायी मार ||

क्रोध : एक महीने तक जप-तप करने से चित्त की जो योग्यता बनती है, प्रो.गेटे कहते हैं कि ‘यदि एक घंटे तक क्रोध करनेवाले व्यक्ति के श्वास के विषैले कण एकत्र करके इंजेक्शन बनाया जाय तो उससे २० आदमी मर सकते हैं |” इसलिए वेद भगवान की बात माननी चाहिए : मा क्रुध: | ‘क्रोध मत करो |’ (अथर्ववेद :११.२.२०)
लेकिन महर्षि दुर्वासा, विश्वामित्रजी, रमण महर्षि जैसे जीवन्मुक्त महापुरुषों की तरह भीतर से क्रोध के साक्षी बनकर, अनुशासन के लिए हितभरा क्रोध करने की शास्त्रों में मनाही नहीं है |
चबा-चबाकर भोजन करने से क्रोध नियंत्रित होता है | क्रोध आये तो अपनी उँगलियों के नाख़ून हाथ की गद्दी पर दबें इस प्रकार मुट्ठियाँ बंद करें |

आलस्य : उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथै: | उद्धम से ही कार्य सिद्ध होते हैं, कल्पना के किलों से नहीं | आलस्य से बढकर मानव का दूसरा कोई शत्रु नहीं हैं | आलस्य से ही लापरवाही का रोग लग जाता है | हिम्मती, दृढ़निश्चियी नेपोलियन बोनापार्ट को भी अपने सेनापति ग्राउची के आलस्य के कारण वाँटर्लू के युद्ध में मुँह की खानी पड़ी | शुक्र ग्रह के लिए भेजे गये रॉकेट के प्रोग्राम में केवल एक चिन्ह (__) लिखने में हुई लापरवाही से अमेरिका को करोड़ों डॉलर्स का नुकसान सहना पड़ा था |

दीर्घसूत्रता : किसी कार्य के लिए जरूरत से अधिक समय लगाने की आदत दीर्घसूत्रता खलती है | इसे दूर करने के लिए प्रात:काल उठकर निर्णय कर लें कि दिन में अमुक कार्य इतने समय में पूरा करेंगे | फिर उसी समयावधि में कार्य पूरा करने की कोशिश करें | एक कार्य को निर्धारित समय में पूरा करते हैं तो दुसरे कार्य को वैसे ही पूरा करते हैं तो दुसरे कार्य को वैसे ही पूरा करने का मनोबल प्राप्त होता है | इस प्रकार दैनंदिनी में कर्यनियोजन करके उन्हें पूरा करने का अभ्यास करने से दीर्घसूत्रता का दोष चला जायेगा |
उपरोक्त छ: दोष जिसके जीवन से चले गये, वह उन्नति के शिखर तक पहुँचकर ही रहता हैं |
– लोककल्याण सेतु – अप्रैल २०१४ से

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दर्शन ध्यान

ध्यान और आत्मचिंतन


Atma Chintan

ध्यान और आत्मचिंतन के लिए सब से जरूरी है सयम और तत्परता ।पर कुछ लोग कहते है की हमारे पास समय ही नहीं मिलता ।लेकिन हे भले मनुष्य !जब नींद आती है तो, तब सारे जरूरी काम छोड़ कर भी सो जाना पड़ता है ? जैसे नींद को महत्त्व देते हो ऎसे ही 24 घंटे में से कुछ समय ध्यान और आत्मचिंतन में भी बिताओ । तभी तुम्हारा जीवन सार्थक होगा,नहीं तो कुछ भी हाथ नहीं लगे गा ।

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सत्संग

विश्व में फैली अशांति को दूर करने का उपाय


vishva shanti

Only Then World Peace is Possible…

प्रश्न : स्वामीजी ! आज विश्व में हर कोई आगे भागना चाहता है । रास्ता सही है या गलत – इससे उसको कोई मतलब नहीं । दूसरे को धक्का दे के सिर्फ दौड में आगे पहुँचना है । इससे विश्व में जो अशांति फैल रही है, उसे दूर करने का क्या कोई रास्ता है ?

पूज्य बापूजी : हाँ, रास्ता है । दूसरे को धक्का दे के आगे बढने की अपेक्षा दूसरे को आगे बढाते हुए आगे बढने का रास्ता है । किसीकी टाँग खींचकर आगे बढने, ऊपर उठने के बजाय साथ में आगे बढने से शांति का संबंध है । Every action creates a reaction. हम जो भी करते हैं, वह घूम-फिर के हमारे पास आता है । हम भले विचार करेंगे, भलाई करेंगे तो हमारे चित्त में भले भाव पैदा होंगे । सामनेवाले का अहित सोचेंगे तो उसका अहित हो चाहे न हो लेकिन अहित के विचार से हमारे चित्त में अशांति और धड़कनें बढ़ जाती हैं ।

विश्व में अशांति क्यों है ? क्योंकि शांति का जो मूल है, उसको विश्व भूल गया है और इन्द्रियों को तृप्त करने के पीछे पडा है । मनुष्य जितना विषय-विकारों के पीछे तेजी से भागेगा, उतना ही मन की चंचलता बढ़ेगी, उतना ही झूठ-कपट, धोखाधड़ी करके सुखी रहने की कोशिश करेगा । हकीकत में दूसरे का शोषण या दूसरे को दुःखी करके जो सुखी होने की कोशिश करता है, वह प्राचीनकाल से आसुरी स्वभाववालों की सूची में गिना जाता है । आसुरं भावमाश्रिताः । (गीता : ७.१५) जो आसुर भाव का आश्रय लेते हैं, वे भले बाहर से थोड़े सुखी और सफल दिख जायें थो‹डे दिन के लिए लेकिन उन्हें चित्त की शांति, माधुर्य नहीं मिलता ।

बोले, ‘चित्त की शांति से क्या लाभ होगा ?’ चित्त की शांति से ‘परमात्म-प्रसाद, आत्मसुख’ की प्राप्ति होगी । परमात्म-प्रसाद मतलब बुद्धि को जो संतोष मिलेगा, मन को जो तृप्ति मिलेगी उससे आप जिस किसी व्यवहार में हैं, जिस किसी प्रवृत्ति में हैं सही निर्णय आयेंगे । बहुत सारे रोग, बहुत सारे गलत निर्णय, दुर्घटनाएँ तथा बहुत सारे झगड़’ अशांति के कारण होते हैं । सारे दुःखों का मूल अगर खोजा जाय तो अशांति है और सारे सुखों का मूल परमात्म-शांति है ।

अशान्तस्य कुतः सुखम् । ‘अशांत को सुख कहाँ ?’

शान्तस्य कुतः दुःखम् । ‘शांत को दुःख कहाँ ?

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