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Sai Returns


श्री नारायण प्रेम साईं

Shri Narayan Prem Sai

बधाई..बधाई…बधाई…सभी गुरुभक्तो के शुभ संकल्प और साधना से वो मंगल घड़ी आख़िरकार आ ही गई ..जिसकी सभी को काफी लम्बे समय से प्रतीक्षा थी.गुजरात उच्च न्यायालय ने पूज्य साईं जी को पूजनीय माताजी की सेवा के लिए २६ मई २१ ..दिनों की अंतरिम जमानत प्रदान करने की सम्भावना है | हम सभी गुरुभक्त मान. न्यायालय का आत्मीय आभार व्यक्त करते है और विश्वास दिलाते है की जो भी दिशा निर्देश इस अवधि के लिए दिए गए है,उनका अक्षरशः पालन किया जायेगा ताकि पूज्य साईं जी को कोई परेशानी नहीं हो.इस मंगल घडी के संकेत पूज्य साईं जी ने इस माह के विश्वगुरु ओजस्वी मई माह के अंक केपेज ३ पर पहले ही दे दिए थे.मान.कोर्ट से राहत का इंतजार कर रहे साधको को उन्होंने हिम्मत बंधाते हुए कहा था….

” ख्वाब पूरे भी तभी होते है,जब होता है आप में भरपूर आत्मविश्वास और हर चुनोतियों से जूझने का जज्बा ! हमारा हौसला बुलंद रहे उन ख्वाबों को पूरा करने के लिए…!बड़े ख्वाबों को देखकर निराश हताश मत बनो ! आलोचनाओ की परवाह मत करो ! कोशिश करते रहो ..पूरा प्रयास करो…धीरज के साथ …सम्पूर्ण ताकत लगा दो उन अरमानों को पूरा करने के लिए..और आप देखोगे…अवश्य आपकी मेहनत रंग लाएगी..सफलता मिलेगी….खुली आँखों वे सपने हकीक़त बनने लगेंगे..आप एक दिन अवश्य सफल होंगे.”

हमारा धर्म…गुरु आज्ञा का पालन…

जैसा पूज्य साईं जी ने पहले ही आदेशित किया है कि आज मेरी वयोवृद्ध और रोग-पीड़ित पूजनीया मातुश्री को मेरी सेवा की अत्यधिक आवश्यकता है और ऐसे में मैं तन-मन-धन से उनकी सेवा कर उन्हें पूर्ण स्वस्थ देखना चाहता हूँ जो कि हरेक पुत्र का प्रथम कर्तव्य है| मेरे बाहर आने के इन २१ दिनों के दौरान मेरे निवास पर किसी प्रकार की भीड़ इकठ्ठी न हो – प्रसाद लेना – देना न हो – मुझसे मिलने – का आग्रह न हो – और ना ही मुझे देखने का आग्रह हो । हकीकत में मैं आप मेरी अंतरात्मा हैं और मैं आपकी अंतर आत्मा बनकर प्रतिष्ठित हूँ | आपके शुभसंकल्प और सहयोग से मैं इस दायित्व को सफलतापूर्वक निभाऊंगा ऐसा विश्वास है । अतः अपनी श्रद्धा व प्रेम को प्रदर्शित किये बिना, उसे अंतर मन की भूमि में बीज रूप में और अंदर दबा देना – और अनुकूल वक्त का इंतजार करना ! बेशक – वह समय भी आएगा – जब आपको उत्सव मनाने – जय – जयकार करने की छूट मिलेगी – परन्तु अभी आत्म – अनुशासनात्मक व्यवहार का ही आप परिचय देने में सफल होने का भरसक प्रयत्न करेंगे और अपने इस आचरण, व्यवहार से हम सभी माननीय सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के आदेशों का पालन करते हुए – कानून व्यवस्था को बनाये रखने में सहयोग करते हुए – अपने नागरिकत्व को सफल बनाएं| न्यायालय का सम्मान करें ! सभी शर्तों को पालने में सफल बनें ! लम्बे समय से रोगग्रस्त मेरी वृद्ध माँ के शीघ्रातिशीघ्र उपचार का अति आवश्यक व महत्वपूर्ण कार्य मैं इस लघुकाल में अबाधित रूप से कर पाऊं इसी प्रार्थना के साथ…..”

