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महाशिवरात्रि


महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना और आत्मशुद्धि का पर्व है। इस दिन व्रत, ध्यान और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र जाप से आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। शिवलिंग अभिषेक, रात्रि जागरण और शिवकथा सुनने से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शिव परिवार का प्रतीकात्मक संदेश समरसता, संतुलन और साधना को दर्शाता है। इस शुभ अवसर पर शिवभक्ति से जीवन में नई चेतना और शक्ति का संचार करें। हर-हर महादेव!

ॐ नमः शिवाय और महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है, जो भगवान शिव की आराधना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए समर्पित है। इस पावन रात्रि में शिव जी की भक्ति करने से आत्मशुद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि और “बम” बीज मंत्र

“बम” शब्द बीज मंत्र है – शिवरात्रि की रात को सवा लाख जप करने से वायु दोष, गठिया बीमारी, मानसिक तनाव आदि दूर हो जाते हैं। शिवरात्रि के दिन “बम बम भोले” का जाप करने से वायु संबंधी बीमारियां समाप्त हो जाती हैं और व्यक्ति की ऊर्जा संतुलित होती है।

ग्रह-नक्षत्रों का योग और आध्यात्मिक प्रभाव :

फाल्गुन मास की अमावस्या को ग्रह नक्षत्रों का विशेष संयोग बनता है, जिससे इस दिन की ऊर्जा अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होती है। यह दिन ध्यान, साधना, और भक्ति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। शिवरात्रि के दिन उपवास और संयम रखने से व्यक्ति का मन और बुद्धि उच्च आध्यात्मिक स्तर पर पहुँचते हैं।

संयम और शिव आराधना का महत्व :

ॐ नमः शिवाय का जाप और संयम रखने से आध्यात्मिक कल्याण होता है। शिवरात्रि का प्रभाव हमारे मन, बुद्धि, और चित्त पर पड़ता है। इस दिन पति-पत्नी को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, क्योंकि इस दिन सांसारिक कर्म करने से नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है, जिससे जीवन में हताशा, निराशा, और आत्महत्या के विचार उत्पन्न हो सकते हैं।

सनातन संस्कृति की महिमा :

चार प्रमुख प्राचीन संस्कृतियां हैं – मिश्र की संस्कृति, प्राचीन रोम की संस्कृति, चीन की संस्कृति और हिंदुस्तान की सनातन संस्कृति। लेकिन जहां अन्य संस्कृतियाँ विलुप्त हो गईं, वहीं भारतीय सनातन संस्कृति आज भी जीवित है। शिवालयों में आज भी लाखों करोड़ों श्रद्धालु ॐ नमः शिवाय का जाप करते हैं, जिससे भारतीय संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण मिलता है।

शिव जी की उपासना और प्रतीकात्मकता :

भगवान शिव को व्यसन भंग का नहीं, बल्कि भुवन भंग का व्यसन है। शिव सृष्टि के ऐसे माली हैं, जो कभी-कभी उथल-पुथल मचाकर नए और सुंदर जगत की रचना करते हैं। शिव जी का वेशभूषा हमें जीवन के गहरे संदेश देती है:

मुंडों की माला – इसका अर्थ है, वे उन्हीं को स्वीकारते हैं जिनके मस्तक में भगवत ज्ञान का प्रकाश हो।

गले में सर्प – यह जीवन की अस्थिरता और माया का प्रतीक है।

शमशान की राख – हमें यह सिखाती है कि यह शरीर नश्वर है और अहंकार त्यागना चाहिए।

त्रिशूल – यह तीन प्रकार के कष्ट (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) को दूर करने का प्रतीक है।

कैलाश पर निवास – यह ऊँचे आध्यात्मिक स्तर और मन की स्थिरता को दर्शाता है।

शिव परिवार से जीवन के संदेश :

भगवान शिव का पूरा परिवार हमें जीवन में समता, सहिष्णुता और संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।

शिव जी का वाहन बैल और पार्वती जी का वाहन सिंह – जो प्राकृतिक रूप से शत्रु होते हैं, लेकिन शिव के पास प्रेम और संतुलन में रहते हैं।

