Jail, Satsang

Sant Asharamji Bapu’s Satsang in Jail


Satsang_in_jail

ये असमाजिक तत्त्व अपने विभिन्न षड्यंत्रों द्वारा
संतों व महापुरुषों के भक्तों व सेवकों को भी गुमराह करने कुचेष्टा करते हैं।

समझदार साधक या भक्त तो उनके षड्यन्त्रजाल में नहीं फँसते,
महापुरुषों के दिव्य जीवन के प्रतिफल से परिलक्षित उनके सच्चे अनुयायी कभी भटकते नहीं, पथ से विचलित होते नहीं अपितु और अधिक श्रद्धायुक्त हो उनके दैवी कार्यों में अत्यधिक सक्रिय व गतिशील होकर सदभागी हो जाते हैं लेकिन
जिन्होंने साधना के पथ पर अभी अभी कदम रखे हैं
ऐसे कुछ नवपथिक गुमराह हो जाते हैं
और
इसके साथ ही आरम्भ हो जाता है नैतिक पतन का दौर, जो संतविरोधियों की शांति
और
पुण्यों समूल नष्ट कर देता है।

इन्सान भी बड़ा ही अजीब किस्म का व्यापारी है।
जब चीज हाथ से निकल जाती है तब वह उसकी कीमत पहचानता है।
जब महापुरुष शरीर छोड़कर चले जाते हैं,
तब उनकी महानता का पता लगने पर वह पछताते हुए रोते रह जाता है
और उनके चित्रों का आदर करने लगता है।
लेकिन उनके जीवित सान्निध्य में उनका सत्संग-ज्ञान पचाये तो बात ही कुछ और हो जाये ।

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