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गुरु मेरी पूजा गुरु गोविन्द गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत.. आसारामजी बापू


भजन - गुरु मेरी पूजा

गुरु मेरी पूजा – आसाराम बापूजी

गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द ..
गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु मेरा देऊ , अलख अभेऊ , सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु का दर्शन …. देख – देख जीवां , गुरु के चरण धोये -धोये पीवां..

गुरु बिन अवर नही मैं ठाऊँ , अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु मेरा ज्ञान , गुरु हिरदय ध्यान , गुरु गोपाल पुरख भगवान्
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

ऐसे गुरु को बल-बल जाइये .. आप मुक्त मोहे तारें..

गुरु की शरण रहो कर जोड़े , गुरु बिना मैं नही होर
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु बहुत तारे भव पार , गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

अंधकार में गुरु मंत्र उजारा , गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु पूरा पाईया बडभागी , गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

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Ram Navmi

सद्गुणों की खान : भगवान श्रीराम


Bhagwan Shri Ram

सद्गुणों की खान : भगवान श्रीराम

सद्गुणों की खान : भगवान श्रीराम
(श्रीराम नवमी : २८ मार्च)

भगवान श्रीरामजी के सद्गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं :
धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः । क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः।।
मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः । प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः ।।
‘श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान, अदोषदर्शी, सहिष्णु, दीन-दुःखियों को सांत्वना  प्रदान  करनेवाले,  मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय  वचन  बोलनेवाले  और  सत्यवादी हैं ।       (वा.रामायण, अयो.कां. : २.३१,३२)
भगवान श्रीराम किसीके दोष नहीं देखते थे । वे सदा शांतचित्त रहते और सांत्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे । यदि उनसे कोई कठोर बात भी कह देता तो वे उसका प्रत्युत्तर नहीं देते थे । कभी कोई उन पर एक बार भी उपकार कर देता तो वे  उसके  उस  एक  ही  उपकार  से  सदा संतुष्ट रहते  और किसीके सैक‹डों अपराध करने पर भी उसके अपराधों को याद  नहीं  रखते  थे ।  वे  सदा  चरित्र  में उत्तम, ज्ञान में तथा अवस्था में बढे-चढे सत्पुरुषों के साथ ही बातचीत करते और उनसे विनय से पेश आते थे । वे अपने पास आये हुए मनुष्यों से अपनी ओर से बातचीत शुरू करते और ऐसी बातें बोलते जो उन्हें प्रिय लगें । महान बल और पराक्रम से संपन्न होने पर भी उन्हें उनका कभी गर्व नहीं होता था। दुर्वचन और झूठी बात तो उनके मुख से कभी निकलती ही नहीं थी । वे विद्वान थे और सदा वृद्ध पुरुषों का सम्मान किया करते थे । अमंगलकारी निषिद्ध कर्म में उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी, शास्त्रविरुद्ध बातों को सुनने में उनकी रुचि नहीं  थी । अपने  न्याययुक्त  पक्ष  के  समर्थन  में  वे बृहस्पति के समान एक से ब‹ढकर एक दृष्टांत देते थे । वे कल्याण की जन्मभूमि, दैन्यरहित और सरल थे । धर्म के ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणों के द्वारा उन्हें उत्तम शिक्षा प्राप्त हुई थी । वे बडे बुद्धिमान, स्मरणशक्ति से संपन्न और  प्रतिभाशाली  थे ।  गुरुजनों  के  प्रति  उनकी  दृढ भक्ति थी । वे लोक-व्यवहार के संपादन में समर्थ और समयोचित धर्माचरण में कुशल थे ।
