AIM, ईश्वर प्राप्ति, उद्देश्य, जीवन, प्रार्थना, बापू के बच्चे नही रहते कच्चे, यौगिक प्रयोग, विवेक जागृति, संत वाणी, संस्कार सिंचन, सत्संग, सनातन संस्कृति

जीवन का उद्देश्य !


प्रत्येक प्राणी का उद्देश्य है सर्व दुःखों का नाश और नित्य सुख की प्राप्ति। जो भी कार्य हम करते हैं, चाहे अच्छा भोजन करते हैं अथवा सिनेमा देखते हैं, उन सबके पीछे यही हेतु होता है कि सुख मिले। सुख भी हम ऐसा चाहते हैं जो सदा बना रहे, जिसका कभी नाश न हो। परंतु जीवनभर कर्म करने पर भी पूर्ण सुख नहीं मिलता। फिर आपके कर्म करने का क्या फायदा ? जिस वस्तु की प्राप्ति के लिए आजीवन कड़ी मेहनत की, फिर भी वह न मिले तो मेहनत तो व्यर्थ ही गयी न ? जब आवश्यकता भी है और पुरूषार्थ भी है तो सफलता क्यों नहीं मिलती ? इस पर विचार किया है कभी ?

बात बड़ी सीधी सी है कि तड़प और पुरूषार्थ तो है परंतु सही दिशा नहीं है। जरा कल्पना करो कि एक व्यक्ति गर्मियों की तपती दोपहरी में रेगिस्तान से गुजर रहा है और उसे बड़ी प्यास लगी है। रेत पर जब धूप पड़ती है तो वह दूर से पानी की तरह दिखती है।

अब वह यात्री इधर-उधर दौड़ रहा है। जहाँ भी देखता है थोड़ी दूरी पर पानी होने का आभास होता है परंतु निकट जाता है तो रेत-ही-रेत और इसी प्रकार इधर-उधर भटककर बेचारा प्यासा मर जाता है।

अब उस यात्री को पानी की तड़प भी थी और उसे पाने के लिए पुरूषार्थ भी किया था, फिर भी प्यासा क्यों मरा ? क्योंकि पानी को रेगिस्तान में ढूँढ रहा था। जितनी मेहनत से वह रेत में इधर-उधर दौड़ता रहा, उतनी मेहनत करके किसी नदी या कुएँ तक पहुँच जाता तो प्यास भी बुझती और प्राण भी बचते। साधारण संसारी व्यक्ति की भी ऐसी ही दशा होती है। वह सुख तो चाहता है सदा रहने वाला, परंतु उसे ढूँढता है क्षणभंगुर संसार में ! मिटने वाली और बदलने वाली वस्तुओं-परिस्थितियों से एक सा सुख कैसे मिल सकता है ?

शाश्वत सुख शाश्वत वस्तु से ही मिल सकता है और वह शाश्वत वस्तु है आत्मा। अब अनित्य पदार्थों में नित्य सुख ढूँढने वाला व्यक्ति यदि अपने पुरूषार्थ की दिशा बदल दे और नित्य आत्मसुख की प्राप्ति में लग जाय तो उसे लक्ष्यप्राप्ति में देर ही कहाँ लगेगी ! परंतु भगवान की यह माया बड़ी विचित्र है। जीव को वह इस प्रकार से भ्रमित कर देती है कि बेचारे को यह विवेक ही नहीं उपजता कि मैं रेगिस्तान में जल ढूँढकर अपने पुरूषार्थ एवं जीवन के अमूल्य समय को व्यर्थ में नष्ट कर रहा हूँ।

यदि नित्य सुख को वास्तव में प्राप्त करना हो तो बाह्य पदार्थों के असली स्वरूप को समझना पड़ेगा।

अंक ‘एक’ के बाद जितने शून्य लगते हैं, उसकी कीमत में उतनी ही वृद्धि होती है परंतु यदि एक को मिटा दिया जाय तो दाहिनी ओर कितनी भी शून्य हों उनका कोई मूल्य नहीं। उन बिन्दियों का मूल्य उस संख्या ‘एक’ के कारण है। इसी प्रकार संसार की पदार्थों की सत्ता है ही नहीं। जब हम उस सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करके उसकी ओर चलते हैं तो हमारे पास उपलब्ध पदार्थों का उपयोग भी उसी सत्कार्य में होता है। अतः उनकी शोभा बढ़ती है। परंतु जब हम उस ‘एक’ का अस्तित्व भुला बैठते हैं तो हमारे पास शून्यरूपी वस्तुएँ कितनी भी क्यों न हों, वे दुःखदायी ही होती हैं तथा पापकर्म और जन्म-मरण का कारण बनती हैं।

