Bhajan

गुरु मेरी पूजा गुरु गोविन्द गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत.. आसारामजी बापू


भजन - गुरु मेरी पूजा

गुरु मेरी पूजा – आसाराम बापूजी

गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द ..
गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु मेरा देऊ , अलख अभेऊ , सर्व पूज चरण गुरु सेवऊ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु का दर्शन …. देख – देख जीवां , गुरु के चरण धोये -धोये पीवां..

गुरु बिन अवर नही मैं ठाऊँ , अनबिन जपऊ गुरु गुरु नाऊँ
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु मेरा ज्ञान , गुरु हिरदय ध्यान , गुरु गोपाल पुरख भगवान्
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

ऐसे गुरु को बल-बल जाइये .. आप मुक्त मोहे तारें..

गुरु की शरण रहो कर जोड़े , गुरु बिना मैं नही होर
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु बहुत तारे भव पार , गुरु सेवा जम से छुटकार
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

अंधकार में गुरु मंत्र उजारा , गुरु के संग सजल निस्तारा
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

गुरु पूरा पाईया बडभागी , गुरु की सेवा जिथ ना लागी
गुरु मेरी पूजा , गुरु गोविन्द , गुरु मेरा पार ब्रह्म , गुरु भगवंत..

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Ram Navmi

सद्गुणों की खान : भगवान श्रीराम


Bhagwan Shri Ram

सद्गुणों की खान : भगवान श्रीराम

सद्गुणों की खान : भगवान श्रीराम
(श्रीराम नवमी : २८ मार्च)