वे विनयशील, अपने अभिप्राय को छिपानेवाले, मंत्र  को  गुप्त  रखनेवाले  और  उत्तम  सहायकों  से संपन्न थे । वस्तुओं के त्याग और संग्रह के अवसर को वे भलीभाँति जानते थे । वे   आलस्यरहित,   प्रमादशून्य   तथा अपने और पराये मनुष्यों के दोषों को भली प्रकार जाननेवाले थे । वे शास्त्रों के ज्ञाता, उपकारियों के प्रति कृतज्ञ तथा दूसरे पुरुषों के मनोभावों को जानने में कुशल थे । दर्प और ईष्र्या का उनमें अत्यंत अभाव था । किसी भी प्राणी के मन में उनके प्रति अवहेलना का भाव नहीं था । उन्हें सत्पुरुषों के संग्रह और पालन तथा दुष्ट पुरुषों के निग्रह (दंड देना,  वश  में  रखना)  के  अवसरों  का ठीक-ठीक ज्ञान था । आय के उपायों को वे अच्छी तरह जानते थे (अर्थात् फूलों  को नष्ट न करके   उनसे   रस लेनेवाले  भ्रमरों  की  भाँति  वे  प्रजा  को कष्ट  दिये  बिना  ही  उनसे  न्यायोचित धन  का  उपार्जन  करने  में  कुशल  थे) तथा   शास्त्रवर्णित   व्यय-कर्म   का   भी उन्हें   ठीक-ठीक   ज्ञान   था  । अपने   सद्गुणों   के   कारण   वे प्रजाजनों  को  प्राणों  की  भाँति प्रिय  थे  ।  मन  और  इन्द्रियों  के संयम    आदि    सद्गुणों    द्वारा श्रीराम  वैसी  ही  शोभा  पाते  थे,  जैसे  तेजस्वी  सूर्य अपनी किरणों से सुशोभित होते हैं ।
जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का कुशल-मंगल पूछता है, उसी प्रकार वे क्रमशः नगरवासियों से प्रतिदिन उनके पुत्रों, अग्निहोत्र की अग्नियों, स्त्रियों, सेवकों, शिष्यों, अनुचरों का कुशल-समाचार पूछा करते थे । पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों से सदा पूछते रहते कि ‘आपके शिष्य आप लोगों की सेवा करते हैं न ? क्षत्रियों से यह जिज्ञासा करते कि ‘आपके सेवक कवच आदि से सुसज्जित हो आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं न ?
किसीसे   वार्तालाप   करते   समय   वे   पहले मुस्कराकर फिर वार्तालाप आरंभ करते थे । उन्होंने संपूर्ण हृदय से धर्म का आश्रय ले रखा था । qनदनीय बातों की चर्चा में उनकी कभी रुचि नहीं होती थी । उनकी इन्द्रियाँ राग आदि दोषों से दूषित नहीं होती थीं । उनका स्वभाव साधु पुरुषों के समान, हृदय उदार और बुद्धि विशाल थी । वे प्रजा को सुख देने में चंद्रमा की और क्षमारूपी गुण में पृथ्वी की समानता रखते थे । वे वृद्ध पुरुषों के सेवक तथा ब्राह्मणों (ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मज्ञानी) के उपासक  थे  और  सदा  ही उनका संग किया करते थे । वे महान धनुर्धर, वेदों के यथार्थ  ज्ञाता  और  संपूर्ण  विद्याओं  में  भलीभाँति निष्णात थे । वे परम दयालु एवं क्रोध को जीतनेवाले थे । उनके मन में दीन-दुःखियों के प्रति ब‹डी दया थी । वे बाहर-भीतर से परम पवित्र थे । उनका शरीर नीरोग था । वे अच्छे वक्ता, सुंदर शरीर से सुशोभित तथा देश-काल के तत्त्व को समझनेवाले थे । प्रजा का श्रीरामजी के प्रति और श्रीरामजी का प्रजा के प्रति ब‹डा अनुराग था । वे संग्रामभूमि से विजय प्राप्त किये बिना पीछे नहीं लौटते थे । जो शास्त्र के अनुसार प्राणदंड पाने के अधिकारी होते, उनका वे नियमपूर्वक वध कर देते तथा जो शास्त्रदृष्टि से अवध्य होते, उन पर कदापि कुपित नहीं होते थे। संपूर्ण लोकों को आनंदित करनेवाले श्रीरामजी शूरता, वीरता, पराक्रम आदि के द्वारा सदा प्रजा का पालन करने में लगे रहते थे। वे सभी प्राणियों के लिए आदरणीय एवं स्थितप्रज्ञ थे ।

भगवान श्रीरामजी के सद्गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं : ‘श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान, अदोषदर्शी, सहिष्णु, दीन-दुःखियों को सांत्वना  प्रदान  करनेवाले,  मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय  वचन  बोलनेवाले  और  सत्यवादी हैं ।

(वा.रामायण, अयो.कां. : २.३१,३२)

 यह भी देखे:

“भगवान के अवतार” आसारामजी बापू

|| श्री राम चालीसा ||

श्रीराम स्तुति

 

 

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Abhyas, कथा अमृत, दर्शन ध्यान, प्रश्नोत्तरी, यौगिक प्रयोग, विचार विमर्श, विवेक जागृति, सनातन संस्कृति, Bapuji

आत्मा की भूख !


