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संकल्पशक्ति का प्रतीक : रक्षाबंधन


rakhi,raksha bandhan,ashram,asharamhji bapu,asaramji,guru,om,spiritual,hinduभारतीय संस्कृति का रक्षाबंधन महोत्सव, जो श्रावणी पूनम के दिन मनाया जाता हे, आत्मनिर्माण , आत्मविकास का पर्व हे . आज के दिन पृथ्वी ने मानो हरी साडी पहनी है | अपने हृदय को भी प्रेमाभक्ति से, सदाचार – सयंम से पूर्ण करने के लिए प्रोत्साहित करने वाला यह पर्व है |

आज रक्षाबंधन के पर्व पर बहन भाई को आयु , आरोग्य और पुष्टि की वृद्धि की भावना से राखी बाँधती है | अपना उद्देश्य ऊँचा बनाने का संकल्प लेकर ब्राह्मण लोग जनेऊ बदलते हैं , समुन्द्र का तूफानी स्वभाव श्रावणी पूनम के बाद शांत होने लगता है ,इससे जो समुंद्री व्यापार करते हैं   वे नारियल फोड़ते हैं |

रक्षाबंधनका का उत्सव  श्रावणी पूनम को ही क्यों रखा गया !  भारतीय संस्कृति में संकल्पशक्ति के सदुपयोग की सुंदर व्यवस्था हे. ब्राह्मण कोइ शुभ कार्य कराते हैं, तो कलावा ( रक्षासूत्र ) बाँधते हैं ताकि आपके शरीर में छुपे दोष या कोइ रोग , जो आपके शरीर को अस्वस्थ कर रहा हो, उनके कारण आपका मन और बुद्धि  भी निर्णय लेने में थोड़े अस्वस्थ न रह जाये |

सावन के महीने में सूर्य की किरणें धरती पर कम पड़ती हैं. जिससे किसी को दस्त, किसी को उल्टियाँ, किसीको अजीर्ण, किसीको बुखार हो जाता है तो किसीका शरीर टूटने लगता है. इसलिए रक्षाबंधन के दिन रक्षासूत्र बाँध कर  तन–मन–मति की स्वास्थ्य-रक्षा का संकल्प किया जाता है, कितना रहस्य है !

अपना शुभ संकल्प और शरीर के ढांचे की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यह श्रावणी पूनम का रक्षाबंधन महोत्सव है | आज के दिन रक्षासूत्र बांधने से वर्ष भर रोगों से हमारी रक्षा रहे,  ऐसा एक – दूसरे के प्रति सत् संकल्प करते हैं | रक्षाबंधन के दिन बहन भाई के ललाट पर तिलक – अक्षत लगाकर संकल्प करती है कि “ जेसे शिवजी त्रिलोचन हैं , ज्ञानस्वरूप हैं, वेसे ही मेरे भाई में भी विवेक बढ़े, मोक्ष के ज्ञान, मोक्ष्मय प्रेमस्वरूप ईश्वर का प्रकाश आये. मेरा भाई इस सपने जैसी दुनिया को सच्चा मानकर न उलझे , मेरा भाई साधारण चर्मचक्षुवाला न हो , दूरद्रष्टा हो| “ क्षणे रुष्ट: क्षणे तुष्ट : “ न हो , जरा – जरा बात में भडकने वाला न हो, धीर – गंभीर हो. मेरे भाई की सूझबूझ, यश , कीर्ति  और ओज – तेज अक्षुण रहें. भैया को राखी बांधी और मुहँ मीठा किया , भाई गद् गद् हो गया | बहन का शुभ संकल्प होता है और भाई का बहन के प्रति सदभाव होता है, भाई को भी बहन के लिए कुछ करना चाहिए, अभी तो चलो साडी, वस्त्र या कुछ दक्षिणा दे दी जाती है परन्तु यह रक्षाबंधन महोत्सव दक्षिणा या कोइ चीज देने से वहीँ संपन्न नहीं हो जाता. आपने बहन की शुभकामना ली है तो आप भी बहन के लिए शुभ भाव रखें कि ‘ अगर मेरी बहन के ऊपर कभी भी कोई कष्ट , विध्न – बाधा आये तो भाई के नाते बहन के कष्ट में दौड़कर पहुँच जाना मेरा कर्तव्य है ‘. बहन की धन – धान्य, इज्जत की दृष्टि से तो रक्षा करें, साथ ही बहन का चरित्र उज्जवल रहें ऐसा भाई सोचे और भाई का चरित्र उज्जवल बने ऐसा सोचकर बहने अपने मन को काम में से राम की तरफ ले जायें. इस भाई – बहन के पवित्र भाव को उजागर करके न जाने कितने लोगों ने युद्ध टाल दीये, कितनी नरसंहार की कुचेष्टाएं इस धागे ने बचा ली |