भगवान श्रीरामजी के सद्गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं :
धर्मज्ञः सत्यसंधश्च शीलवाननसूयकः । क्षान्तः सान्त्वयिता श्लक्ष्णः कृतज्ञो विजितेन्द्रियः।।
मृदुश्च स्थिरचित्तश्च सदा भव्योऽनसूयकः । प्रियवादी च भूतानां सत्यवादी च राघवः ।।
‘श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान, अदोषदर्शी, सहिष्णु, दीन-दुःखियों को सांत्वना  प्रदान  करनेवाले,  मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय  वचन  बोलनेवाले  और  सत्यवादी हैं ।       (वा.रामायण, अयो.कां. : २.३१,३२)
भगवान श्रीराम किसीके दोष नहीं देखते थे । वे सदा शांतचित्त रहते और सांत्वनापूर्वक मीठे वचन बोलते थे । यदि उनसे कोई कठोर बात भी कह देता तो वे उसका प्रत्युत्तर नहीं देते थे । कभी कोई उन पर एक बार भी उपकार कर देता तो वे  उसके  उस  एक  ही  उपकार  से  सदा संतुष्ट रहते  और किसीके सैक‹डों अपराध करने पर भी उसके अपराधों को याद  नहीं  रखते  थे ।  वे  सदा  चरित्र  में उत्तम, ज्ञान में तथा अवस्था में बढे-चढे सत्पुरुषों के साथ ही बातचीत करते और उनसे विनय से पेश आते थे । वे अपने पास आये हुए मनुष्यों से अपनी ओर से बातचीत शुरू करते और ऐसी बातें बोलते जो उन्हें प्रिय लगें । महान बल और पराक्रम से संपन्न होने पर भी उन्हें उनका कभी गर्व नहीं होता था। दुर्वचन और झूठी बात तो उनके मुख से कभी निकलती ही नहीं थी । वे विद्वान थे और सदा वृद्ध पुरुषों का सम्मान किया करते थे । अमंगलकारी निषिद्ध कर्म में उनकी कभी प्रवृत्ति नहीं होती थी, शास्त्रविरुद्ध बातों को सुनने में उनकी रुचि नहीं  थी । अपने  न्याययुक्त  पक्ष  के  समर्थन  में  वे बृहस्पति के समान एक से ब‹ढकर एक दृष्टांत देते थे । वे कल्याण की जन्मभूमि, दैन्यरहित और सरल थे । धर्म के ज्ञाता वृद्ध ब्राह्मणों के द्वारा उन्हें उत्तम शिक्षा प्राप्त हुई थी । वे बडे बुद्धिमान, स्मरणशक्ति से संपन्न और  प्रतिभाशाली  थे ।  गुरुजनों  के  प्रति  उनकी  दृढ भक्ति थी । वे लोक-व्यवहार के संपादन में समर्थ और समयोचित धर्माचरण में कुशल थे ।
वे विनयशील, अपने अभिप्राय को छिपानेवाले, मंत्र  को  गुप्त  रखनेवाले  और  उत्तम  सहायकों  से संपन्न थे । वस्तुओं के त्याग और संग्रह के अवसर को वे भलीभाँति जानते थे । वे   आलस्यरहित,   प्रमादशून्य   तथा अपने और पराये मनुष्यों के दोषों को भली प्रकार जाननेवाले थे । वे शास्त्रों के ज्ञाता, उपकारियों के प्रति कृतज्ञ तथा दूसरे पुरुषों के मनोभावों को जानने में कुशल थे । दर्प और ईष्र्या का उनमें अत्यंत अभाव था । किसी भी प्राणी के मन में उनके प्रति अवहेलना का भाव नहीं था । उन्हें सत्पुरुषों के संग्रह और पालन तथा दुष्ट पुरुषों के निग्रह (दंड देना,  वश  में  रखना)  के  अवसरों  का ठीक-ठीक ज्ञान था । आय के उपायों को वे अच्छी तरह जानते थे (अर्थात् फूलों  को नष्ट न करके   उनसे   रस लेनेवाले  भ्रमरों  की  भाँति  वे  प्रजा  को कष्ट  दिये  बिना  ही  उनसे  न्यायोचित धन  का  उपार्जन  करने  में  कुशल  थे) तथा   शास्त्रवर्णित   व्यय-कर्म   का   भी उन्हें   ठीक-ठीक   ज्ञान   था  । अपने   सद्गुणों   के   कारण   वे प्रजाजनों  को  प्राणों  की  भाँति प्रिय  थे  ।  मन  और  इन्द्रियों  के संयम    आदि    सद्गुणों    द्वारा श्रीराम  वैसी  ही  शोभा  पाते  थे,  जैसे  तेजस्वी  सूर्य अपनी किरणों से सुशोभित होते हैं ।
जैसे पिता अपने औरस पुत्रों का कुशल-मंगल पूछता है, उसी प्रकार वे क्रमशः नगरवासियों से प्रतिदिन उनके पुत्रों, अग्निहोत्र की अग्नियों, स्त्रियों, सेवकों, शिष्यों, अनुचरों का कुशल-समाचार पूछा करते थे । पुरुषसिंह श्रीराम ब्राह्मणों से सदा पूछते रहते कि ‘आपके शिष्य आप लोगों की सेवा करते हैं न ? क्षत्रियों से यह जिज्ञासा करते कि ‘आपके सेवक कवच आदि से सुसज्जित हो आपकी सेवा में तत्पर रहते हैं न ?
किसीसे   वार्तालाप   करते   समय   वे   पहले मुस्कराकर फिर वार्तालाप आरंभ करते थे । उन्होंने संपूर्ण हृदय से धर्म का आश्रय ले रखा था । qनदनीय बातों की चर्चा में उनकी कभी रुचि नहीं होती थी । उनकी इन्द्रियाँ राग आदि दोषों से दूषित नहीं होती थीं । उनका स्वभाव साधु पुरुषों के समान, हृदय उदार और बुद्धि विशाल थी । वे प्रजा को सुख देने में चंद्रमा की और क्षमारूपी गुण में पृथ्वी की समानता रखते थे । वे वृद्ध पुरुषों के सेवक तथा ब्राह्मणों (ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवेत्ता-ब्रह्मज्ञानी) के उपासक  थे  और  सदा  ही उनका संग किया करते थे । वे महान धनुर्धर, वेदों के यथार्थ  ज्ञाता  और  संपूर्ण  विद्याओं  में  भलीभाँति निष्णात थे । वे परम दयालु एवं क्रोध को जीतनेवाले थे । उनके मन में दीन-दुःखियों के प्रति ब‹डी दया थी । वे बाहर-भीतर से परम पवित्र थे । उनका शरीर नीरोग था । वे अच्छे वक्ता, सुंदर शरीर से सुशोभित तथा देश-काल के तत्त्व को समझनेवाले थे । प्रजा का श्रीरामजी के प्रति और श्रीरामजी का प्रजा के प्रति ब‹डा अनुराग था । वे संग्रामभूमि से विजय प्राप्त किये बिना पीछे नहीं लौटते थे । जो शास्त्र के अनुसार प्राणदंड पाने के अधिकारी होते, उनका वे नियमपूर्वक वध कर देते तथा जो शास्त्रदृष्टि से अवध्य होते, उन पर कदापि कुपित नहीं होते थे। संपूर्ण लोकों को आनंदित करनेवाले श्रीरामजी शूरता, वीरता, पराक्रम आदि के द्वारा सदा प्रजा का पालन करने में लगे रहते थे। वे सभी प्राणियों के लिए आदरणीय एवं स्थितप्रज्ञ थे ।

