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राजा भरथरी का वैराग्य शतक


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Raja Bhartrihari’s Vairagya Shatak

राजा भरथरी का वैराग्य शतक: सांसारिक मोह-माया से मुक्ति की प्रेरणा :

राजा भरथरी राजा भर्तृहरि के नाम से भी पहेचाने जाते है । राजा भरथरी का “वैराग्य शतक” भारतीय साहित्य का एक ऐसा अनुपम रत्न है, जिसमें सांसारिक मोह-माया और भौतिक सुखों की अस्थिरता को समझाते हुए वैराग्य का महत्व बताया गया है। इस शतक में सौ श्लोकों का संग्रह है, जो मनुष्य को जीवन के सच्चे अर्थ और परमात्मा की ओर प्रेरित करता है। आइए इस काव्य के प्रमुख संदेशों को सरल शब्दों में समझते हैं।

  1. संसार की नश्वरता :

राजा भरथरी ने अपने श्लोकों में यह समझाया है कि संसार के सभी सुख-दुख, रिश्ते-नाते, धन-दौलत और यश क्षणभंगुर हैं। इन पर अत्यधिक आसक्ति करना व्यर्थ है, क्योंकि अंत में सब कुछ नष्ट हो जाता है।

उदाहरण:
“यह संसार एक सपने की तरह है। जैसे सपना टूटते ही सब समाप्त हो जाता है, वैसे ही जीवन भी अनित्य (अस्थाई) है।”

  1. मोह-माया से मुक्ति :

भरथरी ने यह सिखाया कि मोह और माया मनुष्य को अपने कर्तव्यों और जीवन के वास्तविक उद्देश्य से भटकाते हैं। उन्होंने हमें अपने मन को इन बंधनों से मुक्त करने की प्रेरणा दी।

संदेश:
“जो व्यक्ति मोह के जाल से मुक्त हो जाता है, वही सच्चा सुख और शांति प्राप्त कर सकता है।”

  1. धन और यश का अस्थायित्व

भरथरी के अनुसार, धन और यश किसी के स्थायी साथी नहीं होते। ये चीजें आज किसी के पास हैं तो कल किसी और के पास चली जाती हैं। इन पर अहंकार करना व्यर्थ है।

विचार:
“धन नाशवान है, और यश केवल समय के साथ फीका पड़ जाता है। स्थायी तो केवल आत्मा और परमात्मा का ज्ञान है।”

  1. वैराग्य अपनाने की प्रेरणा

भरथरी ने वैराग्य को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। वैराग्य का अर्थ है, सांसारिक चीजों से मन हटाकर आध्यात्मिक पथ पर चलना। इसका मतलब संसार से भागना नहीं, बल्कि उसके असली स्वरूप को समझना है।

प्रेरणा:
“वैराग्य वह अवस्था है, जब मनुष्य अपने मन को शांत कर लेता है और आत्मा का साक्षात्कार करता है।”

  1. परमात्मा का स्मरण

“वैराग्य शतक” में बताया गया है कि सच्चा सुख केवल परमात्मा की भक्ति और ज्ञान में है। सांसारिक चीजें केवल मन को भटकाती हैं और असली आनंद से दूर करती हैं।

शिक्षा:
“जो व्यक्ति परमात्मा को समझ लेता है, वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।”

निष्कर्ष

भरथरी का “वैराग्य शतक” हमें यह सिखाता है कि सांसारिक मोह-माया और भौतिक सुखों में पड़कर हम अपने जीवन के असली उद्देश्य को भूल जाते हैं। उन्होंने आत्मा, परमात्मा और वैराग्य को जीवन का मार्गदर्शन बताया। इस ग्रंथ में भक्ति, ज्ञान और ध्यान का महत्व प्रमुख रूप से उभारा गया है।

“वैराग्य शतक” सिर्फ एक काव्य नहीं, बल्कि जीवन को समझने और उसके सही अर्थ तक पहुंचने की राह दिखाने वाला मार्गदर्शक है। इसे पढ़कर हमें अपने जीवन के उद्देश्य और आत्मा की शुद्धि पर विचार करने की प्रेरणा मिलती है।

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राम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज


गोस्वामी तुलसीदास का जन्म- 1532 ई. में हुआ था । तुलसीदास एक साथ कवि, भक्त तथा समाज सुधारक तीनों रूपों में मान्य है।

इनकी राम भक्ती अटूट थी । इन्हें प्रत्यक्ष भगवान श्री हनुमानजी और उनके प्रभु श्री राम जी के दर्शन हुए थे, साथ ही साथ इन्हें श्री हनुमानजी की कृपा से अपनी आँखों से श्री राम लीला जो त्रेतायुग में घटी थी वो देखने को मिली थी | इन्होंने प्रभु श्री राम जी के दर्शन और उनकी करुणा से त्रेतायुग में घटी एक एक घटना को अपनी आँखों से देखा था ।

भगवान शंकर और माता पार्वति का भी इन पर बहुत अनुग्रह था | भगवान शंकर ने आदशक्ति माँ पार्वती जी के साथ प्रगट होकर इन्हें श्रीरामचरित्रमानस लिखने की आज्ञा की थी ।

इन्हें भगवान वेदव्यास का अंशअवतार भी माना जाता है । कहते हैं अपने शास्त्रों को सरल रीती से समाज को समझाने के लिए इनका जन्म हुआ था ।चित्रकूट के घाट पर इन्हें प्रभु श्रीराम के दर्शन हुए थे । वो कथा भी बडी रोचक है । इनके द्वारा विरचित भगवान श्री राम को समर्पित श्रीरामचरितमानस को समस्त भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके बाद विनय पत्रिका तुलसीदासकृत एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य है।

तुलसीदासजी का जन्म संवत 1589 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान बाँदा ज़िला) के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। पैदा होते ही इनके चेहरे पर अनुपम तेज था । कहा जाता है की इनके जन्मजात ही दाँत और आँखों में विशेष प्रकार की चमक भी थी । इनके इस रूप को देखकर सभी थोडा घबरा भी रहे थे पर इनके पिता राजपुर के नामचिन ज्योतिष भी थे । जब उन्होंने इनकी कुंडली बनाई तो देखा की इनके जीवन में बचपन से ही मातृ-पितृ स्नेह नहीं है अर्थात इनके जन्म से कुछ समय पश्चात ही इनके माता पिता का देहांत हो गया था । बचपन में बडे दुख से समय इनका कटा । इनकी ऐसी दशा और प्रकाशमय मुख को देखकर इनके गुरु को इन्हें समझते देर ना लगी । भगवान श्री रामानंद संप्रदाय के सदगुरुदेव बाबा श्री नरहरीदास जी इन्हें अपने आश्रम ले आये और वहीें इन्हें संस्कृत का ज्ञान भी देने लगे | साथ ही साथ श्री राम चरीत्र रामायण का भी पाठ करवाने लगे ।

गोस्वामी जी अपने गुरुदेव के बारे में लिखते हैं कि भगवान जब कलम लेकर भाग्य लिख रहे थे तब सभी मानव नंबर से भगवान से भाग्य अपने माथे पर लिखवा रहे थे जब मेरा नंबर आया तो भगवान की कलम में स्याही खत्म हो गयी तो भगवान ने मेरा भाग्य कोरा ही छोड दिया | मेरे नसीब में तो कुछ ना था पर मेरे गुरुदेव स्वामी को दया आ गयी । एक दिन कलम लेकर बैठे थे कुछ लिखने को कागज न था तो मेरा कोरा मस्तक देखकर उन्होने मेरा भाग्य लिख डाला । कैसी अन्न्य गुरुप्रेम था गोस्वामी जी में ।

गोस्वामी जी की युवा अवस्था आने पर उनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्यधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली की फटकार सुननी पड़ी ।

हाड माँस की देह मम, ता में इतनी प्रीती ।

याते आधी राम में, तो कबहु ना लगे भवभीती ।।

“लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ”

इस फटकार के बाद से जैसे इनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या में बीता ।

