शुभ कर्म करें चाहे अशुभ कर्म करें, कर्म का फल सबको अवश्य भोगना पड़ता है। महाभारत के युद्ध के बाद की एक घटना है :- भीष्म पितामह शरशय्या पर लेटे हुए थे। महाराज युधिष्ठिर को चिंतित और शोकाकुल देखकर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें लेकर पितामह भीष्म के पास गये और बोलेः “पितामह ! युद्ध के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर बड़े शोकग्रस्त हो गये हैं।
अतः आप इन्हें धर्म का उपदेश देकर इनके शोक का निवारण करें।” तब भीष्म पितामह ने कहाः “आप कहते हैं तो उपदेश दूँगा किंतु हे केशव ! पहले मेरी शंका का समाधान करें। मैं जानता हूँ की शुभाशुभ कर्मों के फल भोगने पड़ते हैं। किंतु इस जन्म में तो मैंने कोई ऐसा कर्म नहीं किया और ध्यान करके देखा तो पिछले 72 जन्मों में भी कोई ऐसा क्रूर कर्म नहीं किया, जिसके फलस्वरूप मुझे बाणों की शय्या पर शयन करना पड़े।”
तब श्रीकृष्ण ने कहाः “पितामह ! आपने पिछले 72 जन्मों तक तो देखा किंतु यदि एक जन्म और देख लेते तो आप जान लेते। पिछले 73 वें जन्म में आपने आक के पत्ते पर बैठे हुए हरे रंग के टिड्डे को पकड़कर उसको बबूल के काँटे भोंके थे। कर्म के विधान के अनुसार वे ही काँटे आज आपको बाण के रूप में मिले हैं।”
देर सवेर कर्म का फल कर्ता को भोगना ही पड़ता है। अतः कर्म करने में सावधान और फल भोगने में प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वरार्पित बुद्धि से सावधान और फल भोगने में प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वरार्पित बुद्धि से किया गया कर्म अंतःकरण को शुद्ध करता है।
आत्मानुभव से कर्ता का कर्तापन ब्रह्म में लय हो जाता है और अपने आपको अकर्ता-अभोक्ता मानने वाला कर्मबंधन से छूट जाता है। उसे ही मुक्तात्मा कहते हैं। अतः कर्ता को ईश्वरार्पित बुद्धि से कर्म करते हुए कर्तापन मिटाते जाना चाहिए। कर्मों से कर्मों को काटते जाना चाहिए।

You must be logged in to post a comment.