आसाराम बापू के बेटे श्री नारायण साईं के खिलाफ झूठे बलात्कार के एक मामले में झूठे गवाह महेंद्र चावला को मोटरसाइकिल सवार अज्ञात हमलावरों ने आज सुबह को हरियाणा के पानीपत में गोली मार दी.
मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक़ उन्हें गंभीर रूप से घायल अवस्था में एक स्थानीय अस्पताल में दाखिल कराया गया है |
संत श्री आसारामजी आश्रम में कई साल तक रहने के बाद धोका-धड़ी करने के कारण आश्रम से निकाले गए महेंद्र चावला आसाराम बापू और श्री नारायण साईं के खिलाफ कई झूठे और बेबुनियाद बयान कर चुका है |
नारायण साईं पर सूरत की दो बहनों ने बलात्कार का झूठा आरोप लगाया था |
महेंद्र चावला ने अपनी जान को ख़तरा बताया था. गुजरात पुलिस के कहने पर हरियाणा पुलिस ने उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई थी |
सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल को श्री नारायण साईं की जमानत याचिका का ख़ारिज कर दी थी | श्री नारायण साईं ने अपनी माँ के दिल के ऑपरेशन के लिए ज़मानत मांगी थी |
अदालत ने कहा कि उन्हें जमानत तभी मिलेगी, जब डॉक्टर यह बता देंगे कि उनकी माँ का ऑपरेशन किस तारीख़ को होगा |
गौर तलब है की भोलानंद नें एक लाइव प्रोग्राम में ये स्पष्टता कर दी थी की बापूजी के दुश्मन ही गवाहों को जान से मार देंगे ये पहले से निश्चित हो चूका है |
देखिये भोलानंद का विडियो :
महेंद्र चावला के भाई महेंद्र चावला की सच्चाई कैमरा के सामने उजागर कर रहे है |
Recitation of Vedic Shraaddh Mantras
While the Brahmins are having their meals, one should recite the Rakshak, i.e. protective mantra, and scatter some sesame seeds on the floor. One should visualise those illustrious Brahmins as the manes.
The protective mantra is as follows:
‘Yajneshwaro yajnasamastaneta bhokta avyayatma haririshvaroastu
Tatsannidhanadapayantu sadyo rakshamsyasheuaoyasurashcha sarve.’
‘Lord Shri Hari (Lord Vishnu) is present here who savours the offerings made in all sacrificial Yajnas. As such, in his pious presence there is no room here for the wicked demonic elements who should flee immediately.’ (Varaha Purana 14:32)
When the Brahmins are having their meals, visualise and make the sankalpa that your parents, grandparents, great grand parents are all present in those Brahmins, and may they be thus satiated.
It is a common knowledge that rupees can be transferred from here and delivered to other countries in their respective currencies. Similarly the fruits of Shraaddh and the oblations thereof are transferred to wherever and in whatever state the manes may be. But one very important thing is that the name of the ancestor, his father’s name and that of his lineage should be pronounced clearly.
According to the Vishnu Purana (3:16:16):
“The offerings of food, made in the course of Shraaddh with faith, and with name and lineage clearly pronounced, are duly delivered to those manes in the manner and form as may be conducive to them.”
हमारे ऋषियों ने ब्रह्माण्ड के तत्वों का सूक्ष्म अध्ययन करके उनसे लाभ लेने के लिए अनेक प्रयोग किये। सनातन धर्म के मंदिरों की छत पर बनी त्रिकोणीय आकृति उन्हीं प्रयोगों में से एक है। जिसे वास्तुशास्त्र एवं वैज्ञानिक भाषा में पिरामिड कहते हैं। यह आकृति अपने-आप में अदभुत है।
पिरामिड चार त्रिकोणों से बना होता है। ज्यामितिशास्त्र के अनुसार त्रिकोण एक स्थिर आकार है। अतः पिरामिड स्थिरता का प्रदाता है। पिरामिड के अंदर बैठकर किया गया शुभ संकल्प दृढ़ होता है। कई प्रयोगों से यह देखा गया कि किसी बुरी आदत का शिकार व्यक्ति यदि पिरामिड में बैठकर उसे छोड़ने का संकल्प करे तो वह अपने संकल्प में सामान्य अवस्था की अपेक्षा कई गुना अधिक दृढ़ रहता है और उसकी बुरी आदत छूट जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पिरामिड में कोई भी दूषित, खराब या बाधक तत्त्व नहीं टिकते हैं। अपनी विशेष आकृति के कारण यह केवल सात्त्विक ऊर्जा का ही संचय करता है। इसीलिए थोड़े दिनों तक पिरामिड में रहने वाले व्यक्ति के दुर्गुण भी दूर भाग जाते हैं।
