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क्या आपको पता है? Astonishing fact about OM mantra. .


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फ्रांस के वैज्ञानिक डॉ. एंटोनी बोविस ने बायोमीटर (ऊजा मापक यंत्र) का उपयोग करके वस्तु, व्यक्ति, वनस्पति या स्थान की आभा की तीव्रता मापने की पद्धति खोज निकाली। इस यंत्र द्वारा यह मापा गया कि सात्त्विक जगह और मंत्र का व्यक्ति पर कितना प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि सामान्य, स्वस्थ मनुष्य का ऊर्जा-स्तर 6500 बोविस होता है। पवित्र मंदिर, आश्रम आदि के गर्भगृहों का ऊर्जा-स्तर 11000 बोविस तक होता है। ऐसे स्थानों में जाकर सत्संग, जप, कीर्तन, ध्यान आदि का लाभ ले के अपना ऊर्जा-स्तर बढ़ाने की जो परम्परा अपने देश में है, उसकी अब आधुनिक विज्ञान भी सराहना कर रहा है क्योंकि व्यक्ति का ऊर्जा-स्तर जितना अधिक होता है उतना ही अधिक वह स्वास्थ्य, तंदुरूस्ती, प्रसन्नता का धनी होता है।

ऊर्जा-अध्ययन करते हुए जब वैज्ञानिकों ने ૐकार के जप से उत्पन्न ऊर्जा को मापा तब तो उनके आश्चर्य का ठिकाना ही न रहा क्योंकि यह ऊर्जा 70000 बोविस पायी गयी। और यही कारण है कि ૐकार युक्त सारस्वत्य मंत्र की दीक्षा लेकर जो विद्यार्थी प्रतिदिन कुछ प्राणायाम और जप करते हैं, वे चाहे थके-हारे एवं पिछड़े भी हों तो भी शीघ्र उन्नत हो जाते हैं। ૐकार की महिमा से जपकर्ता को सब तरह से लाभ अधिक है। यदि आपके मंत्र में ૐकार है तो लगे रहिये।

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देशभक्त सुभाषचन्द्र


बाल्यकाल से ही सुभाषचन्द्र बड़े निर्भीक, साहसी और उदार प्रकृति के थे। सत्संग व संत-समागम का एक भी अवसर वे अपने हाथ से छूटने नहीं देते थे।

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सुभाषचन्द्र बोस का नाम स्वतंत्रता संग्राम के महारथियों की अग्रिम पंक्ति में आता है। उनका जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक प्रान्त में हुआ था। उनकी माता प्रभावती बड़ी ही धार्मिक प्रकृति की महिला थीं, जिनके संस्कारों का सुभाषचन्द्र पर गहरा असर पड़ा। बाल्यकाल से ही सुभाषचन्द्र बड़े निर्भीक, साहसी और उदार प्रकृति के थे। सत्संग व संत-समागम का एक भी अवसर वे अपने हाथ से छूटने नहीं देते थे।

सन् 1915 में सुभाष ने कलकत्ता प्रेसीडेन्सी कॉलेज में बी.ए.की शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रवेश लिया। वहाँ भारतीय विद्यार्थियों के प्रति अंग्रेज प्राध्यापकों का व्यवहार अच्छा न था। किसी भी छोटे से कारण पर वे छात्रों को बड़ी भद्दी-भद्दी गालियाँ सुना दिया करते थे। एक बार सुभाष की कक्षा के कुछ छात्र अध्ययन-कक्ष के बाहर बरामदे में खड़े थे। प्रोफेसर ई.एफ. ओटेन उधर से गुजरे और बरामदे में खड़े छात्रों पर बरस पड़े- “जंगली, काले, बदतमीज इंडियन….!”