भगवान श्रीरामजी के सद्गुणों का वर्णन करते हुए महर्षि वाल्मीकि कहते हैं : ‘श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, शीलवान, अदोषदर्शी, सहिष्णु, दीन-दुःखियों को सांत्वना  प्रदान  करनेवाले,  मृदुभाषी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय, कोमल स्वभाववाले, स्थिरबुद्धि, सदा कल्याणकारी, असूयारहित, समस्त प्राणियों के प्रति प्रिय  वचन  बोलनेवाले  और  सत्यवादी हैं ।

(वा.रामायण, अयो.कां. : २.३१,३२)

 यह भी देखे:

“भगवान के अवतार” आसारामजी बापू

|| श्री राम चालीसा ||

श्रीराम स्तुति

 

 

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आत्मा की भूख !


प्रायः व्यक्ति अपने शरीर की शानऔर शौकत पर तो बेहद ध्यान देता है, शरीर की खुशामद करने में कभी पीछे नहीं रहता; आगे से आगे उसके लिए पहनने-ओढने, खाने-पीने, घूमने-फिरने का बंदोबस्त किये रहता है, पर क्या कभी इस पर विचार किया है कि जिस आत्मा की चेतना से उसका ये शरीर चलता है, उसकी ये सांसें चलती हैं, कभी उसकी तरफ भी ध्यान देना चाहिए | कभी उस आत्मा की देख-भाल हेतु कुछ करना चाहिए ? यदि किसी से ये प्रश्न किये जायेंगे तो स्वभावतः उसका उत्तर “ना” ही होगा क्योंकि संसार की आपाधापी में मनुष्य इतना व्यस्त हो जाता है कि वो ये भूल ही जाता है की उसे अपने आतंरिक उद्धार के लिए भी कुछ सोचना, कुछ करना चाहिए जो अंततः उसके काम आयेगा, उसके साथ जायेगा |

 

आइये, आज हम यहाँ पर एक छोटे से संवाद के माध्यम से आपको ये बताने का, ये समझाने का प्रयास करेंगे कि शरीर के साथ साथ आत्मा की देखभाल भी उतनी ही आवश्यक है |

aatma ki bhookh

तो चलिए सुनते हैं शरीर और आत्मा की बातें :-

सुबह के 4 बजे:-

आत्मा – चलो उठो साधना का समय हो गया है ! उठो ना !

शरीर – सोने दो न ! क्यों तंग कर रही हो ? पता नहीं क्या रात को बहुत देर से सोया था………
थोड़ी देर के बाद साधना करूँगा ।

आत्मा – ठीक है, और मन में सोचने लगी मुझे भूख लगी है और ये है क़ि समझता ही नहीं है 😥

सुबह के 6 बजे:-

आत्मा बोली – अब तो उठ जाओ भाई ! सूरज भी आपनी किरणे फैलाते हुए हमें उठा रहा है उठो न, plzzzzz.

शरीर – कितना परेशान करती हो ! ठीक है उठ रहा हूँ  | बस 5 मिनट और सोने दो !

आत्मा छटपटाती हुई  शरीर के इंतजार में  कि ये कब  उठेगा और कब मेरी भूख को शांत करेगा !!!!!

थोड़ी देर बाद साधना में बैठने के लिए शरीर ने वक्त निकाला | 20-25 मिनट साधना में बैठा और आत्मा कुछ तृप्त ही हुई थी की शरीर उठ गया…….

आत्मा – अरे रे रे रे क्या हुआ ? क्यों उठ गए अभी तो मैं  तृप्त हुई भी नहीं हूँ  कि तुम उठ रहे हो !!!!!  क्या हुआ भाई ? कहाँ जा रहे हो ?

शरीर – अरे मुझे (ऑफिस or घर का ) काम पर जाना है; तुम्हारी तो कुछ समझ में ही नहीं आता !!!!

आत्मा – ठीक है | शाम को तो साधना करोगे न ?