पिरामिड में किसी भी पदार्थ के मूल कण नष्ट नहीं होते इसलिए इसमें रखे हुए पदार्थ सड़ते-गलते नहीं हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है मिस्र के पिरामिडों में हजारों वर्ष पहले रखे गये शव, जो आज भी सुरक्षित हैं।
मिस्र के पिरामिड मृत शरीर को नष्ट होने से बचाने के लिए बनाये गये हैं। इनकी वर्गाकार आकृति पृथ्वी तत्त्व का ही गुण संग्रह करती है जबकि मंदिरों के शिखर पर बने पिरामिड वर्गाकार के साथ-साथ तिकोने व गोलाकार आकृति के होने से पंच महाभूतों को सक्रिय करने के लिए बनाये गये हैं। इस प्रकार के सक्रिय (ऊर्जामय) वातावरण में भक्तों की भक्ति, क्रिया तथा ऊर्जाशक्ति का विकास होता है।
पिरामिड ब्रह्माण्डीय ऊर्जा जिसे विज्ञान कॉस्मिक एनर्जी कहता है, उसे अवशोषित करता है। ब्रह्माण्ड स्वयं ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का स्रोत है तथा पिरामिड अपनी अदभुत आकृति के द्वारा इस ऊर्जा को आकर्षित कर अपने अंदर के क्षेत्र में घनीभूत करता है। यह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा पिरामिड के शिखरवाले नुकीले भाग पर आकर्षित होकर फिर धीरे-धीरे इसकी चारों भुजाओं से पृथ्वी पर उतरती है। यह क्रिया सतत चलती रहती है तथा इसका अद्वितीय लाभ इसके भीतर बैठे व्यक्ति या रखे हुए पदार्थ को मिलता है।
दक्षिण भारते के मंदिरों के सामने अथवा चारों कोनों में पिरामिड आकृति के गोपुर इसी उद्देश्य से बनाये गये हैं। ये गोपुर एवं शिखर इस प्रकार से बनाये गये हैं ताकि मंदिर में आने-जाने वाले भक्तों के चारों ओर ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का विशाल एवं प्राकृतिक आवरण तैयार हो जाय।
अपनी विशेष आकृति से पाँचों तत्त्वों को सक्रिय करने के कारण पिरामिड शरीर को पृथ्वी तत्त्व के साथ, मन को वायु तथा बुद्धि को आकाश-तत्त्व के साथ एकरूप होने के लिए आवश्यक वातावरण तैयार रहता है।
पिरामिड किसी भी पदार्थ की सुषुप्त शक्ति को पुनः सक्रिय करने की क्षमता रखता है। फलतः यह शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू के दिशा-निर्देशन में उनके कई आश्रमों में साधना के लिए पिरामिड बनाये गये हैं। मंत्रजप, प्राणायाम एवं ध्यान के द्वारा साधक के शरीर में एक प्रकार की विशेष सात्त्विक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा उसके शरीर के विभिन्न भागों से वायुमण्डल में चली जाती है परंतु पिरामिड ऊर्जा का संचय करता है। अपने भीतर की ऊर्जा को बाहर नहीं जाने देता तथा ब्रह्माण्ड की सात्त्विक ऊर्जा को आकर्षित करता है। फलतः साधक पूरे समय सात्त्विक ऊर्जा के बीच रहता है।
आश्रम में बने पिरामिडों में साधक एक सप्ताह के लिए अंदर ही रहता है। उसका खाना पीना अंदर ही पहुँचाने की व्यवस्था है। इस एक सप्ताह में पिरामिड के अंदर बैठे साधक को अनेक दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। यदि उस साधक की पिरामिड में बैठने से पहले तथा पिरामिड से बाहर निकलने के बाद की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो पिरामिड के प्रभाव को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
पिरामिड द्वारा उत्पन्न ऊर्जा शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदल देती है जिसके कारण कई रोग भी ठीक हो जाते हैं। व्यक्ति के व्यवहार को परिवर्तित करने में भी यह प्रक्रिया चमत्कारिक साबित हुई है। विशेषज्ञों ने तो परीक्षण के द्वारा यहाँ तक कह दिया कि पिरामिड के अंदर कुछ दिन तक रहने पर मांसाहारी पशु भी शाकाहारी बन सकता है।
इस प्रकार पिरामिड की सात्त्विक ऊर्जा का यदि साधना व आदर्श जीवन के निर्माण हेतु प्रयोग किया जाय तो आशातीत लाभ हो सकते हैं। हमारे ऋषियों का मंदिरों की छतों पर पिरामिड शिखर बनाने का यही हेतु रहा है। हमें उनकी इस अनमोल देन का यथावत् लाभ उठाना चाहिए।
