नेत्र का कार्य देखना है , सम्पूर्ण संसार मे प्रकाश का एहसास नेत्र के द्वारा हो सकता है , लेकिन अन्तःकरण प्रकाश और अंधकार का वास्तविक एहसास हमारे विचार करते हैं,
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस मे लिखा है — जाकर रही भावना जैसी , प्रभु मूरति देखी तिन्ह तैसी,
हमारे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी जब बनबास को जा रहें है,….. कोई राजकुमार के रूप मे देख रहा है, कोई बनवासी के रूप मे देख रहा है, तो कोई परमब्रह्म के रूप मे देख रहा है,
मानव की मानवता और गुणवत्ता , सदगुण और दुर्गुण का केन्द्र बिंदु विचार है ,
विचार हमारे वंशानुक्रम और वातावरण पर निर्भर करता है ,
शुद्ध सात्विक आहार -विहार भी उसके प्रमुख कारक हैं |
जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्षों का काम कर लेना होगा | उसे इस युग की रफ़्तार से बहुत आगे निकलना होगा | जैसे स्वप्न में मान-अपमान, मेरा-तेरा, अच्छा-बुरा दिखता है और जागने के बाद उसकी सत्यता नहीं रहती वैसे ही इस जाग्रत जगत में भी अनुभव करना होगा | बस…हो गया हजारों वर्षों का काम पूरा | ज्ञान की यह बात हृदय में ठीक से जमा देनेवाले कोई महापुरुष मिल जायें तो हजारों वर्षों के संस्कार, मेरे-तेरे के भ्रम को दो पल में ही निवृत कर दें और कार्य पूरा हो जाये |
लोग क्यों दुःखी हैं ? क्योंकि अज्ञान के कारण वे अपने सत्यस्वरूप को भूल गये हैं और अन्य लोग जैसा कहते हैं वैसा ही अपने को मान बैठते हैं | यह दुःख तब तक दूर नहीं होगा जब तक मनुष्य आत्म-साक्षात्कार नहीं कर लेगा |
राजा जनक गुरु धारण करने के बाद बहुत भक्ति की| मन को ऐसा बना लिया कि माया का कोई भी रंग उस पर प्रभाव नहीं डालता था| मोह माया, लोभ, अहंकार तथा वासना, काम का जोश भी उसके मन की इच्छा अनुसार हो गया| वह राजा भक्त बन गया|
एक दिन राजा ने अद्भुत ही कौतुक रचा| उसने एक तेल का कड़ाहा गर्म करवाया| उस छोटे कड़ाहे के पास बिछौना बिछा कर उस पर अपनी सबसे सुन्दर स्त्री को कहा कि वह लेट जाए| जब स्त्री लेट गई तो राजा जनक ने एक पैर कड़ाहे में रखा और एक उस स्त्री के बदन पर| वह अडोल खड़ा रहा| अग्नि ने उसको जरा भी आंच न आने दी|….और रानी की सुन्दरता, पैर द्वारा शरीर के स्पर्श ने उसके खून को न गरमाया, गर्म तेल उबलता था, रानी की जवानी दोपहर में थी| यह देखकर लोग राजा जनक की जै जै बोलने लगे| वह धर्मात्मा-बड़ा भक्त बन गया| उसके पश्चात राजा को कभी माया ने न भरमाया|
राजाका अन्तिम समय आ गया| पंचतत्व शरीर को छोड़ कर अगली दुनिया की तरफ जाना था| शरीर को जैसे ही आत्मा ने छोड़ा तो कुदरत की तरफ से अपने आप ही बेअंत शंख बजने लग गए, नरसिंघे बोले, मंगलाचार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं| कहते हैं देवता और गन्धर्व आए, अप्सराएं आईं| भक्त जन और नेक आत्माओं के दल स्वागत करने के लिए आए|
