विडियो : संत श्री आशारामजी बापू के भक्तों की हर गाँव, हर शहर, हर गली में हो रही है सुप्रचार फेरी, संकीर्तन यात्रा, वाहन यात्रा, राष्ट्र जागृति यात्रा
काफी साधको को तो पता ही है की बापूजी ने सालों पहले बता दिया था की आने वाले समय मे एक भयानक कूप्रचार की आँधी चलेगी | राउंड राउंड और फिर राउंड | ऐसा आयेगा समय की सबको हिला कर रख देगा | यही वो तीसरा राउंड है | ऐसे मे हम साधको की श्रद्धा की परीक्षा हो रही है | इस घड़ी मे हम सबको अपना मनोबल ऊँचा रखना है और एक दूसरे के मनोबल को बढ़ाना है | बापू ने यह भी बोला था कि ऐसे समय मे जिस की श्रद्धा टिकी रही उसका बेड़ा पार लग जायेगा | इस आंधी के बाद ऐसा समय आने वाला है कि बापू घर घर पूजे जायेंगे |
आज तक कभी किसी अवतार के उतने मठ, मंदिर, आश्रम नहीं बने है जितने बापूजी के बनेंगे |
बापू ने खुद बोला है की यह भी नहीं रहेगा, वह भी नहीं रहेगा |
जगत सब सपना, परमात्मा है अपना |
हरि ॐ तत्सत और सब गपसप |
यह इश्वर की ही लीला है, बापू साक्षात परं ब्रह्म हैं, ब्रह्म की लीला साधारण बुद्धि से नही समझी जा सकती | इसलिये हम सब साधको को धैर्य का परिचय देना है, जितना हो सके अपना गुरु मंत्र का जप चालू रहे | इस समय अपनी छोटी से छोटी सेवा कर के ब्रह्म की लीला मे अपना योगदान दे सकते हैं | यही समय है जब पकके-पकके शिष्य रह जायेंगे और कच्चे निकल जायेंगे | यह परीक्षा का समय है और हम सब तो पक्के साधक ही हैं न ? हमारि निष्ठा बापू मे अटूट है | आप सब से यह प्रार्थना है की हो सके तो इस संदेश को ज्यादा से ज्यादा साधकों तक पहुचायें और अपने गुरु भाई बहनों से नेटवर्क बनायें रखें | और एक दूसरे का मनोबल बढ़ायें | हम सब अपने विचारो का आदान-प्रदान करे | कोई भी संदेह हो तो आश्रम में संपर्क करें या यहाँ कमेंट करके हमसे संपर्क करें |
“ ॐ जं ध्वं कुप्रचारक स्वाहा “
“ ॐ ह्रीं ॐ “
“ हरि ॐ “
“ ॐ “
अलख पुरुष की आरसी, साधु का ही देह |
लखा जो चाहे अलख को। इन्हीं में तू लख लेह ||
किसी भी देश की सच्ची संपत्ति संतजन ही होते है | ये जिस समय आविर्भूत होते हैं, उस समय के जन-समुदाय के लिए उनका जीवन ही सच्चा पथ-प्रदर्शक होता है | एक प्रसिद्ध संत तो यहाँ तक कहते हैं कि भगवान के दर्शन से भी अधिक लाभ भगवान के चरित्र सुनने से मिलता है और भगवान के चरित्र सुनने से भी ज्यादा लाभ सच्चे संतों के जीवन-चरित्र पढ़ने-सुनने से मिलता है | वस्तुतः विश्व के कल्याण के लिए जिस समय जिस धर्म की आवश्यकता होती है, उसका आदर्श उपस्थित करने के लिए भगवान ही तत्कालीन संतों के रूप में नित्य-अवतार लेकर आविर्भूत होते है | वर्तमान युग में यह दैवी कार्य जिन संतों द्वारा हो रहा है, उनमें एक लोकलाडीले संत हैं अमदावाद के श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ योगीराज पूज्यपाद संत श्री आसारामजी महाराज |
