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ध्यान (योग) – संत श्री आशारामजी बापू


संत श्री आशारामजी बापू

संत श्री आशारामजी बापू

ध्यान करने के लिए स्वच्छ जगह पर स्वच्छ आसन पे बैठकर साधक अपनी आँखे बंध करके अपने मन को दूसरे सभी संकल्प-विकल्पो से हटाकर शांत कर देता है। और ईश्वर, गुरु, मूर्ति, आत्मा, निराकार परब्रह्म या किसी की भी धारणा करके उसमे अपने मन को स्थिर करके उसमें ही लीन हो जाता है। जिसमें ईश्वर या किसीकी धारणा की जाती है उसे साकार ध्यान और किसीकी भी धारणा का आधार लिए बिना ही कुशल साधक अपने मनको स्थिर करके लीन होता है उसे योग की भाषा में निराकार ध्यान कहा जाता है। गीता के अध्याय-६ में श्रीकृष्ण द्वारा ध्यान की पद्धति का वर्णन किया गया है।

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पूजा में ध्यान रखने योग्य बातें !


पूजा साधना करते समय बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर सामान्यतः हमारा ध्यान नही जाता है लेकिन पूजा साधना की द्रष्टि से ये बातें अति महत्वपूर्ण हैं |

शास्त्रो में बांस की लकड़ी जलाना मना है फिर भी लोग अगरबत्ती जलाते है, जो कि बांस की बनी होती है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष लगता है। शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता | सब जगह धूप ही लिखा हुआ मिलता है। अगरबत्ती तो केमिकल से बनाई जाती है भला केमिकल या बांस जलने से भगवान खुस कैसे होंगे ? अगरबत्ती जलाना बांध करे सब पंडित लोग। पूजन सामग्री में जब आप यजमान को अगरबत्ती लिख कर देंगे ही नहीं तो जलाने का सवाल ही नहीं। इस सत्य से यजमानो को अवगत कराये। आजकल लोगो को पितृ दोष बहुत होते है इसका एक कारण अगरबत्ती का जलना भी है।

1.       गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं | भैरव की पूजा में तुलसी का ग्रहण नही है|
2.       कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोडकर निषेध है |

3.       बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नही करते |

4.       रविवार को दूर्वा नही तोडनी चाहिए |

5.       केतकी पुष्प शिव को नही चढ़ाना चाहिए |

6.       केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें |

7.       देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नही चाहिए |

8.       शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नही होता |

9.       जो मूर्ति स्थापित हो उसमे आवाहन और विसर्जन नही होता |

10.   तुलसीपत्र को मध्याहोंन्त्तर ग्रहण न करें |

11.   पूजा करते समय यदि गुरुदेव ,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें |

12.   मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है |

13.   कमल को पांच रात ,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है |

14.   पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है |

15.   शालिग्राम पर अक्षत नही चढ़ता | लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है |

16.   हाथ में धारण किये पुष्प , तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं |

17.   पिघला हुआ घृत और पतला चन्दन नही चढ़ाना चाहिए |

18.   दीपक से दीपक को जलाने से प्राणी दरिद्र और रोगी होता है | दक्षिणाभिमुख दीपक को न रखे | देवी के बाएं और दाहिने दीपक रखें | दीपक से अगरबत्ती जलाना भी दरिद्रता का कारक होता है |

19.    द्वादशी , संक्रांति , रविवार , पक्षान्त और संध्याकाळ में तुलसीपत्र न तोड़ें |

20.   प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढाएं |

21.   आसन , शयन , दान , भोजन , वस्त्र संग्रह , ,विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गयी है |

22.   जो मलिन वस्त्र पहनकर , मूषक आदि के काटे वस्त्र  , केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं |

23.   मिट्टी , गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें |

24.   मूर्ती स्नान में मूर्ती को अंगूठे से न रगड़े ।

25.   पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए | इसके बाद न करें |
26.   जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है , उस स्थान पर दुर्भिक्ष , मरण , और भय उत्पन्न होता है |

27.   पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि , चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें |

28.   कृष्णपक्ष में , रिक्तिका तिथि में , श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें |

29.   अपराह्नकाल में , रात्रि में , कृष्ण पक्ष में , द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें |

30.   मंडप के नव भाग होते हैं , वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है | अर्थात् टेढ़ा नही होता |

31.   जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नही होती वह यजमान का नाश करता है |

 

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ध्यान की गहराई – आशाराम बापूजी ( भाग – 4 )