गणपति का वाहन चूहा और कार्तिकेय का वाहन मोर – ये एक-दूसरे के स्वाभाविक शत्रु हैं, फिर भी शिव परिवार में समरसता से रहते हैं।

महाशिवरात्रि की पूजन विधि :

व्रत और उपवास – पूरे दिन उपवास रखें या गाय का दूध, सेव फल या अंगूर लें।

शिवलिंग अभिषेक – जल, दूध, दही, शहद, बेलपत्र और गंगाजल से अभिषेक करें।

ॐ नमः शिवाय का जाप – कम से कम 108 बार जाप करें।

रात्रि जागरण – पूरी रात जागकर शिव कथा, मंत्र जाप और ध्यान करें।

बिल्वपत्र चढ़ाना – बिल्वपत्र शिव जी को अत्यंत प्रिय हैं और यह वायु दोष को दूर करता है।

शिवरात्रि के चार प्रमुख रात्रियाँ :

महाशिवरात्रि – यह “अहोरात्रि” कहलाती है।

जन्माष्टमी – इसे “मोहरात्रि” कहा जाता है।

होली – यह “दारुणरात्रि” के रूप में जानी जाती है।

काली चौदस – इसे “कालरात्रि” कहते हैं।

इन चार रात्रियों में ध्यान, संयम और आध्यात्मिक साधना करने से व्यक्ति के मन और बुद्धि का स्तर उच्च केंद्रों पर पहुँच जाता है और जीवन में शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

ॐकार और शिव भक्ति का प्रभाव :

ॐ नमः शिवाय का जाप इच्छित वस्तु को प्राप्त करने और आत्मिक उन्नति के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

रोज 108 बार ॐकार जप करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

दुगुना जप करने वाले को विष्णु पद की प्राप्ति होती है।

तिगुना जप करने वाला साक्षात शिव तत्व में लीन हो जाता है।

आरती और मंदिर दर्शन का महत्व :

मंदिर में प्रवेश कर हाथ ऊपर उठाने से मन और प्राण उच्च स्तर पर जाते हैं। घंटा बजाने से नकारात्मक विचार शांत हो जाते हैं और सद्भावना का संचार होता है। शिव पूजा में प्रयुक्त प्रत्येक वस्तु का विशेष आध्यात्मिक महत्व है।

निष्कर्ष :

महाशिवरात्रि का यह पावन पर्व आत्मशुद्धि, भक्ति, और ध्यान के लिए एक सुनहरा अवसर है। शिवरात्रि के दिन संयम, पूजा और मंत्र जाप करने से आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि व्रत : 26 फरवरी
निशीथकाल
(रात्रि 12:15 से 1:04 तक)
(प्रहर :- प्रथम : शाम 6:29 से, द्वितीय : रात्रि 9:34 से, तृतीय : मध्यरात्रि 12:39 से, चतुर्थ : 27 फरवरी प्रातः 3:45 से) (पारणा : 27 फरवरी)

आओ, इस महाशिवरात्रि पर ॐ नमः शिवाय का जाप करें और अपने जीवन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दें।

ॐ नमः शिवाय।

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संकल्पशक्ति का प्रतीक : रक्षाबंधन


rakhi,raksha bandhan,ashram,asharamhji bapu,asaramji,guru,om,spiritual,hinduभारतीय संस्कृति का रक्षाबंधन महोत्सव, जो श्रावणी पूनम के दिन मनाया जाता हे, आत्मनिर्माण , आत्मविकास का पर्व हे . आज के दिन पृथ्वी ने मानो हरी साडी पहनी है | अपने हृदय को भी प्रेमाभक्ति से, सदाचार – सयंम से पूर्ण करने के लिए प्रोत्साहित करने वाला यह पर्व है |

आज रक्षाबंधन के पर्व पर बहन भाई को आयु , आरोग्य और पुष्टि की वृद्धि की भावना से राखी बाँधती है | अपना उद्देश्य ऊँचा बनाने का संकल्प लेकर ब्राह्मण लोग जनेऊ बदलते हैं , समुन्द्र का तूफानी स्वभाव श्रावणी पूनम के बाद शांत होने लगता है ,इससे जो समुंद्री व्यापार करते हैं   वे नारियल फोड़ते हैं |