महाराजश्री इतनी ऊँचायी पर अवस्थित हैं कि शब्द उन्हें बाँध नहीं सकते | जैसे विश्वरूपदर्शन मानव-चक्षु से नहीं हो सकता, उसके लिए दिव्य-द्रष्टि चाहिये और जैसे विराट को नापने के लिये वामन का नाप बौना पड़ जाता है वैसे ही पूज्यश्री के विषय में कुछ भी लिखना मध्यान्ह्य के देदीप्यमान सूर्य को दीया दिखाने जैसा ही होगा | फ़िर भी अंतर में श्रद्धा, प्रेम व साहस जुटाकर गुह्य ब्रह्मविद्या के इन मूर्तिमंत स्वरूप की जीवन-झाँकी प्रस्तुत करने का हम एक विनम्र प्रयास कर रहे हैं |
इसी के प्रयास में पूज्य बापूजी के साधको द्वारा भव्य राष्ट्र जाग्रति हरिनाम संकीर्तनयात्रा और सत्साहित्य वितरण कार्यक्रम गुजरात के वापी क्षेत्र में दिनांक २०-८-२०१४ को निकाली गयी | प्रस्तुत है इस संकीर्तन यात्रा की प्रमुख छबियाँ |
4/८/०14 दोप . १.३० बजे नंदेसरी बड़ोदा गुजरात में भव्य राष्ट्र जाग्रति हरिनाम संकीर्तन यात्रा निकाली गई। फिर उसी दिन , ३ बजे रंड़ोली जिला बड़ोदा में भव्य हरिनाम संकीर्तन सुप्रचार यात्रा निकाली गई।


ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आशारामजी बापू की हितभरी वाणी
हमारे देश का भविष्य हमारी युवा पीढ़ी पर निर्भर है किन्तु उचित मार्गदर्शन के अभाव में वह आज गुमराह हो रही है। ब्रितानी औपनिवेशिक संस्कृति की देन वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में जीवन के नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीनता बरती गयी है। फलतः आज के विद्यार्थी का जीवन कौमार्यावस्था से ही विलासी और असंयमी हो जाता है। पाश्चात्य आचार-व्यवहार के अंधानुकरण से युवानों में जो फैशनपरस्ती, अशुद्ध आहार-विहार के सेवन की प्रवृत्ति, कुसंग, अभद्रता, चलचित्र-प्रेम आदि बढ़ रहे हैं, इससे दिनोंदि उनका पतन होता जा रहा है। वे निर्बल और कामी बनते जा रहे हैं। उनकी इस अवदशा को देखकर ऐसा लगता है कि वे संयमी जीवन की, ब्रह्मचर्य की महिमा से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। लाखों नहीं, करोड़ो-करोड़ों छात्र-छात्राएँ अज्ञानतावश अपने तन मन के मूल ऊर्जा-स्रोत का व्यर्थ में क्षय कर पूरा जीवन दीनता-हीनता-दुर्बलता में तबाह कर देते हैं और सामाजिक अपयश के भय से मन-ही-मन कष्ट झेलते रहते हैं। इससे उनका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है और सामान्य शारीरिक-मानसिक विकास भी नहीं हो पाता। इसका मूल कारण क्या है ? दुर्व्यसन तथा अनैतिक, अप्राकृतिक एवं अमर्यादित मैथुन द्वारा वीर्य की क्षति ! इससे रोगप्रतिकारक शक्ति घटती है, जीवनशक्ति का ह्रास होता है।
ब्रह्मचर्य के द्वारा ही हमारी युवा पीढ़ी अपने व्यक्तित्व का संतुलित एवं श्रेष्ठतर विकास कर सकती है। ब्रह्मचर्य के पालन से बुद्धि कुशाग्र बनती है, रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है तथा महान-से-महान लक्ष्य निर्धारित करने एवं उसे सम्पादित करने का उत्साह उभरता है, संकल्प में दृढ़ता आती है, मनोबल पुष्ट होता है। आध्यात्मिक विकास का मूल भी ब्रह्मचर्य ही है। भारत का सर्वांगीण विकास सच्चरित्र एवं संयमी युवाधन पर ही आधारित है। इसकी अवहेलना करना हमारे देश व समाज के हित में नहीं है। यौवन की सुरक्षा से ही सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण हो सकता है।
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