प्रायः व्यक्ति अपने शरीर की शानऔर शौकत पर तो बेहद ध्यान देता है, शरीर की खुशामद करने में कभी पीछे नहीं रहता; आगे से आगे उसके लिए पहनने-ओढने, खाने-पीने, घूमने-फिरने का बंदोबस्त किये रहता है, पर क्या कभी इस पर विचार किया है कि जिस आत्मा की चेतना से उसका ये शरीर चलता है, उसकी ये सांसें चलती हैं, कभी उसकी तरफ भी ध्यान देना चाहिए | कभी उस आत्मा की देख-भाल हेतु कुछ करना चाहिए ? यदि किसी से ये प्रश्न किये जायेंगे तो स्वभावतः उसका उत्तर “ना” ही होगा क्योंकि संसार की आपाधापी में मनुष्य इतना व्यस्त हो जाता है कि वो ये भूल ही जाता है की उसे अपने आतंरिक उद्धार के लिए भी कुछ सोचना, कुछ करना चाहिए जो अंततः उसके काम आयेगा, उसके साथ जायेगा |

 

आइये, आज हम यहाँ पर एक छोटे से संवाद के माध्यम से आपको ये बताने का, ये समझाने का प्रयास करेंगे कि शरीर के साथ साथ आत्मा की देखभाल भी उतनी ही आवश्यक है |

aatma ki bhookh

तो चलिए सुनते हैं शरीर और आत्मा की बातें :-

सुबह के 4 बजे:-

आत्मा – चलो उठो साधना का समय हो गया है ! उठो ना !

शरीर – सोने दो न ! क्यों तंग कर रही हो ? पता नहीं क्या रात को बहुत देर से सोया था………
थोड़ी देर के बाद साधना करूँगा ।

आत्मा – ठीक है, और मन में सोचने लगी मुझे भूख लगी है और ये है क़ि समझता ही नहीं है 😥

सुबह के 6 बजे:-

आत्मा बोली – अब तो उठ जाओ भाई ! सूरज भी आपनी किरणे फैलाते हुए हमें उठा रहा है उठो न, plzzzzz.

शरीर – कितना परेशान करती हो ! ठीक है उठ रहा हूँ  | बस 5 मिनट और सोने दो !

आत्मा छटपटाती हुई  शरीर के इंतजार में  कि ये कब  उठेगा और कब मेरी भूख को शांत करेगा !!!!!

थोड़ी देर बाद साधना में बैठने के लिए शरीर ने वक्त निकाला | 20-25 मिनट साधना में बैठा और आत्मा कुछ तृप्त ही हुई थी की शरीर उठ गया…….

आत्मा – अरे रे रे रे क्या हुआ ? क्यों उठ गए अभी तो मैं  तृप्त हुई भी नहीं हूँ  कि तुम उठ रहे हो !!!!!  क्या हुआ भाई ? कहाँ जा रहे हो ?

शरीर – अरे मुझे (ऑफिस or घर का ) काम पर जाना है; तुम्हारी तो कुछ समझ में ही नहीं आता !!!!

आत्मा – ठीक है | शाम को तो साधना करोगे न ?

शरीर – (परेशान होते हुए ) हाँ भई  हाँ ।

सारा दिन निकल गया आत्मा भूख से तड़पते हुए …शाम हो गई आत्मा खुश हुई चलो अब तो मेरी भूख का निवारण हो ही जायेगा …

शरीर ऑफिस और  घर के काम से कुछ फ्री हुआ ही था कि आत्मा  आवाज देती है ।

आत्मा – अरे फ्री हो गए ! अब तो चल ही सकते हो साधना के लिए | चलो न ।

शरीर – क्यों सारा दिन तंग करती रहती हो ? देखती नहीं हो मैं अभी ऑफिस और घर के कामों से फ्री हुआ हूँ, थक गया हूँ ।

आत्मा – अरे तुम थके हुए हो तो साधना में जैसे ही बैठोगे तो तुम्हारी थकान चुटकी में दूर हो जाएगी …

शरीर – नहीं अभी नहीं रात को पक्का बैठूँगा ।

शरीर की स्थिति- आँखें नींद में भरी हुई, थकान से बुरा हाल जैसे-तैसे आत्मा की ख़ुशी के लिए साधना में बैठे | आत्मा की कुछ भूख शांत हुई ही थी की यहाँ शरीर की आँखे नींद से भर गई …. शरीर उठा और सोने के लिए जाने ही लगा था क़ि ..