इस संबंध में और ज्यादा पढने के लिए इस लिंक पर क्लिक कीजिये…

Narayan Prem Sai, Ahmedabad. 52517लोगों ने पसंद किया. · 13805 इस बारे में बात कर रहे हैं. In the glorious tradition of Indian saints, His …

Narayan Sai (born 29 January 1972, Narayan Sirumalani/Harpalani), also known as Narayan Prem Sai is an Indian Hindu religious leader. He is the son of His Holiness Param Pujya Sant Shri Asaram Bapuji.

In the glorious tradition of Indian saints, His Holiness Shri Shri Narayan Prem Sai is a renowned spiritual leader symbolizing the highest manifestation of divinity …

AHMEDABAD: Brahmajnani Saint Shri Asaramji Bapu‘s son Narayan Sai, who is in jail in a fake case…

Source: https://www.facebook.com/NarayanPremSai.Org/photos/a.696846853684608.1073741828.629258133776814/841123089256983/?type=1

 

 

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संत वाणी

कुत्ते से भी नीच कौन ?


 

वशिष्ठ जी बोले हे रामजी ! सबसे नीच कुत्ता है,क्योकि जो कोई उसके निकट जाता है उसको काट लेता है ,वो घर-घर में भटकता है और मलिन स्थानो में जाता है,वैसे ही अज्ञानी जीव श्रेष्ठ पुरुषो की निंदा करता है और

मन में तृष्णा रखता है ……

part-1

part-2

 

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स्वास्थय की कुंजियाँ

अच्युताय कमरकस


अच्युताय कमरकस (Achyutaya kamarkas)
(एक दिव्य औषधि)

कमरकस वृष्य,बल्य व अस्थिसंधानक है।यह हड्डीयों को मजबूत बनाता है।वीर्य को पुष्ट करता है।स्वप्नदोष अथवा प्रदररोग के कारण आयी हुई दुर्बलता,क्षीणता,नपुंसकता व कमरदर्द मे लाभदायी है ।

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स्वास्थय की कुंजियाँ

घर-घर में पहुँचाओ स्वास्थ्य का खजाना


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आजकल देश विदेश में कई जगहों पर मरीज को जरा-सा रोग होने पर भी लम्बी जाँच पड़ताल और अकारण ऑपरेशन करके व लम्बे बिल बनाकर गुमराह करके लूटा जाता है। जिससे समाज की कमर ही टूट गयी है। वैद्यक क्षेत्र से सम्बन्धित इन लोगों के कमीशन खाने के लोभ के कारण मरीज तन, मन और धन से भी पीड़ित हो रहे हैं। कई मरीज बापूजी के पास रोते-बिलखते आते हैं कि लाखों रुपये लुट गये, दुबारा-तिबारा ऑपरेशन करवाया, फिर भी कुछ फायदा नहीं हुआ। स्वास्थ्य सदा के लिए लड़खड़ा गया। बापूजी ! अब…..

पूज्य बापू जी व्यथित हृदय से समाज की दुर्दशा सुनी और इस पर काबू पाने के लिए आश्रम द्वारा कई चल चिकित्सालय एवं आयुर्वैदिक चिकित्सालय खोल दिये। आश्रम द्वारा औषधियों का कहीं निःशुल्क तो कहीं नाममात्र दरों पर वितरण किया जाने लगा। परंतु इतने से ही संत हृदय कहाँ मानता है ? स्वास्थ्य का अनुपम अमृत घर-घर तक पहुँचे, इस उद्देश्य से लोकसंत पूज्य बापू जी ने आरोग्य के अनेकों सरल उपाय अपने सत्संग-प्रवचनों में समय-समय पर बताये हैं। जिन्हें आश्रम द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं ‘ऋषि-प्रसाद’ व ‘दरवेश-दर्शन’ तथा समाचार पत्र ‘लोक कल्याण सेतु’ में समय-समय पर प्रकाशित किया गया है। उनका लाभ लाखों करोड़ों भारतवासी और विदेश के लोग उठाते रहे हैं।