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ध्यान की गहराई

युद्ध के मैदान में अर्जुन को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पड़ी तो उस पूर्णता में रमण करने वाले श्रीकृष्ण ने वह भी कर दिया। दुर्योधन की संकीर्ण दृष्टि तोड़नी थी, उसके निमित्त विश्व को सबक सिखाना था तो श्रीकृष्ण ने यह भी मजे से किया। दुर्योधन को ठीक कर दिया और उसके पक्षवालों को भी ठिकाने लगा दिया। फिर भी श्रीकृष्ण कहते हैं-

“युद्ध के मैदान में आने के पहले, संधिदूत होकर गया था तब से लेकर अभी तक मेरे हृदय में पाण्डवों के प्रति राग न रहा हो तो और कौरवों के प्रति मेरे चित्त में द्वेष न रहा हो तो इस समता की परीक्षा के निमित्त यह मृतक बालक (अभिमन्यु का नवजात पुत्र) जिन्दा हो जाय।” वह बालक जिन्दा हो गया। समता की परीक्षा के फलस्वरूप वह जिन्दा हुआ, इसलिए उसका नाम परीक्षित पड़ा।

आपके जीवन में समता आ जाय, ज्ञान आ जाय। राग से प्रेरित होकर नहीं, द्वेष से प्रेरित होकर नहीं….. सहज स्वभाव जीवन का क्रिया-कलाप चले।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

ज्ञानवान सदा सहज कर्म करते हैं। उनकी दृष्टि में दोषयुक्त या गुणयुक्त होना बच्चों का खिलवाड़ मात्र है। जैसे जल की तरंग कभी स्वच्छ तो कभी मलिन, कभी छोटी तो कभी मोटी होती है। यह जल की लीला मात्र है। ऐसे ही अपने आत्मस्वरूप में बैठकर आपकी जो चेष्टा होगी, वह परम चैतन्य की आह्लादिनी लीला है। वह चैतन्य का विवर्त मात्र है। ऐसा समझकर ज्ञानी, जीवन्मुक्त पुरूष संसार में सुख से विचरते हैं।

सः तृप्तो भवति अमृतो भवति….।

सः तरति लोकान् तारयति….।।

‘वे तृप्त होते है, अमृतमय होते हैं। वे तरते है, औरों को तारते हैं।’

ॐ आनन्द….! ॐ शान्ति…..!! सचमुच परमानन्द….!!!

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ध्यान की गहराई – आशाराम बापूजी ( भाग – 3 )


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आत्मरति, आत्मतृप्ति और आत्मप्रीति जिसको मिल गई, उसके लिए बाह्य जगत का कोई कर्त्तव्य रहता नहीं। उसका आत्मविश्रांति में रहना ही सब जीवों का, राष्ट्र का और विश्व का कल्याण करना है। जो पुरूष विगतस्पृहा है, विगतदुःख है, विगतज्वर है, उसके अस्तित्व मात्र से वातावरण में बहुत-बहुत मधुरता आती है। प्रकृति उनके अनुकूल होती है। तरतीव्र प्रारब्धवेग से उनके जीवन में प्रतिकूलता आती है तो वे उद्विग्न नहीं होते। ऐसे स्थितप्रज्ञ महापुरूष के निकट रहने वाले साधक को चाहिए कि वह दिन का चार भाग कर दे। एक भाग वेदान्त शास्त्र का विचार करे। एक भाग परमात्मा के ध्यान में लगावे। परमात्मा का ध्यान कैसे ? ‘मन को, इन्द्रियों को, चित्त को जो चेतना दे रहा है वह चैतन्य आत्मा मैं हूँ। मैं वास्तव में जन्मने-मरने वाला जड़ शरीर नहीं हूँ। क्षण क्षण में सुखी-दुखी होने वाला मैं नही हूँ। बार-बार बदलने वाली बुद्धि वृति मैं नही हूँ। देह में अहं करके जीने वाला जीव मैं नहीं हूँ।अंहकार भी मैं नहीं हूँ। मैं इन सबसे परे, शुद्ध-बुद्ध सनातन सत्य चैतन्य आत्मा हूँ। आनन्द स्वरूप हूँ, शांत स्वरूप हूँ। मैं बोध स्वरूप हूँ…. ज्ञान स्वरूप हूँ।’ जो ऐसा चिन्तन करता है वह वास्तव में अपने ईश्वरत्व का चिंतन करता है, अपने ब्रह्मत्व का चिंतन करता है। इसी चिन्तन में निमग्न रहकर अपने चित्त को ब्रह्ममय बना दे।

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ध्यान की गहराई – आशाराम बापूजी ( भाग – 2 )


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Sant Asaramji Bapu

ध्यान की गहराई – आशाराम बापूजी ( भाग – 2 )

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