सर्वरोगोंपशमनम् सर्वा शुभ विनाशनम् I
सक्र्त्क्रते नाब्दमेकं येन रक्षा कृता भवेत्  I I

‘ इस पर्व पर धारण किया हुआ रक्षासूत्र सम्पूर्ण रोगों तथा अशुभ कार्यों का विनाशक है. इसे वर्ष में एक बार धारण करने से वर्ष भर मनुष्य रक्षित हो जाता है ,यह पर्व समाज के टूटे हुए मनो को जोड़ने का सुंदर अवसर है. इसके आगमन से कुटुंब में आपसी कलह समाप्त होने लगते हैं , दूरी मिटने लगती है, सामूहिक संकल्पशक्ति साकार होने लगती है |

श्रावणी पूनम अर्थात रक्षाबंधन महोत्सव बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है | हजार – दो हजार वर्ष , पांच हजार वर्ष , लाख – दो लाख वर्ष नहीं , करोडों वर्ष प्राचीन है यह उत्सव , देव – दानव युद्ध में वर्षों के युद्ध के बाद भी निर्णायक परिस्थितियां नहीं आ रहीं थी , तब इन्द्र ने गुरु ब्रहस्पतिजी से कहा कि ‘ युद्ध से भागने की भी स्थति नहीं है और युद्ध में डटे रहना भी मेरे बस का नहीं है. गुरुवर ! आप ही बताओ क्या करें – ‘ इतने में इन्द्र की पत्नीं शचि ने कहा : “ पतिदेव ! कल मैं आपको अपने संकल्प – सूत्र में बांधूगी .”

ब्राह्मणों के द्वारा वेदमंत्र का उच्चारण हुआ , ओंकार का गुंजन हुआ और शचि ने अपना संकल्प जोड़कर वह सूत्र इंद्र की दायीं कलाई में बांध दिया , तो इन्द्र का मनोबल , निर्णयबल , भावबल , पुण्यबल बढ़ गया , उस संकल्पबल ने ऐसा जोहर दिखाया कि इन्द्र दैत्यों को परास्त करके देवताओं को विजयी बनाने में सफल हो गये|

सब कुछ देकर त्रिभुवनपति को अपना द्धारापाल बनाने वाले बलि को लक्ष्मीजी ने राखी बांधी थी | राखी बाँधनेवाली बहन अथवा हितैषी व्यक्ति के आगे कृतज्ञता का भाव व्यक्त होता है | राजा बलि ने पूछा : “ तुम क्या चाहती हो “ लक्ष्मी जी ने कहा : “वे जो तुम्हारे नन्हें – मुन्ने द्धारापाल है , उनको आप छोड़ दो “.

भक्त के प्रेम से वश होकर जो द्धारापाल की सेवा करते हैं, ऐसे भगवान नारायण को द्धारापाल के पद से छुडाने के लिए लक्ष्मीजी ने भी रक्षाबंधन महोत्सव का उपयोग किया |

बहनें इस दिन ऐसा संकल्प करके रक्षासूत्र बांधें कि ‘ हमारे भाई भगवत्प्रेमी बनें ‘. और भाई सोचें कि हमारी बहन भी चरित्र प्रेमी , भगवत्प्रेमी बने ‘. अपनी सगी बहन व पड़ोस की बहन के लिए अथवा अपने सगे भाई व पडोसी भाई के प्रति ऐसा सोंचे . आप दूसरे के लिए भला सोचते हो तो आपका भी भला हो जाता है | संकल्प में बड़ी शक्ति है , अत: आप ऐसा संकल्प करें कि हमारा आत्मस्वभाव प्रकटे |