जो लोग विषय-भोगों को मक्खन और पेड़ा समझते हैं, वे मानों चूना खाते हैं। चूना खाने वाले की क्या दशा होती है यह सभी जानते हैं। बेचारा बेमौत मारा जाता है।

हमारी चाह तो उत्तम है परंतु उसे पाने का जो प्रयत्न कर रहे है उसके मूल में ही भूल है। हम अनित्य पदार्थों को नित्य समझकर उनसे सुख लेना चाहते हैं। शरीर हमारा है इससे सुख लें, परंतु शरीर का क्या भरोसा ? इस पर गर्व किसलिये ? जब शरीर ही स्थिर नहीं है तो फिर शरीर को मिलने वाले पदार्थ, विषय, सम्बन्ध आदि कहाँ से स्थिर होंगे ? धन इकट्ठा करने और सम्मान प्राप्त करने के लिए हम क्या-क्या नहीं करते, यद्यपि हम यह भी जानते हैं कि यह सब अंत में काम नहीं आयेगा। अस्थिर पदार्थों की तो बड़ी चिंता करते हैं परंतु हम वास्तव में क्या हैं, यह कभी सोचते ही नहीं। हम ड्राइवर हैं परंतु स्वयं को मोटर समझ बैठे हैं, हम मकान के स्वामी हैं परंतु अपने को मकान समझते हैं। हम अमर आत्मा है परंतु अपने को शरीर समझ बैठे हैं। बस यही भूल है, जिसने हमें सुख के लिए भटकना सिखाया है।

संसार की कोई भी वस्तु सुन्दर और आनंदरूप नहीं है। सुन्दर और आनंदरूप एक परमात्मा ही है। उसी के सौन्दर्य का थोड़ा अंश प्राप्त होने से यह संसार सुन्दर लगता है। उस आनंदस्वरूप की सत्ता से चल रहा है इसीलिए इसमें भी आनंद भासता है। अतः हमें चाहिए कि संसार के पदार्थ जिसकी सत्ता से आनंददायी व सुखरूप भासते हैं, उसी ईश्वर से अपना दिल मिलाकर भगवदानंद प्राप्त करें जो इस शरीर के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता, किंतु शर्त यह है कि हम अपने पुरूषार्थ को उस ओर लगायें। हम उद्यम कर सकते हैं, कष्ट भी सह सकते हैं, केवल इच्छा को परिवर्तित करना होगा। ऐसा आज तक नहीं हुआ कि मनुष्य को किसी पदार्थ की प्रबल इच्छा हो और वह उसे प्राप्त न हुआ हो।

प्रत्येक प्राणी की दौड़ आनंद की ओर है। चाहे करोड़पति क्यों न हो, वह भी सुख के लिए, आनंद के लिए ही भागता-फिरता है। यहाँ तक कि मकोड़ी भी आनंद की प्राप्ति के लिए ही दौड़ रही है। वह भी दुःख नहीं चाहती, मरना नहीं चाहती। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक प्राणी आनंद के लिए दौड़ रहा है परंतु उसे नश्वर वस्तुओं में ढूँढता है। इसलिए दौड़-भाग में ही समय पूरा हो जाता है, आनंद मिलता ही नहीं।

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नानकजी ने फरमाया हैः

नानक दुखिया सब संसार। दुःख संसार में है परंतु आत्मा में तो संसार है ही नहीं और वह आत्मा हमारी जान है। यदि उस आत्मा को पाने को यत्न करोगे तो तुम्हें आनंद और सुख के अतिरिक्त कुछ दिखेगा ही नहीं। प्रबल इच्छा और उद्यम हो तो इच्छित वस्तु प्राप्त होकर ही रहती है।

अतः सज्जनो ! चित्त में प्रबल इच्छा रखो और उद्यम करो, परंतु किसके लिये ? नश्वर और तुच्छ संसार के लिए ? नहीं। वह तुम्हारे साथ सदा नहीं रहेगा क्योंकि संसार अनित्य है। जो स्वयं अनित्य है वह तुम्हें नित्य सुख कैसे देगा ? जैसे, साँप बाहर से तो चमकीला और कोमल दिखता है परंतु उसकी असलियत क्या होती है यह तुम जानते हो। ऐसे ही संसार भी दिखने भर को सुन्दर लगता है, इसकी असलियत जाननी हो तो विवेक दे देखो सब पता चल जायगा। इसलिए इच्छा करो मुक्तात्मा होने की, अपने-आपको खोजने की, अपने मुक्त आत्मा को जानने की और उद्यम करो नित्य सुखस्वरूप, आनंदस्वरूप, अविनाशी आत्मा को पाने के लिए।

