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गलत अभ्यास का दुष्परिणाम


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आज संसार में कितने ही ऐसे  अभागे लोग हैं, जो शृंगार रस की पुस्तकें पढ़कर, सिनेमाओं के कुप्रभाव के शिकार होकर स्वप्नावस्था या जाग्रतावस्था में अथवा तो हस्तमैथुन द्वारा सप्ताह में कितनी बार वीर्यनाश कर लेते हैं | शरीर और मन को ऐसी आदत डालने से वीर्याशय बार-बार खाली होता रहता है |उस वीर्याशय को भरने में ही शारीरिक शक्ति का अधिकतर भाग व्यय होने लगता है, जिससे शरीर को कांतिमान् बनाने वाला ओज संचित ही नहीं हो पाता और व्यक्ति शक्तिहीन, ओजहीन और उत्साहशून्य बन जाता है | ऐसे व्यक्ति  का  वीर्य  पतला  पड़ता  जाता है | यदि वह समय पर अपने को सँभाल नहीं सके तो शीघ्र  ही वह स्थिति आ जाती है कि उसके अण्डकोश वीर्य बनाने में असमर्थ हो जाते हैं | फिर भी यदि थोड़ा बहुत वीर्य बनता है तो वह भी पानी जैसा ही बनता है जिसमें सन्तानोत्पत्ति की ताकत नहीं होती |उसका जीवन जीवन नहीं रहता | ऐसे व्यक्ति की हालत मृतक पुरुष जैसी हो जाती है | सब प्रकार के रोग उसे घेर लेते हैं | कोई दवा उस पर असर नहीं कर पाती | वह व्यक्ति जीते जी नर्क का दुःख भोगता रहता है | शास्त्रकारों ने लिखा है :

आयुस्तेजोबलं वीर्यं प्रज्ञा श्रीश्च महदयशः |

पुण्यं च प्रीतिमत्वं च हन्यतेऽब्रह्मचर्या ||

आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, यश तथा पुण्य और प्रीति ये सब ब्रह्मचर्य का पालन न करने से नष्ट हो जाते हैं |’

इसीलिए वीर्यरक्षा स्तुत्य है | ‘अथर्ववेद में कहा गया है :

अति सृष्टो अपा वृषभोऽतिसृष्टा अग्नयो दिव्या||1||

इदं तमति सृजामि तं माऽभ्यवनिक्षि ||2||

अर्थात् ‘शरीर में व्याप्त वीर्य रूपी जल को बाहर ले जाने वाले, शरीर से अलग कर देने वाले काम को मैंने परे हटा दिया है | अब मैं इस काम को अपने से सर्वथा दूर फेंकता हूँ | मैं इस आरोग्यता, बल-बुद्धिनाशक काम का कभी शिकार नहीं होऊँगा |’

और इस प्रकार के संकल्प से अपने जीवन का निर्माण न करके जो व्यक्ति वीर्यनाश करता रहता  है,उसकी क्या गति होगी, इसका भी ‘अथर्ववेद’ में उल्लेख आता है :

रुजन् परिरुजन् मृणन् परिमृणन् |

म्रोको मनोहा खनो निर्दाह आत्मदूषिस्तनूदूषिः||

यह काम रोगी बनाने वाला है, बहुत बुरी तरह रोगी करने वाला है | मृणन् यानी मार देने वाला है |परिमृणन् यानी बहुत बुरी तरह मारने वाला है |यह टेढ़ी चाल चलता है, मानसिक शक्तियों को नष्ट कर देता है | शरीर में से स्वास्थ्य, बल, आरोग्यता आदि को खोद-खोदकर बाहर फेंक देता है | शरीर की सब धातुओं को जला देता है | आत्मा को मलिन कर देता है | शरीर के वात, पित्त, कफ को दूषित करके उसे तेजोहीन बना देता है |

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