कहते हैं, जनक ने जो भक्ति का दिखावा किया था, वह परमात्मा के दरबार में उसका अहंकार लिखा गया| जब देवता लेने के लिए आए तो परमात्मा ने हुक्म दिया-हे देवताओं! राजा जनक को नरक वाले रास्ते से देवपुरी ले आना, क्योंकि उसके अहंकार का फल उसको अवश्य मिले| यहां बे-इंसाफी नहीं होती, इंसाफ होता है| बस इतना ही काफी है| उसका फूलों वाला बिबान उधर से ही आए|
जिस तरह परमात्मा का हुक्म था, सब ने उसी तरह ही मानना था| देवताओं ने राजा जनक का बिबान नरकों की तरफ मोड़ लिया| नरक आया| नरकों में हाहाकार मची हुई थी| जीव पापों और कुकर्मों का फल भुगत रहे थे| कोई आग में जल रहा था तो कोई उल्टा लटकाया हुआ था और नीचे आग जल रही थी| कई आत्माओं को गर्म तेल के कड़ाहों में डाला हुआ था| तिलों की तरह कोहलू में पीसे जा रहे थे| हैरानी की बात यह थी कि वह न मरते थे और न जीते थे| आत्माएं दुःख उठाती हुई तड़प रही थीं| नरक की तरफ देख कर राजा जनक ने पूछा-यह कौन-सा स्थान है? नरक के राजा यमदूत ने कहा-महाराज! यह नरक है, उन लोगों के लिए जो संसार में अच्छे काम नहीं करते रहें, अब दुःख उठा रहे हैं|
राजा जनक ने कहा-इन सब को अब छोड़ देना चाहिए| बहुत दुःख उठा लिया है| देखो कैसे मिन्नतें कर रहे हैं|
यम-परमात्मा की आज्ञा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता| हां, यदि कोई पुण्य का फल दे तो इनको भी छुटकारा मिल सकता है|
राजा जनक को रहम आ गया| उसने कहा-मेरे एक पल के सिमरन का फल लेकर इन को छोड़ दो|
यमों ने तराजू मंगवाया| एक तरफ राजा जनक के सिमरन का फल रखा गया और दूसरी तरफ नरकगामी आत्माएं बिठाईं| धीरे-धीरे सभी नरकगामी आत्माएं तराजू पर चढ़ गईं| नरक खाली हो गया| आत्माएं राजा जनक के साथ ही स्वर्ग की ओर चल पड़ीं| बड़े प्रताप और शान से राजा जनक परमात्मा के दरबार में उसके देव लोक में पहुंचा|
वात, पित्त, कफ का प्रकोप आहार-विहार के अतिरिक्त धातुओं के प्रभाव से भी होता है । जैसे, वात-ग्रीष्म ऋतु में संचित होता है, वर्षा ऋतु में कुपित रहता है और शरद ऋतु में शान्त रहता है । पित्त-वर्षा ऋतु में संचित, शरद ऋतु में कुपित और हेमन्त ऋतु में शान्त रहता है । कफ- शिशिर ऋतु में संचित, बसन्त में कुपित और ग्रीष्म-ऋतु में शान्त होता है।
दोष
संचय
प्रकोप
शमन
वात
ग्रीष्म
वर्षा
शरद
(ज्येष्ठ–आषाढ़)
पित्त
वर्षा
शरद
हेमन्त
(सावन–भादों
(आश्विन–कार्तिक)
(मार्गशीष–पौष)
कफ
शिशिर
बसन्त
ग्रीष्म
(माघ–फाल्गुन)
(चैत्र–बैसाख)
अत: ऋतुओं के लक्षण जानकर उसके अनुसार आचरण करने से व्यक्ति स्वस्थ,सुखी और दीर्घायु रह सकता है । वर्षा ऋतु में प्रकुपित वात का, शरद ऋतु में पित्त का और बसन्त ऋतु में कफ का शमन हो, ऐसा आहार-विहार होना चाहिए ।