ऋतुचर्या का पालन तथा ऋतु-अनुकूल फल, सब्जियाँ, सूखे मेवे, खाद्य वस्तुएँ आदि का उपयोग कर स्वास्थ्य की सुरक्षा करने की ये सुन्दर युक्तियाँ संग्रह के रूप में प्रकाशित करने की जन जन की माँग आरोग्यनिधि-2 के रूप में साकार हो रही है। आप इसका खूब-खूब लाभ उठायें तथा औरों को दिलाने का दैवी कार्य भी करें। आधुनिकता की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपने स्वास्थ्य और इस अमूल्य रत्न मानव-देह का सत्यानाश मत कीजिए।

आइये, अपने स्वास्थ्य के रक्षक और वैद्य स्वयं बनिये। अंग्रेजी दवाओं और ऑपरेशनों के चंगुल से अपने को बचाइये और जान लीजिए उन कुंजियों को जिनसे हमारे पूर्वज 100 वर्षों से भी अधिक समय तक स्वस्थ और सबल जीवन जीते थे।

इस पुस्तक का उद्देश्य आपको रोगमुक्त करना ही नहीं, बल्कि आपको बीमारी हो ही नहीं, ऐसी खान-पान और रहन-सहन की सरल युक्तियाँ भी आप तक पहुँचाना है। अंत में आप-हम यह भी जान लें कि उत्तम स्वास्थ्य पाने के बाद वहीं रुक नहीं जाना है, संतों के बताये मार्ग पर चलकर प्रभु को भी पाना है…. अपनी शाश्वत आत्मा-परमात्मा को भी पहचानना है।

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ध्यानामृत

ध्यानामृत


ध्यानामृत

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ध्यान के क्षणों में……

हमारा सूक्ष्म विकास हो रहा है। हमारा चित्त ॐकार की ध्वनि से परम शान्ति में, परमात्मा के आह्लादक स्वरूप में शान्त हो रहा है। हम महसूस कर रहे हैं कि हम शान्त आत्मा हैं। संकल्प-विकल्प मिट रहे हैं। चित्त की चंचलता शिथिल हो रही है। भ्रम दूर हो रहे हैं। सन्देह निवृत्त हो रहे हैं।

हमें पता भी नहीं चलता इस प्रकार गुरुदेव हमारी सूक्ष्मातिसूक्ष्म यात्रा करा रहे हैं… हमें पता भी नहीं चलता। अन्तवाहक शरीर पर चढ़े हुए कई जन्मों के संस्कार निवृत्त होते जा रहे हैं। वाणी के उपदेश से भी मौन उपदेश, मौन रहकर संकल्प से गुरुदेव की कृपा हमारे भीतर काम करती है। हमें पता भी नहीं होता कि मौन से कितना लाभ हो रहा है ! सदगुरु की कृपा कैसे कार्य करती है इसका पता हमें प्रारम्भ में नहीं चलता। गुरुकृपा हमारी नजदीक होकर भी काम करती है और हजारों मील दूर होकर भी काम करती है। गुरुदेव के बोलने पर तो उनकी कृपा काम करती ही है लेकिन मौन होने पर विशेष रूप से काम करती है। मौन के संकल्प की अपेक्षा बोलने का संकल्प कम सामर्थ्यवाला होता है। मौन में आत्म-विश्रान्ति की अपेक्षा बाहर के क्रिया-कलाप छोटे हो जाते हैं। सूक्ष्म पर्तें उतारने के लिए सूक्ष्म साधनों की जरूरत पड़ती है। यह घटना मौन में, शान्ति में घटती है। शिष्य जब आगे बढ़ता है तब ख्याल आता है कि जीवन में कितना सारा परिवर्तन हुआ।