पत्नी परिवार सब छोडकर ये चित्रकूट चले गये | वहाँ कई दिनों तक उपवास करते रहे और राम नाम का अविरत जाप करते रहे । भगवान राम के दर्शन की इन्हें अनुपम लालसा थी | वहाँ ये प्रतिदिन एक वृक्ष पर एक लोटा पानी डालते थे | अचानक एक दिन इनकी राम भक्ति और इनके हाथों के स्पर्श जल से उस वृक्ष में स्थित प्रेत कि मुक्ती हो गयी | जाते समय उसने इन्हें कुछ देना चाहा पर तुलसी दास जी ने उस प्रेत से केवल श्री राम दरश की आश ही व्यक्त की | तब उसने कहा की हम अधोगती मे रहने वाले जीव उस परमेश्वर को देख नहीं पाते पर श्री हनुमानजी यहीँ इसी धरा पर घूमते रहते हैं । जहाँ भी श्रीराम कथा होती है वहाँ वे अवश्य जाते हैं । आप इसी चित्रकुट में राम कथा में जायें वहाँ जो सबसे पीछे कोढी के रूप में बैठते हैं वो श्री हनुमानजी ही हैं | आप श्रद्धा भक्ति से उनकी शरण जाइये और उनके चरणों को तब तक ना छोडियेगा जब तक वो अपने दर्शन आपको ना दें । ऐसा ही हुआ, गोस्वामी जी ने रामकथा में छिपे श्री हनुमानजी को पहचान लिया और उनका अनुपम दर्शन प्राप्त किया । श्री हनुमानजी से इन्होंने प्रभु श्रीराम के दर्शन की आशा व्यक्त की | तब श्री हनुमानजी ने इन्हें चित्रकुट के घाट पर चंदन घिसने को कहा और कहा, “प्रभु से मैं प्रार्थना करूँगा, वहाँ प्रभु जरूर आयेंगे । आप उन्हें पहचान लेना ।” तुलसी दास जी भी चित्रकुट के घाट पर चंदन घिसने का कार्य करने लगे | एक दिन प्रभु वहाँ पधारे और चंदन लगाने को माँगा तब तुलसी दास जी महाराज कहीं चूक ना जायें इस लिए हनुमानजी ने एक तोते के रूप में ये चौपाई गानी शुरु की ।

चित्रकुट के घाट पर भयी संतन की भीड, तुलसी दास चंदन घिसे तिलक करे रघुबीर ।

Shri Ram Hanuman

प्रभु को पहचानकर उनके चरणों में गिरे ये भक्तराज और प्रभु श्री राम ने इन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये । प्रभु के चरित्र दर्शन की आशा व्यक्त करने पर प्रभु ने इन्हें त्रेता में घटे पूरे रामायण चरित्र का प्रत्यक्ष दर्शन कराया । इन्होंने समाज के बहुत विरोध के बावजूद भी श्री रामायण जी की रचना की और प्रभु का चरित्र लिखा । पर वो संस्कृत में होने के कारण प्रभु ने इन्हें उसे सरल भाषा में अनुवादित करने की आज्ञा दी । भगवान शंकर और माता पार्वति ने भी इन्हें दर्शन देकर प्रभु का चरित्र लिखने में सहायता की और आशिर्वाद भी दिया । इन्होंने फिर सरल भाषा में प्रभु श्रीराम का चरित्र श्री रामचरित्र मानस का ग्रंथ लिखा जो समाज में आज भी अति लोकप्रिय है । कहते है जब इन्होंने रामायण की चौपाईयाँ गाकर लोगों को सुनाना प्रारंभ किया तो इनके पास भीड बढने लगी । इससे दुखी होकर काशी के विद्वानों ने इनके द्वारा रचित ग्रंथ रामायण जी की निंदा शुरु कर दी । विरोध इस कदर बढा के लोगों ने इनसे प्रमाण मांगना प्रारंभ कर दिया | इनके द्वारा रचित रामचरित्र मानस को काशी विश्वनाथ के मंदिर में रखा गया । प्रातः जब पट खोले गये तब उस पर प्रभु भगवान शंकर के हस्ताक्षर और उस ग्रंथ के चारों और अनुपम प्रकाश तेजोवलय पाया गया । उस ग्रंथ पर प्रभु भगवान शंकर के हस्ताक्षर में सत्यं शिवं सुंदरम लिखा था जिसे देखकर तब से तुलसी दास जी महाराज को सब बडी श्रद्धा से मानने लगे ।