ऋतुओं के अलावा जीवन-काल के अनुसार भी दोष प्रकुपित होते है जैसे बाल्यावस्था में कफ का प्रकोप, युवावस्था में पित्त का प्रकोप और वृद्धावस्था में वात का प्रकोप होता है । इसी प्रकार दिन किस-किस समय किस दोष का जोर रहता है, यह बताते हुए कहा गया है कि दिन के प्रथम प्रहर में वात का, दोपहर में पित्त का और रात्रि में कफ का जोर रहता है । किन-किन दशाओं में त्रिदोष प्रकुपित होते है इस बात की सूक्ष्मता से छानबीन करते हुए, आयुर्वेद में यह भी कहा गया है कि भोजन करने के तुरन्त बाद ही कफ की उत्पत्ति होती है, भोजन पचते समय पित्त का प्रकोप होता है और भोजन के पाचन के बाद वायु का प्रकोप आरम्भ होता है । इसीलिए भोजन के तुरन्त बाद कफ की शन्ति के लिए पान खाने की प्रथा का प्रचलन है । यही नहीं, आयुर्वेद ने प्रत्येक जड़ी-बूटी और खाद्य-पदार्थ को, त्रिदोष सिद्धान्त की कसौटी पर कसते हुए उनके गुण-दोषों का सूक्ष्म विश्लेषण किया है और प्रकुपित दोष की पहचान और उसकी शान्ति के उपाय बताये हैं ।
जनक जी एक धर्मी राजा थे| उनका राज मिथिलापुरी में था| वह एक सद्पुरुष थे| न्यायप्रिय और जीवों पर दया करते थे| उनके पास एक शिव धनुष था| वह उस धनुष की पूजा किया करते थे| आए हुए साधू-संतों को भोजन खिलाकर स्वयं भोजन करते थे|
लेकिन एक दिन एक महात्मा ने राजा जनक को उलझन में डाल दिया| उस महात्मा ने राजा जनक से पूछा-हे राजन! आप ने अपना गुरु किसे धारण किया है?
यह सुन कर राजा सोच में पड़ गया| उसने सोच-विचार करके उत्तर दिया-हे महांपुरुष! मुझे याद है कि अभी तक मैंने किसी को गुरु धारण नहीं किया| मैं तो शिव धनुष की पूजा करता हूं|
यह सुनकर उस महात्मा ने राजा जनक से कहा-राजन! आप गुरु धारण करो| क्योंकि इसके बिना जीवन में कल्याण नहीं हो सकता और न ही इसके बिना भक्ति सफल हो सकती है| आप धर्मी एवं दयावान हैं|
‘सत्य वचन महाराज|’ राजा जनक ने उत्तर दिया और अपना गुरु धारण करने के लिए मन्त्रियों से सलाह-मशविरा किया| तब यह फैसला हुआ कि एक विशाल सभा बुलाई जाए| उस सभा में सारे ऋषि, मुनि, पंडित, वेदाचार्य बुलाए जाएं| उन सब में से ही गुरु को ढूंढा जाए|
सभा बुलाई गई| सभी देशो में सूझवान पंडित, विद्वान और वेदाचार्य आए| राजा जनक का गुरु होना एक महान उच्च पदवी थी, इसलिए सभी सोच रहे थे कि यह पदवी किसे प्राप्त हो, किसको राजा जनक का गुरु बनाया जाए| हर कोई पूर्ण तैयारी के साथ आया था| सभी विद्वान आ गए तो राजा जनक ने उठकर प्रार्थना कि ‘हे विद्वान और ब्राह्मण जनो! यह तो आप सबको ज्ञात ही होगा कि यह सभा मैंने अपना गुरु धारण करने के लिए बुलाई है| परन्तु मेरी एक शर्त यह है कि मैं उसी को अपना गुरु धारण करना चाहता हूं जो मुझे घोड़े पर चढ़ते समय रकाब के ऊपर पैर रखने पर काठी पर बैठने से पूर्व ही ज्ञान कराए| इसलिए आप सब विद्वानों, वेदाचार्यों और ब्राह्मणोंमें से अगर किसी को भी स्वयं पर पूर्णत: विश्वास है तो वह आगे आए| आगे आ कर चन्दन की चौकी पर विराजमान हो पर यदि चन्दन की चौकी पर बैठ कर मुझे ज्ञान न करा सका तो उसे दण्डमिलेगा| क्योंकि सभा में उस की सबने हंसी उड़ानी है और इससे मेरी भी हंसी उड़ेगी| इसलिए मैं सबसे प्रार्थना करता हूं कि योग्य बल बुद्धि वाला सज्जन ही आगे आए|