अपनी मातृभूमि का घोर अपमान होता देख सुभाष का खून खौल उठा। वे अपने साथियों के साथ ओटेन की शिकायत लेकर प्रधानाचार्य के पास गये। प्रधानाचार्य भी अंग्रेज ही था, अतः उसने भी ओटेन का ही पक्ष लिया। दूसरा रास्ता न पाकर सुभाष अपनी कक्षा के विद्यार्थियों सहित हड़ताल पर उतर आये, जिसका बहुत ही सकारात्मक प्रभाव पड़ा। अंततः प्रधानाचार्य और ओटेन, दोनों ने मजबूर होकर छात्रों से समझौता कर लिया। कुछ दिनों तक तो ओटेन शांत रहा परंतु एक दिन वह अपनी सीमा पार कर गया। ओटेन ने एक छात्र से प्रश्न पूछा पर छात्र उत्तर न दे सका। इस साधारण की बात पर ओटेन ने उसे गालियाँ देना आरम्भ कर दियाः “यू बलैक मंकी… इडियट….!” सुभाष को मर्मांतक पीड़ा हुई। एक भारतवासी की तुलना काले बंदर से ! इतना तिरस्कार !

सुभाष उठ खड़े हुए और बोलेः “प्रौफैसर साहब ! आपको ऐसे असभ्य शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।”

ओटेन और अधिक भड़क उठाः “यू ब्लडी ! तुम बैठता है कि नहीं।”

ओटेन के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ते हुए सुभाष बोलेः “तुम अपने को क्या समझते हो प्रोफेसर ? तुम किस मुँह से गाली बकते हो, जबान खींच लूँगा।”

घटना की खबर शीघ्र ही चारों तरफ फैल गयी। पर यह एक अंग्रेज अध्यापक को नहीं नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार को भी दिया गया एक करारा तमाचा था कि भारतीयों के स्वाभिमान के साथ खेलने का क्या परिणाम होता है।

अंग्रेज भारत छोड़कर चले गये और भारत स्वतंत्र हो गया परंतु भारतीय संस्कृति को तिरस्कृत व अपमानित करने के ऐसे घृणित कार्य अभी भी बंद नहीं हुए हैं। आज भी कई कॉन्वेंट स्कूलों में भारतीय संस्कृति को निम्न कोटि का दर्शाया जाता है। तिलक लगाना, राखी बाँधना तथा पायल पहनना आदि परम्परागत रीति-रिवाज, जो शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद हैं, उन्हें अशिष्ट व अनावश्यक बताकर विद्यार्थियों को उन्हें जबरन छोड़ने के लिए कहा जाता है और न मानने पर तरह-तरह के दंड दिये जाते हैं। पैरों में पायल पहनना तो महिलाओं के गुप्त रोगों को दूर रखने हेतु ऋषि-परम्परा की देना।

हमें भी अपने में सुभाषचन्द्र जैसा आत्मबल, देशभक्ति व निर्भयता लानी चाहिए, जिससे हम इन सांस्कृति आक्रमणों से अपनी संस्कृति को बचा सकें।

जब कभी भी आपके मन में अशुद्ध विचारों के साथ किसी स्त्री के स्वरूप की कल्पना उठे तोत आप ʹ दुर्गादेव्यै नमः।ʹ मंत्र का बार-बार उच्चारण करें और मानसिक प्रणाम करें। स्वामी शिवानंदजी

ʹन रिष्येम कदा चनʹ। अनीति के आगे सिर न झुकाओ। (अथर्ववेदः 20.127.14)

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पूजा में ध्यान रखने योग्य बातें !


पूजा साधना करते समय बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर सामान्यतः हमारा ध्यान नही जाता है लेकिन पूजा साधना की द्रष्टि से ये बातें अति महत्वपूर्ण हैं |

शास्त्रो में बांस की लकड़ी जलाना मना है फिर भी लोग अगरबत्ती जलाते है, जो कि बांस की बनी होती है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष लगता है। शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता | सब जगह धूप ही लिखा हुआ मिलता है। अगरबत्ती तो केमिकल से बनाई जाती है भला केमिकल या बांस जलने से भगवान खुस कैसे होंगे ? अगरबत्ती जलाना बांध करे सब पंडित लोग। पूजन सामग्री में जब आप यजमान को अगरबत्ती लिख कर देंगे ही नहीं तो जलाने का सवाल ही नहीं। इस सत्य से यजमानो को अवगत कराये। आजकल लोगो को पितृ दोष बहुत होते है इसका एक कारण अगरबत्ती का जलना भी है।