इनकी प्रसिद्धी उस समय के मुगल बादशाहों से बर्दाश्त नहीं हुई और इन संत को बिना किसी कारण के सताने का प्रयास किया | कहते हैं तुलसी दास जी के जीवन में कई चमत्कार घटे | जब इन्हें मुगल बादशाह के आदेश पर मुगल सैनिक पकडने आये तो चमत्कार के रूप में इन्होंने भगवान शंकर के नंदी के सामने प्रसाद रखा तो नंदी की मुर्ती ने जीभ निकालकर उस प्रसाद को ग्रहण किया पर इतने पर भी मुगल बादशाह का इन पर विश्वास न हुआ तो इनको पकडकर जेल में डाल दिया गया और चमत्कार दिखाने को कहा गया | तुलसी दास जी ने कहा हम तो साधारण मेरे प्रभु राम के सेवक हैं पर जब बादशाह न माना तो तुलसी दास जी ने उपवास के साथ रामनाम जप प्रारंभ कर दिया | 24 घंटे के अंदर मुगल सल्तनत में हजारों वानरों की सैना घुस आयी और वहाँ उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया | आखिरकार मुगल बादशाह को इनहें बाईज्जत छोडना पडा । इन पर भी लांछन लगाने में समाज के लोगों ने कोई कमी न छोडी थी | सच्चे संतों को हयाती काल में पहचान पाना बडा मुश्किल होता है । पर उनके चले जाने के बाद समाज उनका गुणगान करता रहता है ।

प्रभु धाम गमन 

तुलसीदास जी जब काशी के विख्यात् असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा, इसके पश्चात् उन्होंने अपनी अन्तिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया। संवत्‌ 1680 में श्रावण कृष्ण सप्तमी शनिवार को तुलसीदास जी ने “राम-राम” कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया और भगवान में विलीन हो गये । आज उनके द्वारा प्रभु श्री राम का चरित्र हम सबके दिलों में हैं और ऐसे संतों का महान योगदान भारत को, भारतीय संस्कृति को बचाये रखना और समाज तक पहुँचाना ये महान कार्य था । समाज को भक्ति रस में सराबोर कर दिया गोस्वामी जी ने । समाज को ईश्वर शक्ति का विश्वास दिलाया गोस्वामी जी ने । समाज में छुपि कूरितियों को हटाकर सत्य मार्ग दिखाया गोस्वामी जी ने ।

आज भले ही गोस्वामी तुलसीदास जी हमारे बीच नहीं है पर उनके द्वारा विरचित ग्रंथों ने हमारे हृदय और हमारे घरों में अपना स्थान बनाया हुआ है ।

ऐसे सच्चे महापुरुष कभी कभी धरती पर आते हैं उन्हें पहचानने के लिए केवल आँखें नहीं वो नजर भी चाहिए जिससे उन्हें पहचाना जा सके ।

संवत सोलह सौ असी ,असी गंग के तीर ।

श्रावण शुक्ला सप्तमी ,तुलसी तज्यो शरीर ।

आज संत आशारामजी बापू जैसे संतों को भी जेल में रखकर सताया जा रहा है | कहीं हम देश के एक महान संत को पहचानने में भूल तो नहीं कर रहे । ऐसे महापुरुषों को हयाती काल में तो सताती है दुनिया पर उनके चले जाने पर सोने चाँदी की मुर्ति बनाती है दूनिया । उनके बनाये ग्रंथों पर पीएचडी तो कर सकते हो आप पर संत तुलसी दास कहाँ से पाओगे ? कहाँ से पाओगे आज ?

जरूरी है संतों महापुरुषों के रहते हुए उनको पहचानकर अपना आत्म कल्याण करना । जो विरले ही कर पाते हैं ।

 

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पूज्य संत श्री आशारामजी बापू  - बलवान कौन है ?