अधिकांश लोग यही समझते हैं किं पिरामिड मिस्र की देन है परंतु यह सरासर गलत है। पिरामिड के बारे में हमारे ऋषियों ने मिस्र के लोगों से भी सूक्ष्म एवं गहन खोजें की हैं। मिस्र के लोगों ने पिरामिड को मात्र मृत शरीरों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया जबकि हमारे ऋषियों ने इसे जीवित मानव की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए बनाया है।
भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है तथा भारत के अति प्राचीन शिल्पग्रंधों एवं शिवस्वरोदय जैसे धार्मिक ग्रंथों में भी पिरामिड की जानकारी मिलती है। अतः यह सिद्ध होता है कि पिरामिड मृत चमड़े की सुरक्षा करने वाले मिस्रवासियों की नहीं अपितु जीवात्मा एवं परमात्मा के एकत्व का विज्ञान जानने वाले भारतीय ऋषियों की देन है।
जो चैतन्य सबके रोम-रोम में बस रहा है वह राम…… जो चैतन्य सबको आकर्षित कर रहा है वह कृष्ण…. उस चैतन्य में अगर मन लग जाये तो बेड़ा पार है। जहाँ से हमारी संवित उठती है वही सारे विश्व का आधार है। वही तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा तुम्हारे अति निकट है और सदा रहता है। पत्नी का साथ छोड़ना पड़ेगा, पति का साथ छोड़ना पड़ेगा, साहब का साथ छोड़ना पड़ेगा, अरे लाला ! इस शरीर का भी साथ छोड़ना पड़ेगा लेकिन उस अन्तर्यामी साथी का साथ कभी नहीं छोड़ना पड़ेगा। बस, अभी से उसी में आ जाना है, और क्या करना है ? यह कोई बड़ा काम है ? जिसका कभी साथ नहीं छूटता है उसमें राग करना है। जिसका साथ टिकता नहीं है उससे राग हटा देना है।
साथ टिकेगा नहीं उस चीज से अपना राग हटा लेंगे तो तुम स्वतन्त्र हो जाओगे। अगर साथ न टिकने वाली चीजों में राग रहा तो कितना दुःख होगा ! दुःख ही होगा, और क्या होगा ?
हम उसी से सम्बन्ध जोड़ रहे हैं जिससे आखिर तोड़ना है। जिससे सम्बन्ध तोड़ना है उसके साथ तो प्रारब्धवेग से सम्बन्ध होता रहेगा, आता रहेगा, जाता रहेगा….. लेकिन जिससे सम्बन्ध कभी नहीं टूटता उसकी केवल स्मृति रखनी है, सम्बन्ध जोड़ने का परिश्रम भी नहीं करना है। दुनिया के अन्य तमाम सम्बन्धों को जोड़ने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।
कलेक्टर की कुर्सी के लिए सम्बन्ध जोड़ना है तो बचपन से पढ़ाई करते-करते…. मजदूरी करते-करते…. परीक्षाओं में पास होते-होते आखिर आई.ए.एस. हो गये। फिर कलेक्टर पद पर नियुक्ति हुई तब कुर्सी से सम्बन्ध जुड़ा। कभी एक जिले में तो कभी दूसरे जिले में बदली होती रही….. आखिर बुढ़ापे में साहब बेचारा देखता ही रह जाता है। जवानी में तो हुकूमत चलाई लेकिन अब छोरे कहना नहीं मानते। इससे तो हे भगवान ! मर जाएँ तो अच्छा।
अरे ! तू मरने के लिए जन्मा था कि मुक्त होने के लिए जन्मा था ?
तुम पैदा हुए थे मुक्त होने के लिए। तुम पैदा हुए थे अमर आत्मेदव को पाने के लिए।
“पढ़ते क्यों हो ?”
“पास होने के लिए।”
“पास क्यों होना है ?!”
“प्रमाणपत्र पाने के लिए।”
“प्रमाणपत्र क्यों चाहिए ?”
“नौकरी के लिए।”
“नौकरी क्यों चाहिए ?”
“पैसे कमाने के लिए।”
“पैसे क्यों चाहते हो ?”
“खाने के लिए।”
“खाने क्यों चाहते हो ?”
“जीने के लिए।”
“जीना क्यों चाहते हो ?”
“…………….”
कोई जवाब नही। कोई ज्यादा चतुर होगा तो बोलेगाः “मरने के लिए।” अगर मरना ही है तो केवल एक छोटी सी सुई भी काफी है। मरने के लिए इतनी सारी मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में हर जीव की मेहनत है स्वतन्त्रता के लिए, शाश्वतता के लिए, मुक्ति के लिए। मुक्ति तब मिलती है जब जीव रागरहित होता है।
यदि हमारा मन ईर्ष्या-द्वेष से रहित बिल्कुल शुद्ध हो तो जगत की कोई वस्तु हमें नुक्सान नहीं पहुँचा सकती | आनंद और शांति से भरपूर ऐसे महात्माओं के पास क्रोध की मूर्ति जैसा मनुष्य भी पानी के समान तरल हो जाता है | ऐसे महात्माओं को देख कर जंगल के सिंह और भेड़ भी प्रेमविह्वल हो जाते हैं | सांप-बिच्छू भी अपना दुष्ट स्वभाव भूल जाते हैं |
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