शरीर – (परेशान होते हुए ) हाँ भई  हाँ ।

सारा दिन निकल गया आत्मा भूख से तड़पते हुए …शाम हो गई आत्मा खुश हुई चलो अब तो मेरी भूख का निवारण हो ही जायेगा …

शरीर ऑफिस और  घर के काम से कुछ फ्री हुआ ही था कि आत्मा  आवाज देती है ।

आत्मा – अरे फ्री हो गए ! अब तो चल ही सकते हो साधना के लिए | चलो न ।

शरीर – क्यों सारा दिन तंग करती रहती हो ? देखती नहीं हो मैं अभी ऑफिस और घर के कामों से फ्री हुआ हूँ, थक गया हूँ ।

आत्मा – अरे तुम थके हुए हो तो साधना में जैसे ही बैठोगे तो तुम्हारी थकान चुटकी में दूर हो जाएगी …

शरीर – नहीं अभी नहीं रात को पक्का बैठूँगा ।

शरीर की स्थिति- आँखें नींद में भरी हुई, थकान से बुरा हाल जैसे-तैसे आत्मा की ख़ुशी के लिए साधना में बैठे | आत्मा की कुछ भूख शांत हुई ही थी की यहाँ शरीर की आँखे नींद से भर गई …. शरीर उठा और सोने के लिए जाने ही लगा था क़ि ..

आत्मा बोल उठी – अरे अरे क्या हुआ क्यों उठ गए ? अभी बैठे ही थे कि उठ भी गए ।

शरीर – मैं  थक गया हूँ यार !!  कल सुबह को पक्का 4 बजे उठ के साधना करूँगा |

आत्मा – तुम फिर से बहाना बना रहे हो तुम नहीं उठोगे मुझे पता है ।

आत्मा दुखी होकर चुप हो गई😓

तभी शरीर ने मोबाइल पर मैसेज देखा ।

शरीर – अरे ये तो मेरे बेस्ट फ्रेंड का मैसेज है | चलो थोड़ी देर चैटिंग करके सोता हूँ  …

आत्मा सोचती है मन ही मन :
(देखो साधना के वक्त तो इसे नींद आ रही थी और अब देखो दोस्तों से बात करने के वक्त नींद ही गायब हो गई । जिसकी वजह से इसका अस्तित्व है उसी की ही परवाह नहीं है इसे)

आत्मा – खैर चलो कल देखते हैं।
परंतु फिर वही दिनचर्या; सुबह के 4 बजे से रात के वक्त तक और आत्मा भूखी की भूखी रह जाती है ।
😢

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जगत से प्रीति हटाकर आत्मा में लगायें !


जगत से प्रीति हटाकर आत्मा में लगायें | जैसी प्रीति संसार के पदार्थों में है, वैसी अगर आत्मज्ञान, आत्मध्यान, आत्मानंद में करें तो बेड़ा पार हो जाय। जगत के पदार्थों एवं वासना, काम, क्रोध आदि से प्रीति हटाकर आत्मा में लगायें तो तत्काल मोक्ष हो जाना आश्चर्य की बात नहीं है।

काहे एक बिना चित्त लाइये ?
ऊठत बैठत सोवत जागत, सदा सदा हरि ध्याइये।

Ishwar ki pooja

हे भाई ! एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी से क्यों चित्त लगाता है ? उठते-बैठते, सोते-जागते तुझे सदैव उसी का ध्यान करना चाहिए।
यह शरीर सुन्दर नहीं है। यदि ऐसा होता तो प्राण निकल जाने के बाद भी यह सुन्दर लगता। हाड़-मांस, मल-मूत्र से भरे इस शरीर को अंत में वहाँ छोड़कर आयेंगे जहाँ कौए बीट छोड़ते हैं। मन के समक्ष बार-बार उपर्युक्त विचार रखने चाहिए। शरीर को असत्, मल-मूत्र का भण्डार तथा दुःखरूप जानकर देहाभिमान का त्याग करके सदैव आत्मनिश्चय करना चाहिए। यह शरीर एक मकान से सदृश है, जो कुछ समय के लिए मिला है। जिसमें ममता रखकर आप उसे अपना मकान समझ बैठे हैं, वह आपका नहीं है।