संत श्री आशारामजी बापू का संक्षिप्त जीवन परिचय

सिंध के नवाब जिले के बेराणी गाँव में नगरसेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के श्रीमंत और पवित्र परिवार में वि.सं. 1998 में चैत वद 6 के दिन एक अलौकिक बालक का प्रागट्य हुआ। बालक का नाम रखा गया आसुमल। उनके जन्म के साथ ही परिवार में कई चमत्कारपूर्ण घटनायें घटने लगीं। कोई एक बड़ा सौदागर किसी अगम्य प्रेरणा से वहाँ आया और एक बहुत कीमती झूला नगर सेठ को भेंट दे गया। साढ़े तीन साल की उम्र में ही इस प्रज्ञावान मेधावी बालक ने स्कूल में सिर्फ एक ही बार कविता सुन कण्ठस्थ करके विद्यार्थियों एवं अध्यापकों को आश्चर्यचकित कर दिया। कुलगुरु ने भविष्यकथन कियाः ‘यह बालक आगे जाकर एक महान संत बनेगा और लोगों का उद्धार करेगा।’ कुदरत ने करवट ली। सन् 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन में सेठ थाऊमलजी अपनी सारी धन-सम्पत्ति, जमीन-जायदाद, पशुधन, मानों अपना एक रजवाड़ा पाकिस्तान में छोड़कर भारत, अमदावाद में आकर बस गये। बालक आसुमल के पढ़ाई की व्यवस्था एक स्कूल में कर दी गयी लेकिन ब्रह्मविद्या के राही इस बालक को लौकिक विद्या पढ़ने में रुचि नहीं हुई। वे किसी पेड़ के नीचे एकांत में जाकर ध्यानमग्न हो जाते। प्रसन्नता और अन्य अलौकिक गुणों के कारण वे अपने स्कूल के अध्यापकों के प्रिय विद्यार्थी बन गये। आसुमल की छोटी उम्र में ही पिता की देह शांत हो गयी। बालक आसुमल को परिवार के भरण-पोषणार्थ बड़े भाई के साथ व्यापार-धंधे में सम्मिलित होना पड़ा। अपनी कुशाग्र लाभ कराया लेकिन खुद को केवल आध्यात्मिक धन का अर्जन करने की लगन रही। पिता के निधन के बाद आसुमल की विवेकसंपन्न बुद्धि ने संसार की असारता और परमात्मा ही एकमात्र परम सार है यह बात जान ली थी। ध्यान-भजन में प्रारंभ से ही रूचि थी। दस वर्ष की उम्र में तो अनजाने ही रिद्धि-सिद्धि सेवा में हाजिर हो गयी थी लेकिन अगम के ये प्रवासी वहीं अटकनेवाले नहीं थे। वैराग्य की अग्नि उनके अंतरतम में प्रकट हो चुकी थी। कुछ बड़े होते ही घरवालों ने आसुमल की शादी करने की तैयारी की। आसुमल सचेत हो गये। घर छोड़कर पलायन हो गये लेकिन घरवालों ने उन्हें खोज लिया। तीव्रतर प्रारब्ध के कारण शादी हो गयी। आसुमल उस सुवर्ण-बन्धन में रुके नहीं। सुशील पवित्र धर्मपत्नी लक्ष्मीदेवी को समझाकर अपने परम लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति, आत्म-साक्षात्कार के लिए घर छोड़कर चले गये। आप जंगलों में, पहाड़ों में, गुफाओं में एवं अनेक तीर्थों में घूमे, कंटकील-पथरीले मार्गों पर चले, शिलाओं की शैया पर सोये, मौत का मुकाबला करना पड़े ऐसे स्थानों में जाकर अपने उग्र कठोर साधनाएँ कीं। इन सब तितिक्षाओं के बाद नैनीताल के जंगल में आपको ब्रह्मनिष्ठ सदगुरुदेव परम पूज्य स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज के श्रीचरणों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। वहाँ भी कठोर कसौटियाँ हुईं किन्तु आप सब कसौटियाँ पार करके सदगुरुदेव का कृपा-प्रसाद पाने के अधिकारी बन गये। गुरुदेव ने आसुमल  घर में ही ध्यान-भजन करने का आदेश देकर अमदावाद वापस भेज दिया। घर तो आये लेकिन जिस सच्चे साधक का आखिरी लक्ष्य सिद्ध न हुआ हो उसको चैन कहाँ?