हे मेरे साधक ! हे भैया ! तेरा जीवन कितना कीमती है यह वे ब्रह्मवेत्ता जानते हैं और तू कितना तुच्छ चीजों में गिर रहा है यह भी वे जानते हैं। नन्हा-मुन्ना बालक अपनी विष्टा में खेलता है और सुख मानता है, अंगारों को पकड़ने के लिए लालायित होता है, बिच्छु और साँप से खेलने को लालायित होता है। उस अबोध बच्चे को पता ही नहीं कि अभी उनके विषैले डंक तुझे त्राहिमाम करा देंगे। हे साधक ! विषय-विकाररूपी जिस मल-मूत्र-विष्टा में खेलने को तत्पर है वे तुझे बीमार कर देंगे ! तेरी तन्दुरुस्ती को बिगाड़ देंगे। तू अंगारों से खेलने को जा रहा है ! तू तो मक्खन-मिश्री खाने को आया है लाला ! मिट्टी में, गोबर में खेलने को नहीं आया। चौरासी-चौरासी लाख जन्मों में तू इन गोबरों में, कंकड़-पत्थरों में खेला है, पति पत्नी के तुच्छ विकारी सम्बन्धों में तू खेला है, तू बकरा बना है, कई बार तुच्छ बकरियों के पीछे घूमा है। तूने न जाने कितने-कितने जन्मों में तुच्छ खेल खेले हैं। अब तू लाला के साथ खेल, राम के साथ खेल, अब तो तू शिवजी की नाईं समाधि लगाकर स्व के साथ खेल।

हे प्यारे साधक ! अगर तू अपने सदगुरु को खुश करना चाहता है तो उनकी आज्ञा मान और उनकी आज्ञा यही है कि वे जहाँ खेलते हैं उस परमात्मा में तू भी खेल। गुरु जहाँ गोता मारते हैं उसी में तू गोता मार भैया ! गुरुओं की जो समझ है वहाँ अपनी वृत्ति को पहुँचाने का प्रयास कर। इन नश्वर खिलौनों को पकड़कर कब तक सुख मनायगा ? कब तक अंगारों की ओर तू भागेगा ? करुणामयी माँ बच्चे को समझाती है, बच्चा रुक जाता है। माँ इधर-उधर जाती है बच्चा फिर अंगारों की ओर जाता है, चमकते अंगारों को खिलौना समझकर तू छू लेता है और चिल्ला उठता है। तब उसकी माँ को कितना दुःख होता है ! उस समय बालक को माँ की करुण स्थिति का पता नहीं। माँ उसे थप्पड़ मार देती है उस थप्पड़ में भी वात्सल्य भरा होता है, करुणा होती है। बच्चे का कान पकड़ना भी करुणा से भरा है। बच्चे का हाथ-पैर बाँधकर सजा देना भी प्यार और करुणा से प्रेरित होता है।

ऐ साधक ! तू जब गलत रास्ते जाता है, कंटकों और अंगारों में कदम रखता है तो सदगुरुरूपी माता-पिता कड़ी आँख दिखाते हैं, तू उसे महसूस भी करता होगा। ‘गुरु रूठ गये हैं…. नाराज हो गये हैं…. पहले जैसे नहीं हैं….’ ऐसा तुझे लगेगा लेकिन गौर से जाँच करेगा तो पता चलेगा कि तू पहले जैसा नहीं रहा। तू अंगारों की ओर गया, तू बिच्छू की ओर गया, तू सर्पों की ओर गया इसलिए वे पहले जैसे नहीं भासते। तू शंका-कुशंका में गया, अपनी अल्प मति से ब्रह्मवेत्ता गुरुओं को तौलने का दुस्साहस करने को गया इसलिये उन्होंने कड़ी आँख दिखायी है। वह भी तेरे कल्याण के लिए है। कड़ी आँख भी करुणा से भरी है, कृपा से भरी है, प्रेम से भरी है। कड़ी आँख भी पुकार से भरी है कि तू चल… चल….। तू रुक मत। आगे चल। गिर मत। सावधान हो। फिसल मत। साहस कर। गद्दार मत बन, सतर्क हो। कृतघ्न मत बन, कृतज्ञ हो।

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