यह प्रार्थना करके धर्मी राजा जनक अपने आसान पर बैठ गया| सभी विद्वान और ब्राह्मण राजा जनक की अनोखी शर्त सुनकर एक दूसरे की तरफ देखने लगे| अपने-अपने मन में विचार करने लगे कि ऐसा कौन-सा तरीका है जो राजा जनक को इतने कम समय में ज्ञान करा सके| सब के दिलों-दिमाग में एक संग्राम शुरू हो गया| सारी सभा में सन्नाटा छा गया| राजा जनक का गुरु बनना मान्यता और आदर हासिल करना, सब सोचते और देखते रहे| चन्दन की चौकी की ओर कोई न बढ़ा| यह देखकर राजा जनक को चिंता हुई| वह सोचने लगा कि उसके राज्य में ऐसा कोई विद्वान नहीं? राजा ने खड़े हो कर सभा में उपस्थित हर एक विद्वान के चेहरे की ओर देखा| लेकिन किसी ने आंख न मिलाई| राजा जनक बड़ा निराश हुआ|
कुछ पल बाद एक ब्राह्मण उठा, उसका नाम अष्टावकर था| जब वह उस चन्दन की चौकी की ओर बढ़ने लगा तो उसकी शारीरिक संरचना देखकर सभी विद्वान और ब्राह्मण हंस पड़े| राजा भी कुछ लज्जित हुआ| उस ब्राह्मण की कमान पर दो बल थे| छाती आगे को और पेट पीछे को गया हुआ था| टांगें टेढ़ी थीं और हाथों का तो क्या कहना, एक पंजा है ही नहीं था तथा दूसरे पंजे की उंगलियां जुड़ी हुई थीं| जुबान चलती थी और आंखें तथा चेहरा भी ठीक नहीं था| वह आगे होने लगा तो मंत्री ने उसको रोका और कहा-पुन: सोच लीजिए! राजा जनक की संतुष्टि न हुई तो मृत्यु दण्ड मिलेगा| यह कोई मजाक नहीं है, यह राजा जनक की सभा है|
अष्टावकर बोला-हे मन्त्री! यह बात आपको कहने का इसलिए साहस पड़ा है क्योंकि मैं शरीर से कुरुप दिखता हूं| हो सकता है गरीब और बेसहारा हूं| आपके मन में भी यह भ्रम आया होगा कि मैं शायद लालच के कारण आगे आने लगा हूं| इससे यह प्रतीत होता है कि जैसे इस भरी सभा में कोई ज्ञानी नहीं, कोई राजा का गुरु बनने की योग्यता नहीं रखता, वैसे आप भी अज्ञानी हो| आप ने अपने जैसे अज्ञानियों को ही बुलाया है| पर मैं सभी से पूछता हूं क्या ज्ञान का सम्बन्ध आत्मा और दिमाग के साथ है या किसी के शरीर के साथ? जो सुन्दर शरीर वाले, तिलक धारी, ऊंची कुल और अच्छे वस्त्रों वाले बैठे हैं, वह आगे क्यों नहीं आते? सभी सोच में क्यों पड़ गए हो? मेरे शरीर की तरफ देख कर हंसते हुए शर्म नहीं आती, क्योंकि शरीर ईश्वर की रचित माया है| उसने अच्छा रचा है या बुरा| जिसको तन का अभिमान है, उसको ज्ञान अभिमान नहीं हो सकता, अष्टावकर गुस्से से बोला| उसकी बातें सुन कर सभी तिलकधारी राज ब्राह्मण शर्मिन्दा हो गए| उन सब को अपनी भूल पर पछतावा हुआ|
You must be logged in to post a comment.