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नाव पानी में रहे लेकिन पानी नाव में नहीं रहे |


एक बार संत कबीर जी ने एक किसान से कहाः “तुम सत्संग में आया करो।”

किसान बोलाः “हाँ महाराज ! मेरे लड़के की सगाई हो गयी है, शादी हो जाये फिर आऊँगा।”
लड़के की शादी हो गयी। कबीर जी बोलेः “अब तो आओ।”
“मेहमान आते जाते हैं। महाराज ! थोड़े दिन बाद आऊँगा।”

ऐसे दो साल बीत गये। बोलेः “अब तो आओ।”
“महाराज ! मेरी बहू है न, वह माँ बनने वाली है। मेरा छोरा बाप बनने वाला है। मैं दादा बनने वाला हूँ। घऱ में पोता आ जाय, फिर कथा में आऊँगा।”

पोता हुआ। “अब तो सत्संग में आओ।”
“अरे महाराज ! आप मेरे पीछे क्यों पड़े हैं ? दूसरे नहीं मिलते हैं क्या ?”
कबीर जी ने हाथ जोड़ लिये। कुछ वर्ष के बाद कबीरजी फिर गये, देखा कि कहाँ गया वह खेतवाला ? दुकानें भी थीं, खेत भी था। लोग बोलेः “वह तो मर गया !”
“मर गया।”
“हाँ।”

मरते-मरते वह सोच रहा था कि ‘मेरे खेत का क्या होगा, दुकान का क्या होगा ?’ कबीर जी ने ध्यान लगा के देखा कि दुकान में चूहा बना है कि खेत में बैल बना है ? देखा कि अरहट में बँधा है, बैल बन गया है। उसके पहले हल में जुता था, फिर गाड़ी में जुता। अब बूढ़ा हो गया है। कबीर जी थोड़े-थोड़े दिन में आते जाते रहे। फिर उस बूढ़े बैल को, अब काम नहीं करता इसलिए तेली के पास बेच दिया गया। तेली ने भी काम लिया फिर बेच दिया कसाई को और कसाई ने ‘बिस्मिल्लाह !’ करके छुरा फिरा दिया। चमड़ा उतार के नगाड़ेवाला को बेच दिया और टुकड़े-टुकड़े कर के मांस बेच दिया।

कबीर जी ने साखी बनायीः

कथा में तो आया नहीं, मरकर
बैल बने हल में जुते, ले गाड़ी में दीन।
(हल नहीं खींच सका तो गाड़ी, छकड़े को खींचने में लगा दिया।)
तेली के कोल्हू रहे, पुनि घर कसाई लीन।
मांस कटा बोटी बिकी, चमड़न मढ़ी नगार।
कुछ एक कर्म बाकी रहे, तिस पर पड़ती मार।।

नगारे पर डंडे पड़ रहे हैं। अभी कर्म बाकी हैंतो उसे डंडे पड़ रहे हैं। मेरा बेटा कहाँ है ? मेरी बेटी कहाँ है ?….’ डंडे पड़ेंगे फिर। ‘मेरा परमात्मा कहाँ है ? अमर आत्मा कहाँ है ? यह तो मरने वाला शरीर मर रहा है, सपने जैसा है। कई बेटे-बेटी सपना हो गये, संसार सपना हो रहा है लेकिन जो बचपन में मेरे साथ था, शादी में साथ था, बुढ़ापे में साथ है, मरने के बाद भी जो साथ नहीं छोड़ेगा वह मेरा प्रभु आत्मा कैसा है ? ॐ आनंद…. ॐ शांति…’ – ऐसा करके उस आत्मा को जाने तो मुक्त हो जाये और ‘छोरे क्या क्या होगा ? खेती का क्या होगा ?’ किया तो बैल बनो बेटा ! जाओ।

इसलिए मन को संसार में नहीं लगाना। नाव पानी में रहे लेकिन पानी नाव में नहीं रहे। शरीर संसार में रहे किंतु अपने दिमाग में संसार नहीं घुसे। अपने दिमाग में तो ‘ॐ आनन्द… ॐ शांति…. ॐ माधुर्य… संसार सपना, परमात्मा अपना….’ – ऐसा चिंतन चलता रहे। चिंतन करके निश्चिंत नारायण में विश्रान्ति पायें, निश्चिंत नारायण-व्यापक ब्रह्म में आयें।

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