रक्षाबंधनका का उत्सव  श्रावणी पूनम को ही क्यों रखा गया !  भारतीय संस्कृति में संकल्पशक्ति के सदुपयोग की सुंदर व्यवस्था हे. ब्राह्मण कोइ शुभ कार्य कराते हैं, तो कलावा ( रक्षासूत्र ) बाँधते हैं ताकि आपके शरीर में छुपे दोष या कोइ रोग , जो आपके शरीर को अस्वस्थ कर रहा हो, उनके कारण आपका मन और बुद्धि  भी निर्णय लेने में थोड़े अस्वस्थ न रह जाये |

सावन के महीने में सूर्य की किरणें धरती पर कम पड़ती हैं. जिससे किसी को दस्त, किसी को उल्टियाँ, किसीको अजीर्ण, किसीको बुखार हो जाता है तो किसीका शरीर टूटने लगता है. इसलिए रक्षाबंधन के दिन रक्षासूत्र बाँध कर  तन–मन–मति की स्वास्थ्य-रक्षा का संकल्प किया जाता है, कितना रहस्य है !

अपना शुभ संकल्प और शरीर के ढांचे की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यह श्रावणी पूनम का रक्षाबंधन महोत्सव है | आज के दिन रक्षासूत्र बांधने से वर्ष भर रोगों से हमारी रक्षा रहे,  ऐसा एक – दूसरे के प्रति सत् संकल्प करते हैं | रक्षाबंधन के दिन बहन भाई के ललाट पर तिलक – अक्षत लगाकर संकल्प करती है कि “ जेसे शिवजी त्रिलोचन हैं , ज्ञानस्वरूप हैं, वेसे ही मेरे भाई में भी विवेक बढ़े, मोक्ष के ज्ञान, मोक्ष्मय प्रेमस्वरूप ईश्वर का प्रकाश आये. मेरा भाई इस सपने जैसी दुनिया को सच्चा मानकर न उलझे , मेरा भाई साधारण चर्मचक्षुवाला न हो , दूरद्रष्टा हो| “ क्षणे रुष्ट: क्षणे तुष्ट : “ न हो , जरा – जरा बात में भडकने वाला न हो, धीर – गंभीर हो. मेरे भाई की सूझबूझ, यश , कीर्ति  और ओज – तेज अक्षुण रहें. भैया को राखी बांधी और मुहँ मीठा किया , भाई गद् गद् हो गया | बहन का शुभ संकल्प होता है और भाई का बहन के प्रति सदभाव होता है, भाई को भी बहन के लिए कुछ करना चाहिए, अभी तो चलो साडी, वस्त्र या कुछ दक्षिणा दे दी जाती है परन्तु यह रक्षाबंधन महोत्सव दक्षिणा या कोइ चीज देने से वहीँ संपन्न नहीं हो जाता. आपने बहन की शुभकामना ली है तो आप भी बहन के लिए शुभ भाव रखें कि ‘ अगर मेरी बहन के ऊपर कभी भी कोई कष्ट , विध्न – बाधा आये तो भाई के नाते बहन के कष्ट में दौड़कर पहुँच जाना मेरा कर्तव्य है ‘. बहन की धन – धान्य, इज्जत की दृष्टि से तो रक्षा करें, साथ ही बहन का चरित्र उज्जवल रहें ऐसा भाई सोचे और भाई का चरित्र उज्जवल बने ऐसा सोचकर बहने अपने मन को काम में से राम की तरफ ले जायें. इस भाई – बहन के पवित्र भाव को उजागर करके न जाने कितने लोगों ने युद्ध टाल दीये, कितनी नरसंहार की कुचेष्टाएं इस धागे ने बचा ली |

सर्वरोगोंपशमनम् सर्वा शुभ विनाशनम् I
सक्र्त्क्रते नाब्दमेकं येन रक्षा कृता भवेत्  I I