शरीर तो पंचतत्वों का बना हुआ है। आप तो स्वयं को शरीर मान बैठे हो, परंतु जब सत्य का पता लगेगा तब कहोगे कि ‘हाय ! मैं कितनी बड़ी भूल कर बैठा था कि शरीर को ‘मैं’ मानने लगा था।’ जब आप ज्ञान में जागोगे तब समझ में आयेगा कि मैं पंचतत्वों का बना यह घर नही हूँ, मैं तो इससे भिन्न सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हूँ। यह ज्ञान ही जिज्ञासु के लिए उत्तम खुराक है। संसार में कोई भी किसी का वैरी नहीं है। मन ही मनुष्य
का वैरी और मित्र है। मन को जीतोगे तो वह तुम्हारा मित्र बनेगा।

मन वश में हुआ तो इन्द्रियाँ भी वश में होंगी। श्रीगौड़पादाचार्यजी ने कहा हैः ‘समस्त योगी पुरूषों के भवबंधन का नाश, मन की वासनाओं का नाश करने से ही होता है। इस प्रकार दुःख की निवृत्ति तथा ज्ञान और अक्षय शांति की प्राप्ति भी मन को वश करने में ही है।’ मन को वश करने के कई उपाय हैं। जैसे, भगवन्नाम का जप, सत्पुरूषों का सत्संग, प्राणायाम आदि। इनमें अच्छा उपाय है भगवन्नाम जपना। भगवान को अपने
हृदय में विराजमान किया जाय तथा गर्भ का दुःख, जन्म का दुःख, बीमारियों का दुःख, मृत्यु का दुःख एवं चौरासी लाख योनियों का दुःख,
मन को याद दिलाया जाय। मन से ऐसा भी कहा जाय कि ‘आत्मा के कारण तू अजर, अमर है।’ ऐसे दैनिक अभ्यास से मन अपनी बदमाशियाँ छोड़कर तुम्हारा हितैषी बनेगा।

जब मन भगवन्नाम का उच्चारण 200 बार माला फेरकर करने के बजाय 100 माला फेरकर बीच में ही जप छोड़ दे तो समझो कि अब मन चंचल हुआ है और यदि 200 बार माला फेरे तो समझो कि अब मन स्थिर हुआ है। जो सच्चा जिज्ञासु है, वह मोक्ष को अवश्य प्राप्त  करता है। लगातार अभ्यास चिंतन तथा ध्यान करने से साधक आत्मनिश्चय में टिक जाता है। अतः लगातार अभ्यास, चिंतन, ध्यान करते रहना चाहिए, फिर निश्चय ही सब दुःखों से मुक्ति और परमानंद की प्राप्ति हो जायेगी। मोक्ष प्राप्त हो जायेगा।

अपनी शक्ल को देखने के लिए तीन वस्तुओं की आवश्यकता होती है – एक निर्मल दर्पण, दूसरी आँख और तीसरा प्रकाश। इसी प्रकार शम, दम, तितिक्षा, ध्यान तथा सदगुरू के अद्वैत ज्ञान के उपदेश द्वारा अपने आत्मस्वरूप का दर्शन हो जाता है। शरीर को मैं कहकर बड़े-बड़े महाराजे भी भिखारियों की नाँई संसार से चले गये, परंतु जिसने अपने आत्मा के मैं को धारण कर लिया वह सारे ब्रह्माण्डों का सम्राट बन गया। उसने अक्षय राज्य, निष्कंटक राज्य पा लिया।

हम परमानंदस्वरूप परब्रह्म हैं। सबमें हमारा ही रूप है। जो आनंद संसार में भासता है, वह वास्तव में आत्मा के आनंद की ही एक झलकमात्र होती है। तुम्हारे भीतर का आनंद ही अज्ञान से बाहर के विषयों में प्रतीत होता है। हम आनंदरूप पहले भी थे, अभी भी हैं और बाद में भी रहेंगे। यह जगत न पहले था, न बाद में रहेगा, किंतु बीच में जो दिखता है वह भी अज्ञानमात्र है। आरम्भ में केवल आनंदतत्व था, वैसे ही अभी भी ब्रह्म का ही अस्तित्व है।

जैसे सोना जब खान के अन्दर था तब भी सोना था, अब उसमें से आभूषण बने तो भी वह सोना ही है और जब आभूषण नष्ट हो जायेंगे तब भी वह सोना ही रहेगा, वैसे ही केवल आनंदस्वरूप परब्रह्म ही सत्य है। चाहे शरीर रहे अथवा न रहे, जगत रहे अथवा न रहे, परंतु आत्मतत्त्व तो सदा एक-का-एक, ज्यों का त्यों है।

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