चातक मीन पतंग जबपिय बिन नहीं रह पाय।

साध्य को पाये बिनासाधक क्यों रह जाय?

वे घर छोड़ नर्मदा किनारे जाकर अनुष्ठान में संलग्न हो गये। एक बार नदी के किनारे ध्यानस्थ बैठे थे। मध्यरात्रि के वक्त तूफान-आँधी चली। वे उठे और किसी एक मकान के बरामदे में जाकर बैठ गये और जगत को भूलकर उसी प्यारे परमात्मा के ध्यान में फिर से डूब गये। रात बीती जा रही थी। कोई एक मच्छीमार लघुशंका करने बाहर निकला तो आपको वहाँ बैठे हुए देखकर चौंका। आपको चोर डाकू समझकर उसने पूरे मोहल्ले को जगाया। भीड़ इकट्ठी हो गयी। आप पर हमला करने के लिए लोगों ने लाठी, भाला, चाकू-छुरी, धारिया लेकर आपको घेर लिया। लेकिन….

जाको राखे साँईयाँ मार सके न कोय।

हाथ में हथियार होने पर भी वे मच्छीमार लोग आसुमल के नजदीक न आ सके, क्योंकि जिनके पास आत्मशांति का हथियार होता है उनका लाठी,भाला, चाकू, छुरीवाले मच्छीमार क्या कर सकते हैं? उस विलक्षण प्रसंग का वास्तविक वर्णन करना यहाँ असंभव है। ईश्वर की शांति में डूबने से जन्म-मरण का चक्कर रुक जाता है तो मच्छीमारों के हथियार रुक जायें और मन बदल जाय इसमें क्या आश्चर्य है? शोरगुल सुनकर आसुमल का ध्यान टूटा। परिस्थिति का ख्याल आया। आत्ममस्ती में मस्त, स्वस्थ शांतचित्त होकर वे खड़े हुए। हमला करने के लिए तत्पर लोगों पर एक प्रेमपूर्ण दृष्टि डालते हुए, धीर-गंभीर निश्चल कदम उठाते हुए आसुमल भीड़ को चीरकर बाहर निकल गये। बाद में लोगों को पता चला तो माफी माँगी और अत्यंत आदर करने लगे। फिर वे गणेशपुरी में अपने एकान्तस्थान में पधारे हुए सदगुरुदेव प.पू. लीलाशाहजी महाराज के श्रीचरणों में पहुँच गये। साधना की इतनी तीव्र लगन वाले अपने प्यारे शिष्य को देखकर सदगुरुदेव का करुणापूर्ण हृदय छलक उठा। उनके हृदय से बरसते कृपा-अमृत ने साधक की तमाम साधनायें पूर्ण कर दी। पूर्ण गुरु ने शिष्य को पूर्ण गुरुत्व में सुप्रतिष्ठित कर दिया। साधक में सिद्ध प्रकट हो गया। जीव को अपने शिवत्व की पहचान हो गयी। उस परम पावन दिन आत्म-साक्षात्कार हो गया। आसुमल में से संत श्री आशारामजी महाराज का आविर्भाव हो गया। उसके बाद कुछ वर्ष डीसा में ब्रह्मानन्द की मस्ती लूटते हुए एकान्त में रहे। फिर अमदावाद में मोटेरा गाँव के पास साबरमती नदी के किनारे भक्तों ने एक कच्ची कुटिया बना दी। वहाँ से उन पूर्ण विकसित सुमधुर आध्यात्मिक पुष्प की मधुर सुवास चारों दिशाओं में फैलने लगी। दिन को भी जहाँ चोरी और खून की घटनायें हो जायें ऐसी डरावनी उबड़-खाबड़ भूमि में स्थित वह कुटिया आज एक महान तीर्थधाम बन चुकी है। उसका नाम है संत श्री आशारामजी आश्रम। इस ज्ञान की प्याऊ में आकर समाज के सुप्रतिष्ठित श्रीमंत लोगों से लेकर सामान्य जनता ध्यान और सत्संग का अमृत पीते हैं और अपने जीवन की दुःखद गुत्थियाँ सुलझाकर धन्य होते हैं। यहाँ वर्ष भर में दो-तीन बड़ी ध्यान योग शिविरें लगती हैं। हर रविवार और बुधवार के दिन भी ऐसी ही एक ‘मिनी शिविर’ हो जाती है। इस साबर तट स्थित आश्रमरूपी विशाल वटवृक्ष की शाखाएँ आज भारत ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्वभर में फैल चुकी हैं। आज विश्वभर में करीब 400 से अधिक आश्रम स्थापित हो चुके हैं जिनमें हर वर्ण, जाति एवं संप्रदाय के लोग देश-विदेश से आकर आत्मानंद में डुबकी लगाते हैं, अपने को धन्य-धन्य अनुभव करते हैं और हृदय में परमेश्वर का शांति प्रसाद पाते हैं।