‘ इस पर्व पर धारण किया हुआ रक्षासूत्र सम्पूर्ण रोगों तथा अशुभ कार्यों का विनाशक है. इसे वर्ष में एक बार धारण करने से वर्ष भर मनुष्य रक्षित हो जाता है ,यह पर्व समाज के टूटे हुए मनो को जोड़ने का सुंदर अवसर है. इसके आगमन से कुटुंब में आपसी कलह समाप्त होने लगते हैं , दूरी मिटने लगती है, सामूहिक संकल्पशक्ति साकार होने लगती है |

श्रावणी पूनम अर्थात रक्षाबंधन महोत्सव बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है | हजार – दो हजार वर्ष , पांच हजार वर्ष , लाख – दो लाख वर्ष नहीं , करोडों वर्ष प्राचीन है यह उत्सव , देव – दानव युद्ध में वर्षों के युद्ध के बाद भी निर्णायक परिस्थितियां नहीं आ रहीं थी , तब इन्द्र ने गुरु ब्रहस्पतिजी से कहा कि ‘ युद्ध से भागने की भी स्थति नहीं है और युद्ध में डटे रहना भी मेरे बस का नहीं है. गुरुवर ! आप ही बताओ क्या करें – ‘ इतने में इन्द्र की पत्नीं शचि ने कहा : “ पतिदेव ! कल मैं आपको अपने संकल्प – सूत्र में बांधूगी .”

ब्राह्मणों के द्वारा वेदमंत्र का उच्चारण हुआ , ओंकार का गुंजन हुआ और शचि ने अपना संकल्प जोड़कर वह सूत्र इंद्र की दायीं कलाई में बांध दिया , तो इन्द्र का मनोबल , निर्णयबल , भावबल , पुण्यबल बढ़ गया , उस संकल्पबल ने ऐसा जोहर दिखाया कि इन्द्र दैत्यों को परास्त करके देवताओं को विजयी बनाने में सफल हो गये|

सब कुछ देकर त्रिभुवनपति को अपना द्धारापाल बनाने वाले बलि को लक्ष्मीजी ने राखी बांधी थी | राखी बाँधनेवाली बहन अथवा हितैषी व्यक्ति के आगे कृतज्ञता का भाव व्यक्त होता है | राजा बलि ने पूछा : “ तुम क्या चाहती हो “ लक्ष्मी जी ने कहा : “वे जो तुम्हारे नन्हें – मुन्ने द्धारापाल है , उनको आप छोड़ दो “.

भक्त के प्रेम से वश होकर जो द्धारापाल की सेवा करते हैं, ऐसे भगवान नारायण को द्धारापाल के पद से छुडाने के लिए लक्ष्मीजी ने भी रक्षाबंधन महोत्सव का उपयोग किया |

बहनें इस दिन ऐसा संकल्प करके रक्षासूत्र बांधें कि ‘ हमारे भाई भगवत्प्रेमी बनें ‘. और भाई सोचें कि हमारी बहन भी चरित्र प्रेमी , भगवत्प्रेमी बने ‘. अपनी सगी बहन व पड़ोस की बहन के लिए अथवा अपने सगे भाई व पडोसी भाई के प्रति ऐसा सोंचे . आप दूसरे के लिए भला सोचते हो तो आपका भी भला हो जाता है | संकल्प में बड़ी शक्ति है , अत: आप ऐसा संकल्प करें कि हमारा आत्मस्वभाव प्रकटे |