रक्षाबंधन (Raksha Bandhan Festival) पर बहनों द्वारा भाईयों को राखी बांधने का जितना महत्व है उतना ही राखी बांधने के तरीके का भी है।
राखी बांधते समय बहनों द्वारा भाई की कलाई पर बांधी गई राखी में तीन गांठें लगाना शुभ माना जाता है क्योंकि तीन गांठ का संबंध त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश से है।
ऐसी मान्यता है कि राखी की पहली गांठ भाई की लंबी आयु के लिए, दूसरी गांठ स्वयं की लंबी आयु के लिए, तीसरी गांठ भाई बहन के रिश्ते में मिठास लाने और सुरक्षित रखने के लिए बांधी जाती है। इस तरह भाई को बांधी गई राखी में तीन गांठ लगाना शुभता का प्रतीक होता है।
बहने अपने भाई को राखी बांधते समय इस मंत्र का जाप अवश्य करें-
                ‘‘ऊँ येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। 
                तेन त्वामभि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल‘‘
इस मंत्र का अर्थ है- जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा। हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो।
रक्षाबंधन (Raksha Bandhan Festival) पर राखी बांधते समय बहने को राखी की थाल (Rakhi ki thaal) में कुछ चीजों को शामिल करना बहुत जरूरी है। इनके बिना राखी की थाली (Rakhi ki thaal) अधूरी मानी जाती है। बहने अगर राखी की थाल में इन चीजों को शामिल कर ले तो इससे न सिर्फ उनके भाई की लंबी उम्र होती है बल्कि उन पर मां लक्ष्मी की कृपा भी बनी रहती है। आइए जाने कैसे बहनों को रक्षाबंधन की थाली तैयार करनी चाहिए-
राखी की थाली तैयार करते समय उसमे सबसे पहली और जरूरी चीजों में से सिंदूर (Rakhi ki thaal main sindoor) को जरूर शामिल करना चाहिए। सिंदूर को मां लक्ष्मी (Lord Laxmi) का प्रतीक माना जाता है इसलिए इसे अपनी थाली में जरूर शामिल करें। बहनों द्वारा भाई के माथे पर सिंदूर का तिलक लगाने से उन पर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और उनके पास पैसे की कोई कमी भी नहीं रहती।
बहनों द्वारा भाई के माथे पर चंदन का तिलक (Rakhi par Chandan ka tilak) लगाने से बहन भाई को भगवान विष्णु (Lord Vishnu) और गणेश (Lord Ganesh) का आशीर्वाद प्राप्त करवाती है। चंदन इसलिए लगाना चाहिए जिससे आपके भाई का मन शांत रहे और वह धर्म और कर्म के रास्ते से न भटके और वह न सिर्फ अपनी बहनों की रक्षा करें बल्कि बाकी स्त्रियों की भी रक्षा करें।
बहनों द्वारा भाई की कलाई पर राखी बांधने से भाई के जीवन में संपन्नता आती है। उनके जीवन में सुख और समृद्धि बनी रहती है। जिस प्रकार राजा बली रक्षासूत्र में बंध गए थे। उसी तरह भाई पर कोई आंच न आए और वह भी रक्षा सूत्र से बंधे रहें और अपने कर्तव्यों का अच्छे से पालन करें। इसी कामना के साथ बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है।
बहनों को अपनी राखी की थाली में दीपक (Rakhi ki thaali main deepak) को जरूर शामिल करना चाहिए। दीपक में अग्निदेव का वास होता है जो किसी भी धार्मिक कार्य में साक्षी के तौर पर माने जाते हैं। साथ ही अग्नि को ऊर्जा और प्राण का प्रतीक भी माना जाता है। दीपक को जलाने से नकारात्मकता विचारों का नास होता है।
हिंदू धर्म (Hindu dharm) में किसी भी धार्मिक कार्य में आरती जरूर की जाती है। ऐसे में रक्षाबंधन के त्योहार पर बहने अपनी भाई की कलाई पर राखी बांधकर अपने भाई की आरती जरूर उतारें। ऐसे करने से भाई के ऊपर से नकारात्मक प्रभाव दूर होता है।
राखी बांधने के बाद बहनें अपने भाई को मिठाई खिलाकर उनका मुंह मीठा कराती है। यह मिठाई घर पर बनी भी हो सकती है या इसे बाजार से खरीद कर भी भाई को खिलाया जा सकता हैं।
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Sadhvi Leena Bahan

साध्वी लीना बहन का सत्संग २६ सितम्बर, संत श्री आशारामजी आश्रम, पटना (बिहार)


 

साध्वी लीना बहन जी के आगामी सत्संग कार्यक्रम :- पटना (बिहार)
दिनांक :- २६ सितम्बर २०१४
स्थान :- संत श्री आशारामजी आश्रम

 

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गुरु संकल्प को साकार करनेवाली : श्रावणी पूर्णिमा


श्रावणी पूर्णिमा को राखी पूर्णिमा कहते हैं । अरक्षित चित्त को, अरक्षित जीव को सुरक्षित करने का मार्ग देनेवाली और संकल्प को साकार करानेवाली पूर्णिमा है ‘श्रावणी पूर्णिमा’। यह ब्राह्मणों के लिए जनेऊ बदलकर ब्रह्माजी और सूर्यदेव से वर्ष भर आयुष्य बढाने की प्रार्थना करनेवाली पूर्णिमा है । यह पूर्णिमा समुद्री नाविकों के लिए समुद्रदेव की पूजा करके नारियल भेंट करने और अपनी छोटी उँगली से खून की बूँद निकालकर समुद्रदेव को अर्पण करके सुरक्षा की प्रार्थना करनेवाली पूर्णिमाहै ।