1.       गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं | भैरव की पूजा में तुलसी का ग्रहण नही है|
2.       कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोडकर निषेध है |

3.       बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नही करते |

4.       रविवार को दूर्वा नही तोडनी चाहिए |

5.       केतकी पुष्प शिव को नही चढ़ाना चाहिए |

6.       केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें |

7.       देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नही चाहिए |

8.       शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नही होता |

9.       जो मूर्ति स्थापित हो उसमे आवाहन और विसर्जन नही होता |

10.   तुलसीपत्र को मध्याहोंन्त्तर ग्रहण न करें |

11.   पूजा करते समय यदि गुरुदेव ,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें |

12.   मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है |

13.   कमल को पांच रात ,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है |

14.   पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है |

15.   शालिग्राम पर अक्षत नही चढ़ता | लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है |

16.   हाथ में धारण किये पुष्प , तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं |

17.   पिघला हुआ घृत और पतला चन्दन नही चढ़ाना चाहिए |

18.   दीपक से दीपक को जलाने से प्राणी दरिद्र और रोगी होता है | दक्षिणाभिमुख दीपक को न रखे | देवी के बाएं और दाहिने दीपक रखें | दीपक से अगरबत्ती जलाना भी दरिद्रता का कारक होता है |

19.    द्वादशी , संक्रांति , रविवार , पक्षान्त और संध्याकाळ में तुलसीपत्र न तोड़ें |

20.   प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढाएं |

21.   आसन , शयन , दान , भोजन , वस्त्र संग्रह , ,विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गयी है |

22.   जो मलिन वस्त्र पहनकर , मूषक आदि के काटे वस्त्र  , केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं |

23.   मिट्टी , गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें |

24.   मूर्ती स्नान में मूर्ती को अंगूठे से न रगड़े ।

25.   पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए | इसके बाद न करें |
26.   जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है , उस स्थान पर दुर्भिक्ष , मरण , और भय उत्पन्न होता है |

27.   पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि , चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें |

28.   कृष्णपक्ष में , रिक्तिका तिथि में , श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें |

29.   अपराह्नकाल में , रात्रि में , कृष्ण पक्ष में , द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें |

30.   मंडप के नव भाग होते हैं , वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है | अर्थात् टेढ़ा नही होता |

31.   जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नही होती वह यजमान का नाश करता है |

 

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रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद


स्वामी विवेकानंद     :  मैं समय नहीं निकाल पाता | जीवन आपा -धापी से भर गया है |

रामकृष्ण परमहंस   :  गतिविधियां तुम्हें घेरे रखती हैं | लेकिन उत्पादकता आजाद करती है |

स्वामी विवेकानंद     :  आज जीवन इतना जटिल क्यों हो गया है?

रामकृष्ण परमहंस   :  जीवन का विश्लेषण करना बंद कर दो | यह इसे जटिल बना देता है | जीवन को सिर्फ जिओ |

स्वामी विवेकानंद     :  फिर हम हमेशा दुखी क्यों रहते हैं ?

रामकृष्ण परमहंस   :  परेशान होना तुम्हारी आदत बन गयी है | इसी वजह से तुम खुश नहीं रह पाते |

स्वामी विवेकानंद     :  अच्छे लोग हमेशा दुःख क्यों पाते हैं ?

रामकृष्ण परमहंस   :  हीरा रगड़े जाने पर ही चमकता है | सोने को शुद्ध होने के लिए आग में तपना पड़ता है | अच्छे लोग दुःख नहीं पाते बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं | इस अनुभव से उनका जीवन बेहतर होता है, बेकार नहीं होता |

स्वामी विवेकानंद     :  आपका मतलब है कि ऐसा अनुभव उपयोगी होता है ?