आत्मा बोल उठी – अरे अरे क्या हुआ क्यों उठ गए ? अभी बैठे ही थे कि उठ भी गए ।

शरीर – मैं  थक गया हूँ यार !!  कल सुबह को पक्का 4 बजे उठ के साधना करूँगा |

आत्मा – तुम फिर से बहाना बना रहे हो तुम नहीं उठोगे मुझे पता है ।

आत्मा दुखी होकर चुप हो गई😓

तभी शरीर ने मोबाइल पर मैसेज देखा ।

शरीर – अरे ये तो मेरे बेस्ट फ्रेंड का मैसेज है | चलो थोड़ी देर चैटिंग करके सोता हूँ  …

आत्मा सोचती है मन ही मन :
(देखो साधना के वक्त तो इसे नींद आ रही थी और अब देखो दोस्तों से बात करने के वक्त नींद ही गायब हो गई । जिसकी वजह से इसका अस्तित्व है उसी की ही परवाह नहीं है इसे)

आत्मा – खैर चलो कल देखते हैं।
परंतु फिर वही दिनचर्या; सुबह के 4 बजे से रात के वक्त तक और आत्मा भूखी की भूखी रह जाती है ।
😢

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आत्मसाक्षात्कार करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। जीव, जगत (स्थूल जगत, सूक्ष्म जगत) और ईश्वर – ये सब माया के अन्तर्गत आते हैं। आत्मसाक्षात्कार माया से परे है। जिसकी सत्ता से जीव, जगत, ईश्वर दिखते हैं, उस सत्ता को मैं रूप से ज्यों का त्यों अनुभव करना, इसका नाम है आत्मसाक्षात्कार। जन्मदिवस से भी हजारों गुना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। आत्मासाक्षात्कार दिवस। भगवान कहते हैं-
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।
हजारों मनुष्यों में कोई विरला सिद्धि के लिए यत्न करता है और उन सिद्धों में से कोई विरला मुझे तत्वतः जानता है।
आत्मसाक्षात्कार को ऐसे कोई विरले महात्मा ही पाते हैं। योगसिद्धि, दिव्य दर्शन, योगियों का आकाशगमन, खेचरी, भूचरी सिद्धियाँ, भूमि में अदृश्य हो जाना, अग्नि में प्रवेश करके अग्निमय होना, लोक-लोकान्तर में जाना, छोटा होना, बड़ा होना इन अष्टसिद्धियों और नवनिधियों के धनी हनुमानजी आत्मज्ञानी श्रीरामजी के चरणों में गये, ऐसी आत्मसाक्षात्कार की सर्वोपरि महिमा है। साधना चाह कोई कितनी भी ऊँची कर ले, भगवान राम, श्रीकृष्ण, शिव के साथ बातचीत कर ले, शिवलोक में शिवजी के गण या विष्णुलोक में जय-विजय की नाईं रहने को भी मिल जाय फिर भी साक्षात्कार के बिन यात्रा अधूरी रहती है।
आज हमारी असली शादी का दिवस है। आज ईश्वर मिलन दिवस, मेरे गुरूदेव का विजय दिवस है, मेरे गुरूदेव का दान दिवस है, गुरूदेव के पूरे बरसने का दिवस है। दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो पूरी मानवता के लिए अपने परम तत्त्व को पा सकने की खबर देने वाला दिवस आत्मसाक्षात्कार दिवस है। आज वह पावन दिवस है जब जीवात्मा सदियों की अधूरी यात्रा पूरी करने में सफल हो गया। धरती पर तो रोज करीब डेढ़ करोड़ो लोगों का जन्म दिवस होता है।
शादी दिवस और प्रमोशन दिवस भी लाखों लोगों का हो सकता है। ईश्वर के दर्शन का दिवस भी दर्जनों भक्तों का हो सकता है लेकिन ईश्वर-साक्षात्कार दिवस तो कभी-कभी और कहीं-कहीं किसी-किसी विरले को देखने को मिलता है। जो लोक संत हैं और प्रसिद्ध हैं उनके साक्षात्कार दिवस का तो पता चलता है, बाकी तो कई ऐसे आत्मारामी संत हैं जिसका हमको आपको पता ही नहीं। ऐसे दिवस पर कुछ न करें तब भी वातावरण में आध्यात्मिकता की अद्भुत तरंगें फैलती रहती हैं।
आसोज सुद दो दिवस, संवत बीस इक्कीस।
मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस।।
