एक वर्ष की कड़ी मेहनत के बाद विद्यार्थियों को डेढ़ माह की छुट्टियों का समय मिलता है जिसमें कुछ करने व सोचने-समझने का अच्छा-खासा अवसर मिल जाता है। लेकिन प्रायः ऐसा देखा गया है कि विद्यार्थी इस कीमती समय को टी.वी., सिनेमा आदि देखने में तथा गन्दी व फालतू पुस्तकें पढ़ने में बरबाद कर देते हैं। जो अपने समय को बरबाद करता है उसका जीवन बरबाद हो जाता है। जो अपने समय का सदुपयोग करता है उसका जीवन आबाद हो जाता है। अतः मिली हुई योग्यता एवं मिले हुए समय का सदुपयोग उत्तम-से-उत्तम कार्यों के संपादन में करना चाहिए। बड़े धनभागी होते हैं वे विद्यार्थी जो समय का सदुपयोग कर अपने जीवन को उन्नत बना लेते हैं।
1. अपने से छोटी कक्षा वाले विद्यार्थियों को पढ़ाना चाहिए। बालकों को अच्छी-अच्छी शिक्षाप्रद कहानियाँ सुनानी चाहिए। बालकों को श्रीमदभागवत में वर्णित भक्त ध्रुव की कथा व दासीपुत्र नारद के पूर्वजन्म की कथा एवं प्रह्लाद की कथा अपने साथी-मित्रों के साथ सुनने व सुनाने से परमात्मप्राप्ति में मदद मिलती है। “सा विद्या या विमुक्तये”। असली विद्या वही है जो मुक्ति प्रदान करे।
2. अपने साथियों के साथ अपने गली-मोहल्ले में सफाई अभियान चलाना चाहिए।
3. पिछड़े हुए क्षेत्रों में जाकर वहाँ के लोगों को शिक्षा देना तथा संतों के प्रति जागरूक करना चाहिए।
4. अस्पतालों में जाकर मरीजों की सेवा करनी चाहिए। करो सेवा, मिले मेवा।
5. अपने से अधिक योग्यता व शिक्षावाले विद्यार्थियों के साथ रहकर विनोद शिक्षा सम्बंधी चर्चा करनी चाहिए।
6. अपनी दिव्य सनातन संस्कृति के विकास हेतु भरपूर प्रयास करना चाहिए।
7. प्राचीन ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों में जाकर अपने विवेक-विचार को बढ़ाना चाहिए।




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