रामकृष्ण परमहंस   :  हां | हर लिहाज से अनुभव एक कठोर शिक्षक की तरह है | पहले वह परीक्षा लेता है और फिर सीख देता है |

स्वामी विवेकानंद     :  समस्याओं से घिरे रहने के कारण हम जान ही नहीं पाते कि किधर जा रहे हैं…

रामकृष्ण परमहंस   :  अगर तुम अपने बाहर झांकोगे तो जान नहीं पाओगे कि कहां जा रहे हो | अपने भीतर झांको | आखें दृष्टि देती हैं | हृदय राह दिखाता है |

स्वामी विवेकानंद     :  क्या असफलता सही राह पर चलने से ज्यादा कष्टकारी है ?

रामकृष्ण परमहंस   :  सफलता वह पैमाना है जो दूसरे लोग तय करते हैं | संतुष्टि का पैमाना तुम खुद तय करते हो |

स्वामी विवेकानंद     :  कठिन समय में कोई अपना उत्साह कैसे बनाए रख सकता है ?

रामकृष्ण परमहंस   :  हमेशा इस बात पर ध्यान दो कि तुम अब तक कितना चल पाए, बजाय इसके कि अभी और कितना चलना बाकी है | जो कुछ पाया है, हमेशा उसे गिनो; जो हासिल न हो सका उसे नहीं |

स्वामी विवेकानंद     :  लोगों की कौन सी बात आपको हैरान करती है ?

रामकृष्ण परमहंस   :  जब भी वे कष्ट में होते हैं तो पूछते हैं, “मैं ही क्यों ?” जब वे खुशियों में डूबे रहते हैं तो कभी नहीं सोचते, “मैं ही क्यों ?”

स्वामी विवेकानंद     :  मैं अपने जीवन से सर्वोत्तम कैसे हासिल कर सकता हूँ ?

रामकृष्ण परमहंस   :  बिना किसी अफ़सोस के अपने अतीत का सामना करो | पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने वर्तमान को संभालो | और निडर होकर अपने भविष्य की तैयारी करो |

स्वामी विवेकानंद     :  एक आखिरी सवाल | कभी-कभी मुझे  लगता है कि मेरी प्रार्थनाएं बेकार जा रही हैं |

रामकृष्ण परमहंस   :  कोई भी प्रार्थना बेकार नहीं जाती | अपनी आस्था बनाए रखो और डर को परे रखो | जीवन एक रहस्य है जिसे तुम्हें खोजना है | यह कोई समस्या नहीं जिसे तुम्हें सुलझाना है | मेरा विश्वास करो – अगर तुम यह जान जाओ कि जीना कैसे है तो जीवन सचमुच बेहद आश्चर्यजनक है |

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आशाराम बापू को शत्-शत् अभिनन्दन |


यूँ तो धरा पर जन्म एक आम इंसान भी लेता है और वहीं एक जीव भी लेता है | पर उसके कर्म ही उसको दिव्य बनाते हैं | पूज्य गुरुदेव ने भी सत्संग में कई बार इसका वर्णन किया है “जन्म कर्म च में दिव्यं” अर्थात् उसके जन्म और कर्म दोनों ही दिव्य माने जाते हैं जो जीते जी परमात्मा के रास्ते चल पड़ता है और आत्मज्ञानी संतों की खोज करके अपने को ब्रह्म मस्ती में सराबोर कर परम पद को प्राप्त कर लेता है |

आज हम साधक भी धन्य हुए ऐसे गुरुदेव को पाकर जिन्होंने अपने जीवन काल में सदैव आत्म मस्ती  में रमण किया और जन जन तक इसका सन्देश पंहुचाया | स्वयं तो समाज सेवा और परहित के उत्थान में लगे ही रहे और सभी को इसका लाभ समझाया | बचपन से ही दैविक चमत्कारों से अनजान दुनियावालों को आकर्षित करने वाले पूज्य संत आज भी जन – जन के लोक लाडले और हिन्दू धर्म के हितैषी बनकर सबके दिलों पर राज कर रहे हैं | और उनके ही वचनों और संस्कारों का अनुसरण करते हुए उनके साधक भी समाज सेवा के कार्यों में नित्य प्रति उत्साह और जोश के साथ लगे रहते हैं |