इस श्रावणी पूर्णिमा के दिन सामवेद का गान और तान अर्थात् संगीत का प्राकट्य हुआ था । इस दिन सरस्वती की उपासना करनेवाले रागविद्या में निपुणता का बल पा सकते हैं । इस श्रावणी पूर्णिमा से ऋतु-परिवर्तन होता है । इस कालखण्ड में शरद ऋतु शुरू होती है । शरीर में जो पित्त इकट्ठा हुआ है, वह प्रकुपित होता है ।

गुरुपूर्णिमा गुरु संकल्प करानेवाली पूर्णिमा है । यह लघु इन्द्रियों, लघु मन और लघु विकारों में भटकते हुए जीवन में से गुरु सुख-बडा सुख, आत्मसुख, गुरुज्ञान-आत्मज्ञान की ओर ले चलती है । लघु ज्ञान से लघु जीवनों से तो यात्रा करते-करते चौरासी लाख जन्मों से यह जीव भटकता आया । तो आषाढी पूर्णिमा, गुरुपूर्णिमा के बिल्कुल बाद की जो पूर्णिमा है, वह श्रावणी पूर्णिमा है; गुरुपूर्णिमा का संकल्प साकार करने के लिए है रक्षाबंधन पर्व, नारियली पूनम, श्रावणी पूनम। गुरुपूर्णिमा का गुरु संकल्प क्रिया में लाने की यह पूर्णिमा है । उसे व्यवहार में लाने के लिए यह पूर्णिमा प्रेरणा देती है ।

अँधेरी रात में श्रवण कुमार नदी से जल लाने गये थे । राजा दशरथ समझे कि मृग आया नदी पर और शब्दभेदी बाण मारा । तो जहाँ से शब्द आ रहा था बाण वहाँ गया और मातृ-पितृभक्त श्रवण की हत्या हो गयी। राजा दशरथ ने उस हत्या के पाप से म्लानचित्त होकर उसके माँ-बाप से क्षमायाचना की और श्रवण का श्रावणी पूनम के निमित्त खूब प्रचार भी किया ।

‘रक्षाबंधन महोत्सव’ यह अति प्राचीन सांस्कृतिक महोत्सव है । बारह वर्ष तक इन्द्र और दैत्यों के बीच युद्ध चला । आपके-हमारे बारह वर्ष, उनके बारह दिन । इन्द्र थक से गये थे और दैत्य हावी हो रहे थे। इन्द्र उस युद्ध से प्राण बचाकर पलायन के कगार पर आ खडे हुए । इन्द्राणी ने इन्द्र की परेशानी सुनकर गुरु की शरण ली । गुरु बृहस्पति तनिक शांत हो गये उस सत्-चित्-आनंद स्वभाव में, जहाँ ब्रह्माजी शांत होते हैं अथवा जहाँ शांत होकर ब्रह्मज्ञानी महापुरुष सभी प्रश्नों के उत्तर ले आते हैं, सभी समस्याओं का समाधान ले आते हैं । आप भी उस आत्मदेव में शांत होने की कला सीख लो ।

गुरुजी ने ध्यान करके इन्द्राणी को कहा : ‘‘अगर तुम अपने पातिव्रत्य-बल का उपयोग करके  यह संकल्प कर कि ‘मेरे पतिदेव सुरक्षित रहें’, इन्द्र के दायें हाथ में एक धागा बाँध दोगी तो इन्द्र हारी बाजी जीत लेंगे ।” गुरु की आज्ञा… ! महर्षि वसिष्ठजी कहते हैं : ‘‘हे रामजी ! त्रिभुवन में ऐसा कौन है जो संत की आज्ञा का उल्लंघन करके सुखी रह सके ?” और ऐसा त्रिभुवन में कौन है कि गुरु की आज्ञा पालने के बाद उसके पास दुःख टिक सके । मैंने गुरु की आज्ञा मानी तो मेरे पास किसी भी प्रकार का कोई दुःख भेजकर देखो, नहीं टिकता है । एक-दो नहीं, कितने-कितने आदमियों ने कुप्रचार करके दुःख भेजकर देखा, यहाँ टिकता ही नहीं क्योंकि मैंने गुरु की आज्ञा मान रखी है। आप भी गुरु की आज्ञा मानकर लघु कल्पनाओं से बाहर आइये, लघु शरीर के अहं से बाहर आइये, लघु मान्यताओं से बाहर आइये । इन्द्र विजयी हुए, इन्द्राणी का संकल्प साकार हुआ ।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वां अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ।।

जिस पतले रक्षासूत्र ने महाशक्तिशाली असुरराज बलि को बाँध दिया, उसीसे मैं आपको बाँधती हूँ । आपकी रक्षा हो । यह धागा टूटे नहीं और आपकी रक्षा सुरक्षित रहे । – यही संकल्प बहन भाई को राखी बाँधते समय करे ।
शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय ‘अभिबध्नामि’ के स्थान पर ‘रक्षबध्नामि’ कहे ।

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