दिनांक ६-११-२०१३ को जोधपुर सत्र न्यायालय में पुलिस द्वारा निर्दोष पूज्य बापूजी व अन्य सेवादारों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किया गया । आरोप-पत्र में पूज्य बापूजी सहित शिवा भाई, शरदचन्द्र भाई, प्रकाश भाई तथा शिल्पी बहन को आरोपी बनाया गया है । मूल आरोप-पत्र १५ पृष्ठों का है, जिसमें उत्तर प्रदेश की लड़की को मोहरा बनाकर उसके द्वारा गढ़वायी गयी एकदम झूठी व मनगढ़त कहानी के वाहियात आरोपों का उल्लेख है । आरोप-पत्र के साथ ५८ गवाहों के बयान जोड़े गये हैं । इसमें अमृत प्रजापति, महेन्द्र चावला, राहुल सचान, अजय कुमार जैसे लोगों को भी गवाह बनाया गया है, जो अपराधी प्रवृत्ति के हैं और इनके काले कारनामों की सच्चाई आप ‘सच’ भाग-१ मेन पढ़ सकते हैं । इनके अलावा आरोप-पत्र में कई गवाह ऐसे भी हैं जिन्होंने पूज्य बापूजी व आश्रम के पक्ष में बयान दिये हैं । पुलिस द्वारा न्यायालय में पेश किया गया आरोप-पत्र कितना बेबुनियाद है एवं इसमें लिखे गये तथ्यों को पुलिस अधिकारियों ने कितना जाँचा है यह अपने-आपमें एक बड़ा सवाल है । क्योंकि आरोप-पत्र में शिल्पी बहन का लिंग ‘पुरुष’ लिखा गया है । एफआईआर के आधार पर दिल्ली पुलिस ने नये कानून का दुरुपयोग करते हुए ८ धाराएँ लगायी थीं । उसके बाद जोधपुर पुलिस ने नये कानून का और भी तीव्रता से दुरुपयोग किया और अन्य धाराओं को भी आरोप-पत्र में लगा दिया, जिससे यह साबित किया जा सके कि आश्रम में सेक्स रैकेट चलता है । पुलिस द्वारा आरोप-पत्र में चाहे जो भी धाराएँ लगा दी गयी हों लेकिन महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आरोप-पत्र कोई न्यायाधीश का फैसला नहीं होता । यह तो मात्र कानूनी प्रकिया का एक हिस्सा है जो कि हर मामले में पुलिस के द्वारा बनाया जाता है । लेकिन जब न्यायालय में सबूत रखने की बात आती है, सच्चाई तो उस समय सामने आती है । आरोप-पत्र में जो धाराएँ लगायी गयी हैं, उनके संदर्भ में क्या-क्या बनावटी सबूत खड़े किये गये हैं और किन-किन लोगों पर दबाव डालकर झूठे बयान लिये गये हैं – ये सब बातें न्यायालय के सामने स्पष्ट हो जायेंगी । न्यायालय से जाते समय पूर्णतः निर्दोष पूज्य बापूजी ने मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए कहा : ‘‘आरोप २१० प्रतिशत बोगस हैं, बनावटी हैं, आरोप सच्चे हैं ही नहीं तो स्वीकार क्या करना ! मेरी सच्चाई मेरे साथ है ।’

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पूज्य संत श्री आशारामजी बापू – बलवान कौन है ?

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