सद्गुणों की खान : भगवान श्रीराम
(श्रीराम नवमी : २८ मार्च)
भगवान श्रीरामजी के सद्गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं :
धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः । क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः।।
मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः । प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः ।।
‘श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान, अदोषदर्शी, सहिष्णु, दीन-दुःखियों को सांत्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं । (वा.रामायण, अयो.कां. : २.३१,३२)
भगवान श्रीराम किसीके दोष नहीं देखते थे । वे सदा शांतचित्त रहते और सांत्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे । यदि उनसे कोई कठोर बात भी कह देता तो वे उसका प्रत्युत्तर नहीं देते थे । कभी कोई उन पर एक बार भी उपकार कर देता तो वे उसके उस एक ही उपकार से सदा संतुष्ट रहते और किसीके सैक‹डों अपराध करने पर भी उसके अपराधों को याद नहीं रखते थे । वे सदा चरित्र में उत्तम, ज्ञान में तथा अवस्था में बढे-चढे सत्पुरुषों के साथ ही बातचीत करते और उनसे विनय से पेश आते थे । वे अपने पास आये हुए मनुष्यों से अपनी ओर से बातचीत शुरू करते और ऐसी बातें बोलते जो उन्हें प्रिय लगें । महान बल और पराक्रम से संपन्न होने पर भी उन्हें उनका कभी गर्व नहीं होता था। दुर्वचन और झूठी बात तो उनके मुख से कभी निकलती ही नहीं थी । वे विद्वान थे और सदा वृद्ध पुरुषों का सम्मान किया करते थे । अमंगलकारी निषिद्ध कर्म में उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी, शास्त्रविरुद्ध बातों को सुनने में उनकी रुचि नहीं थी । अपने न्याययुक्त पक्ष के समर्थन में वे बृहस्पति के समान एक से ब‹ढकर एक दृष्टांत देते थे । वे कल्याण की जन्मभूमि, दैन्यरहित और सरल थे । धर्म के ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणों के द्वारा उन्हें उत्तम शिक्षा प्राप्त हुई थी । वे बडे बुद्धिमान, स्मरणशक्ति से संपन्न और प्रतिभाशाली थे । गुरुजनों के प्रति उनकी दृढ भक्ति थी । वे लोक-व्यवहार के संपादन में समर्थ और समयोचित धर्माचरण में कुशल थे ।
वे विनयशील, अपने अभिप्राय को छिपानेवाले, मंत्र को गुप्त रखनेवाले और उत्तम सहायकों से संपन्न थे । वस्तुओं के त्याग और संग्रह के अवसर को वे भलीभाँति जानते थे । वे आलस्यरहित, प्रमादशून्य तथा अपने और पराये मनुष्यों के दोषों को भली प्रकार जाननेवाले थे । वे शास्त्रों के ज्ञाता, उपकारियों के प्रति कृतज्ञ तथा दूसरे पुरुषों के मनोभावों को जानने में कुशल थे । दर्प और ईष्र्या का उनमें अत्यंत अभाव था । किसी भी प्राणी के मन में उनके प्रति अवहेलना का भाव नहीं था । उन्हें सत्पुरुषों के संग्रह और पालन तथा दुष्ट पुरुषों के निग्रह (दंड देना, वश में रखना) के अवसरों का ठीक-ठीक ज्ञान था । आय के उपायों को वे अच्छी तरह जानते थे (अर्थात् फूलों को नष्ट न करके उनसे रस लेनेवाले भ्रमरों की भाँति वे प्रजा को कष्ट दिये बिना ही उनसे न्यायोचित धन का उपार्जन करने में कुशल थे) तथा शास्त्रवर्णित व्यय-कर्म का भी उन्हें ठीक-ठीक ज्ञान था । अपने सद्गुणों के कारण वे प्रजाजनों को प्राणों की भाँति प्रिय थे । मन और इन्द्रियों के संयम आदि सद्गुणों द्वारा श्रीराम वैसी ही शोभा पाते थे, जैसे तेजस्वी सूर्य अपनी किरणों से सुशोभित होते हैं ।
जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का कुशल-मंगल पूछता है, उसी प्रकार वे क्रमशः नगरवासियों से प्रतिदिन उनके पुत्रों, अग्निहोत्र की अग्नियों, स्त्रियों, सेवकों, शिष्यों, अनुचरों का कुशल-समाचार पूछा करते थे । पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों से सदा पूछते रहते कि ‘आपके शिष्य आप लोगों की सेवा करते हैं न ? क्षत्रियों से यह जिज्ञासा करते कि ‘आपके सेवक कवच आदि से सुसज्जित हो आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं न ?
किसीसे वार्तालाप करते समय वे पहले मुस्कराकर फिर वार्तालाप आरंभ करते थे । उन्होंने संपूर्ण हृदय से धर्म का आश्रय ले रखा था । qनदनीय बातों की चर्चा में उनकी कभी रुचि नहीं होती थी । उनकी इन्द्रियाँ राग आदि दोषों से दूषित नहीं होती थीं । उनका स्वभाव साधु पुरुषों के समान, हृदय उदार और बुद्धि विशाल थी । वे प्रजा को सुख देने में चंद्रमा की और क्षमारूपी गुण में पृथ्वी की समानता रखते थे । वे वृद्ध पुरुषों के सेवक तथा ब्राह्मणों (ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मज्ञानी) के उपासक थे और सदा ही उनका संग किया करते थे । वे महान धनुर्धर, वेदों के यथार्थ ज्ञाता और संपूर्ण विद्याओं में भलीभाँति निष्णात थे । वे परम दयालु एवं क्रोध को जीतनेवाले थे । उनके मन में दीन-दुःखियों के प्रति ब‹डी दया थी । वे बाहर-भीतर से परम पवित्र थे । उनका शरीर नीरोग था । वे अच्छे वक्ता, सुंदर शरीर से सुशोभित तथा देश-काल के तत्त्व को समझनेवाले थे । प्रजा का श्रीरामजी के प्रति और श्रीरामजी का प्रजा के प्रति ब‹डा अनुराग था । वे संग्रामभूमि से विजय प्राप्त किये बिना पीछे नहीं लौटते थे । जो शास्त्र के अनुसार प्राणदंड पाने के अधिकारी होते, उनका वे नियमपूर्वक वध कर देते तथा जो शास्त्रदृष्टि से अवध्य होते, उन पर कदापि कुपित नहीं होते थे। संपूर्ण लोकों को आनंदित करनेवाले श्रीरामजी शूरता, वीरता, पराक्रम आदि के द्वारा सदा प्रजा का पालन करने में लगे रहते थे। वे सभी प्राणियों के लिए आदरणीय एवं स्थितप्रज्ञ थे ।
भगवान श्रीरामजी के सद्गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं : ‘श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान, अदोषदर्शी, सहिष्णु, दीन-दुःखियों को सांत्वना प्रदान करनेवाले, मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय वचन बोलनेवाले और सत्यवादी हैं ।
(वा.रामायण, अयो.कां. : २.३१,३२)
“भगवान के अवतार” आसारामजी बापू
श्रीराम स्तुति


You must be logged in to post a comment.