रक्षाबंधन (Raksha Bandhan Festival) पर बहनों द्वारा भाईयों को राखी बांधने का जितना महत्व है उतना ही राखी बांधने के तरीके का भी है।
राखी बांधते समय बहनों द्वारा भाई की कलाई पर बांधी गई राखी में तीन गांठें लगाना शुभ माना जाता है क्योंकि तीन गांठ का संबंध त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश से है।
ऐसी मान्यता है कि राखी की पहली गांठ भाई की लंबी आयु के लिए, दूसरी गांठ स्वयं की लंबी आयु के लिए, तीसरी गांठ भाई बहन के रिश्ते में मिठास लाने और सुरक्षित रखने के लिए बांधी जाती है। इस तरह भाई को बांधी गई राखी में तीन गांठ लगाना शुभता का प्रतीक होता है।
बहने अपने भाई को राखी बांधते समय इस मंत्र का जाप अवश्य करें-
                ‘‘ऊँ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। 
                तेन त्वामभि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल‘‘
इस मंत्र का अर्थ है- जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा। हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो।
रक्षाबंधन (Raksha Bandhan Festival) पर राखी बांधते समय बहने को राखी की थाल (Rakhi ki thaal) में कुछ चीजों को शामिल करना बहुत जरूरी है। इनके बिना राखी की थाली (Rakhi ki thaal) अधूरी मानी जाती है। बहने अगर राखी की थाल में इन चीजों को शामिल कर ले तो इससे न सिर्फ उनके भाई की लंबी उम्र होती है बल्कि उन पर मां लक्ष्मी की कृपा भी बनी रहती है। आइए जाने कैसे बहनों को रक्षाबंधन की थाली तैयार करनी चाहिए-
राखी की थाली तैयार करते समय उसमे सबसे पहली और जरूरी चीजों में से सिंदूर (Rakhi ki thaal main sindoor) को जरूर शामिल करना चाहिए। सिंदूर को मां लक्ष्मी (Lord Laxmi) का प्रतीक माना जाता है इसलिए इसे अपनी थाली में जरूर शामिल करें। बहनों द्वारा भाई के माथे पर सिंदूर का तिलक लगाने से उन पर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और उनके पास पैसे की कोई कमी भी नहीं रहती।
बहनों द्वारा भाई के माथे पर चंदन का तिलक (Rakhi par Chandan ka tilak) लगाने से बहन भाई को भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और गणेश (Lord Ganesh) का आशीर्वाद प्राप्त करवाती है। चंदन इसलिए लगाना चाहिए जिससे आपके भाई का मन शांत रहे और वह धर्म और कर्म के रास्ते से न भटके और वह न सिर्फ अपनी बहनों की रक्षा करें बल्कि बाकी स्त्रियों की भी रक्षा करें।
बहनों द्वारा भाई की कलाई पर राखी बांधने से भाई के जीवन में संपन्नता आती है। उनके जीवन में सुख और समृद्धि बनी रहती है। जिस प्रकार राजा बली रक्षासूत्र में बंध गए थे। उसी तरह भाई पर कोई आंच न आए और वह भी रक्षा सूत्र से बंधे रहें और अपने कर्तव्यों का अच्छे से पालन करें। इसी कामना के साथ बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है।
बहनों को अपनी राखी की थाली में दीपक (Rakhi ki thaali main deepak) को जरूर शामिल करना चाहिए। दीपक में अग्निदेव का वास होता है जो किसी भी धार्मिक कार्य में साक्षी के तौर पर माने जाते हैं। साथ ही अग्नि को ऊर्जा और प्राण का प्रतीक भी माना जाता है। दीपक को जलाने से नकारात्मकता विचारों का नास होता है।
हिंदू धर्म (Hindu dharm) में किसी भी धार्मिक कार्य में आरती जरूर की जाती है। ऐसे में रक्षाबंधन के त्योहार पर बहने अपनी भाई की कलाई पर राखी बांधकर अपने भाई की आरती जरूर उतारें। ऐसे करने से भाई के ऊपर से नकारात्मक प्रभाव दूर होता है।
राखी बांधने के बाद बहनें अपने भाई को मिठाई खिलाकर उनका मुंह मीठा कराती है। यह मिठाई घर पर बनी भी हो सकती है या इसे बाजार से खरीद कर भी भाई को खिलाया जा सकता हैं।
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(श्रीरामचरितमानस, सुन्दरकांड)

Ram Navmi1

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम !

हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ।।

 हनुमानजी ने मैनाक पर्वत को हाथों से छू दिया, फिर प्रणाम करके कहा – भाई ! श्रीरामचन्द्रजी का काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ?

श्री राम नवमी : 10 March

तो जिस प्रकार श्री राम के कार्य को पूर्ण किये बिना हनुमान जी को विश्राम भाता नहीं, उसी तरह हम साधकों का भी यही दृड़ निश्चय होना चाहिए कि गुरुदेव हमें जिस परम लक्ष्य तक पंहुचाना चाहते हैं, हम उसे पाए बिना रुके नहीं और कहीं विश्राम के लिए रुके नहीं ! हनुमान जी के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेते हुए हमें भी इसी तरह नित-निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए !

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Festival

श्री राम नवमी

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Festival

Ganga


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Ganga Saptmi

Ganga Saptami (2nd May 2017) is an event associated with the divinity of the Ganga River. She descended on Earth from her heavenly abode on this day, and it is also known as Jahnu Saptami or Ganga Jayanti. There is an interesting legend supported by important Hindu scriptures around the significance of this day. This occasion is celebrated with a lot of pomp in places like Allahabad, Prayag, Haridwar, Rishikesh and Varanasi; where the consecrated River Ganga and her tributaries flow. According to the Hindu calendar, it appears in the Hindu month of Vaishakha, which is April or May in the Gregorian calendar; on the seventh day of Shukla Paksha.

What is its importance?

According to ancient legends, it is said that Ganga was born from the perspiration of Vishnu’s feet and then later re-born from Brahma’s ewer. But Ganga Saptami is an important occasion where Ganga was reborn on Earth.

According to one legend, Raja Bhagiratha was the ruler of Kosala. He was facing a lot of trouble in his kingdom, which he believed was a result of his ancestor’s bad deeds. He then implored the Lords to seek redemption, realising that only the purity of the blessed Ganga could sanctify him. He undertook a penance to please Lord Brahma. Decades later, Brahma finally materialised and assured him that Ganga will descend on Earth. But there was a problem. Her surge would be so powerful, that the entire earth would get destroyed. He advised the King to implore Lord Shiva who is the only one who could control her flow. Finally, Shiva released Ganga from his head, so as to absolve the sins of Bhagiratha’s ancestors. She then descended on Earth and this day is celebrated as the Ganga Saptami Day. But on her way, she managed to wreak a sage’s hermitage. The sage called Rishi Jahnu, raging, ‘drank’ the whole of the Ganga. Only when he was pleased by Bhagiratha’s prayers did her release her from his ear; and therefore, this occasion is also known as Jahnu Saptami.

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Chetichand Utsav by Sadhak and Ashram of Sant Asharam Bapu


चेटीचंड महोत्सव निमित्त शरबत वितरण,फल वितरण,जल वितरण,चना वितरण सेवा संत श्री आशाराम बापूजी के प्यारे साधकों ने की |

चेटीचंड महोत्सव निमित्त सेवा

संत श्री आशाराम बापूजी की प्रेरणा से रायपुर छ.ग.में साधक परिवार

द्वारा शीतल जल सेवा गुरुनानक चौक पर ,ऐसे आयोजन में मुख्य रूप

से नगर के छ.ग.के पयार्वरण मंडल के उपाध्यक्ष राज्य मंत्री दर्जा श्री

केदार गुप्तजी व् वार्ड के पार्षद श्री विट्ठल जी व् पार्षद श्री भावेश

पिथारिया जी बड़ी संख्या में साधक व् गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

अहमदाबाद आश्रम में साईं झूलेलाल कीर्तन यात्रा का आगमन हुआ । बड़ी ही संख्या में भक्तगण झूलेलाल आयोलाल की गूँज करते-करते आश्रम पधारे ।

अहमदाबाद आश्रम का बड़ा ही आध्यात्मिक मनमोहक वातावरण
साथ ही जाबाल्य ऋषि की तपोभूमि और लगातार 55 वर्षों से जप-तप-साधना के संस्कार बिखेरती ये मनमोहक ऋषिभूमि भक्तों के लिए रसमयता प्रदान करती है ।

गुड़ी पड़वा, चेटीचंड पर्व, नूतन वर्ष के निमित्त प्रति वर्ष सत्संग भजन कीर्तन भंडारे का आयोजन किया जाता है । लाखों की संख्या में भक्तगण इस द्वार पर आते हैं और पूज्य संत श्री आशाराम बापूजी की प्रत्यक्षता का अनुभव करते हैं । आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं ।

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Chatichand Utsav by Sadhak Parivar

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