देह मिथ्या हुई पढ़ते तो हो, बोलते तो हो लेकिन देह कौनसी, पता है जो दिखती है वह स्थूल देह है, इसके अंदर सूक्ष्म देह है। विष्णुभक्त होगा तो विष्णुलोक में जायगा, तत्त्वज्ञान नहीं है तो अभी देह मिथ्या नहीं हुई। अगर पापी है तो नरकों में जायेगा फिर पशुयोनि में आयेगा, पुण्यात्मा है तो स्वर्ग में जायेगा फिर अच्छे घर में आयेगा, लेकिन अब न आना न जाना, अपने आपमें व्यापक हो जाना है। जब तत्त्व ज्ञान हो गया तो देह और आकृति का अस्तित्व अंदर टिकाने वाला शरीर मिथ्या हो गया। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर सारे बाधित हो गये। जली हुई रस्सी देखने में तो आती है लेकिन उससे आप किसी को बाँध नहीं सकते। ऐसे ही जन्म जन्मांतरों की यात्रा का कारण जो अज्ञान था, वह गुरु की कृपादृष्टि से पूरा हो गया (मिट गया)। जैसे धान से चावल ले लिया भूसी की ऐसी-तैसी, केले से गूदा ले लिया फिर केले के छिलके को तुम कैसे निरर्थक समझते हो, ऐसे ही शरीर होते हुए भी-
देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ निस्सार।
हुआ आत्मा से तभी, अपना साक्षात्कार।।
आज तो आप लोग भी मुझे साक्षात्कार-दिवस की खूब मुबारकबादी देना, इससे आपका हौसला बुलंद होगा। जैसे खाते पीते, सुख-दुःख, निंदा स्तुति के माहौल से गुजरते हुए पूज्यपाद भगवत्पाद श्री श्री लीलाशाहजी बापू, रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि अथवा तो और कई नामी-अनामी संत समत्वयोग की ऊँचाई तक पहुँच गये, साक्षात्कार कर लिया, ऐसे ही आप भी उस परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं, ऐसे ही साक्षात्कारी पुरूषों के इस पर्व को समझने सुनने से आत्मचाँद की यात्रा करने का मोक्षद्वार खुल जाता है।
मनुष्य तू इतना छोटा नहीं कि रोटी, कपड़े मकान, दुकान या रूपयों में ही सारी जिंदगी पूरी कर दे। इन छूट जाने वाली असत् चीजों में ही जीवन पूरा करके अपने साथ अन्याय मत कर। तू तो उस सत्स्वरूप परमात्मा के साक्षात्कार का लक्ष्य बना। वह कोई कठिन नहीं है, बस उससे प्रीति हो जाये।
असत् पदार्थों की और दृष्टि रहेगी तो विषमता बढ़ेगी। यह शरीर मिथ्या है, पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। धन, पद ये मिथ्या हैं, इनकी तरफ नजर रहेगी तो आपका व्यवहार समतावाला होगा। धीरे धीरे समता में स्थिति आने से आप कर्मयोगी होने में सफल हो जाओगे। ज्ञान के द्वारा सत् असत् का विवेक करके सत् का अनुसंधान करोगे और असत् की आसक्ति मिटाकर समता में खड़े रहोगे तो आपका ज्ञानयोग हो जायगा। बिना साक्षात्कार के समता कभी आ ही नहीं सकती चाहे भक्ति में प्रखर हो, योग में प्रखर हो, ज्ञान का बस भंडार हो लेकिन अगर साक्षात्कार नहीं हुआ तो वह सिद्धपुरूष नहीं साधक है। साक्षात्कार हुआ तो बस सिद्ध हो गया।
इस महान से महान दिवस पर साधकों के लिए एक उत्तम तोहफा यह है कि आप अपने दोनों हाथों की उँगलियों को आमने सामने करके मिला दें। होंठ बंद करके जीभ ऐसे रखें कि न ऊपर लगे न नीचे, बीच में रखें। फिर जीव-ब्रह्म की एकता का संकल्प करके, तत्त्वरूप से जो मौत के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ता उसमें शांत हो जायें। यह अभ्यास प्रतिदिन करें, कुछ समय श्वासोच्छवास की गिनती करें जिससे मन एकाग्र होने लगेगा, शक्ति का संचय होने लगेगा। धीरे-धीरे इस अभ्यास को बढ़ाते जायेंगे तो तत्त्व में स्थिति हो जायेगी। जीवन की शाम होने के पहले साक्षात्कारी महापुरूषों की कृपा की कुंजी से साक्षात्कार कर लेना चाहिए।
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