यूँ तो बापूजी कहते हैं कि जन्म तो शरीर का होता है, आत्मा तो अजर-अमर-अविनाशी है पर भला उनके साधक कहाँ ये बात मानने वाले हैं | वो तो अपने गुरुदेव का जन्म दिवस मनाने हेतु कदम से कदम और ताल से ताल मिलाकर समाज सेवा के कार्यों में जोर-शोर से लगे हुए हैं और सदैव लगे रहते हैं |

ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की परम्पराओं पर दृष्टि डाली जाये तो वो आज के युग में भी जीवित है | आइये देखते हैं कैसे :

1) श्री राघवानंद जी महाराज

2) स्वामी रामानंद जी स्वामी

3) संत कबीर दास जी महाराज

4) संत कमाल साहिब

5) श्री दादू दीनदयाल जी महाराज

6) स्वामी निश्चलदास जी महाराज

7) स्वामी केशवानंद जी महाराज

8) स्वामी लीलाशाह जी महाराज

9) संत श्री आशारामजी बापू

गुरु स्वामी रामानंद जी महाराज की परम्परा अपने शिष्य संत कबीरदास जी पंथ से लेकर पूज्य संत श्री आशारामजी बापू जैसे महापुरुषों तक की ये संत परम्परा आज भी सजीव है । हमें विश्ववासियों को, भारत के सपूतों को इस सच्चाई से अवगत कराना होगा कि पूज्य संत श्री आशारामजी बापू कोई सामान्य संत नहीं हैं । ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की संत परम्परा हम आज भी प्रत्यक्ष देख सकते हैं |

हर युग में संतों पर श्रद्धा रखने वाले श्रधालु लाभ लेते आयें हैं वहीँ दूसरी ओर कुतर्की लोग संतों पर जुल्म भी करते आये हैं । लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था कभी डिगाये नहीं डिगती क्योंकि श्रद्धा रखने वाले श्रद्धालुओं ने अपने जीवन में आदिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक लाभ एवं चमत्कार प्रत्यक्ष अनुभव किये हुए होते हैं इसलिए वे सत्पथ से कभी विचलित नहीं होते और अपने सत् धर्म का प्रचार-प्रसार करते चले जाते हैं ।

इसी तरह आज संत श्री आशारामजी बापू अपने 75 वर्षीय उम्र में भी लगातार 50 वर्षों से समाज हित के दैवी कार्य करते ही चले जा रहें हैं और आज कुतर्की और षड्यंत्रकारियों के कारण ऐसे महान संत को जेल में डाला गया । लेकिन उनके शिष्यों द्वारा समाज-उत्थान के कार्य आज भी प्रत्यक्ष हम विश्वभर में देख सकते हैं ।

जेल में होने के बावजूद ऐसे महान संत के दैवी कार्य बंद नहीं हुए हैं । आज भी कई जगह जप यज्ञ, भंडारे, जल सेवा, छाछ वितरण, कम्बल वितरण, हॉट केस आदि जीवनोपयोगी सामग्री जरूरतमंदों में वितरित की जाती है । साथ ही साथ बाल संस्कार, युवा सेवा संघ, महिला उत्थान कार्यक्रम, आश्रमों में पूजा-पाठ, भंडारा, योगासन आदि कई कार्यक्रम नित्यप्रति किये जा रहे हैं ।

कल आने वाले 10 अप्रैल 2015 को पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू के जन्मोत्सव को हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी “विश्व-सेवा दिवस” के रूप में मनाया जा रहा है  और जोधपुर में विशाल स्वच्छता अभियान भी पुरजोर तरीके से किया जा रहा है |

धन्य हैं ऐसे गुरुदेव और उनके ऐसे गुरुभक्त और उनकी सच्ची श्रद्धा और आस्था !! भारत के महान संतों-महापुरुषों को मेरा शत्-शत् नमन् !

 

 

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