ऋषि दर्शन

Rishi Darshan Highlights January 2015


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क्या आपको पता है 2015 जनवरी माह की ऋषि दर्शन है बहुत ही खास ?
आखिर क्यों है यह इतनी खास ?
आखिर क्या है इस अंक में ?
आइये देख ही लेते है की क्या – क्या है इस अंक में …..
आप भी देखें व Share करने से न चूकें ।
 
“ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन की सेवा गुरुसेवा, समाज सेवा, राष्ट्र सेवा, 
संस्कृति सेवा, विश्व सेवा, अपनी और अपने कुल की भी सेवा है |” – पूज्य बापूजी 
 
 
“ऋषि प्रसाद एवं ऋषि दर्शन का दैवीकार्य सेवा, पूजा और साधना है |” _
                                                                                   पूज्य बापूजी
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स्वास्थय की कुंजियाँ

DAILY ROUTINE


DAILY ROUTINE

HARIOM

DAILY ROUTINE

Sant Shri Asharamji Bapu Satsang Rajim Kumbh Chhattisgarh 28th Feb 2013 (Evening)

Param Pujya Sant Shri Asharamji, endearingly called ‘Bapu’, is a Self-Realized Saint from India. Pujya Bapuji preaches the existence of Param Pujya Sant Shri Asharamji BapuOne Supreme Conscious in every human being; be it Hindu, Muslim, Christian, Sikh or anyone else.
Bapuji represents a Confluence of Bhakti Yoga, Gyan Yoga & Karma Yoga.

परम पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू की अमृतवाणी

सत्संग के मुख्य अंश :

* जिस समय जीवनी शक्ति जिस अंग में ज्यादा हो उस समय उस अंग से काम लेने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है |
* सुबह ३ से ५ के बीच प्राणायाम हो जाना चाहिये |
* ५ से ७ के बीच घूमना, टहलना और जरूरी शौच का काम हो जाना चाहिये |
* ७ से ९ के बीच कुछ पी लें – दूध, जल्दी पचेगा |
* ९ से ११ के बीच भोजन कर लें |
* ११ से १ के बीच हृदय विकसित होता है, खाना नही खाना चाहिये |
* १ से ३ के बीच खाना नही खाए, पचे हुए खाने का रस शोषित किया जाता है |
* ३ से ५ के बीच पानी पी लें, मूत्राशय में जीवनी शक्ति होती है |
* पत्थरी का ऑपरेशन नहियो कराये | पत्थर चट पौधे के २ पत्ते धो के चबाके खा लें कुछ दिन | पत्थरी खत्म |
* किडनी और कान के रोग ठीक करने हों तो ५ से ७ के बीच भोजन क्र लें |
* ९, ९.१५ थोडा दूध ले सकते हैं अगर लेना चाहें तो |
* ७ से ९ के बीच पढ़े |
* ९-११ मेरु रजु में जीवनी शक्ति, यदि आराम करें तो – सीधे या करवट लेकर सोना चाहिए, विश्राम अच्छा |
* ११-१ के बीच जीवनी शक्ति पित्ताशय में, जागने से पित्त सबंधी रोग, नेत्र सम्बन्धी रोग और हार्ट अटेक |
* १ से ३ के बीच लीवर में जीवनी शक्ति |
* पीलिया हों तो १ चुटकी कच्चे चावल फाँके | ॐ खं (खम) ये मन्त्र जपे |

Bapuji represents a Confluence of Bhakti Yoga, Gyan Yoga & Karma Yoga.

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स्वास्थय की कुंजियाँ

Importance Of Waking Up In Brahma Muhurta


Importance Of  Waking Up In Brahma Muhurta

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Indian Scriptures says to wake up early in the morning(at Bramhamuhurat: 1-1.5 hrs before sun rise).
Bapuji describes the Importance Of Waking Up In Bhram Muhurat

प्रातः जागरण

सूर्योदय के समय और दिन में सोने से आयु क्षीण होती है। प्रतिदिन सूर्योदय से एक घंटा पहले जागकर मनुष्य धर्म और अर्थ के विषय में विचार करे। सूर्योदय तक कभी न सोये। यदि किसी दिन ऐसा हो जाये तो प्रायश्चित करे, गायत्री मंत्र का जप करे, उपवास करे या फलादि पर ही रहे। (महाभारत, अनुशासन पर्व)

सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीना स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।

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पर्व

कैसे मनी गुरु पूर्णिमा इस वर्ष ?


How Guru Purnima Celebrated this year ?

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एक बार बुद्ध के चरणों में एक अपरिचित युवक आ गिरा और दंडवत् प्रणाम करने लगा।

            बुद्धः “अरे अरे, यह क्या कर रहे हो ? तुम क्या चाहते हो? मैं तो तुम्हें जानता तक नहीं।”

            युवकः “भन्ते! खडे़ रहकर तो बहुत देख चुका। आज तक अपने पैरों पर खडा़ होता रहा इसलिये अहंकार भी साथ में खडा़ ही रहा और सिवाय दुःख के कुछ नहीं मिला। अतः आज मैं आपके श्रीचरणों में लेटकर विश्रांति पाना चाहता हूँ।”

            अपने भिक्षुकों की ओर देखकर बुद्ध बोलेः “तुम सब रोज मुझे गुरु मानकर प्रणाम करते हो लेकिन कोई अपना अहं न मिटा पाया और यह अनजान युवक आज पहली बार आते ही एक संत के नाते मेरे सामने झुकते-झुकते अपने अहं को मिटाते हुए,बाहर की आकृति का अवलंबन लेते हुए अंदर निराकार की शान्ति में डूब रहा है।”

            इस घटना का यही आशय समझना है कि सच्चे संतों की शरण में जाकर साधक को अपना अहंकार विसर्जित कर देना चाहिये। ऐसा नहीं कि रास्ते जाते जहाँ-तहाँ आप लंबे लेट जायें।

अमानमत्सरो दक्षो….

साधक को चाहिये कि वह अपने कार्य में दक्ष हो। अपना कार्य क्या है? अपना कार्य है कि प्रकृति के गुण-दोष से बचकर आत्मा में जगना और इस कार्य में दक्ष रहना अर्थात डटे रहना, लगे रहना। उस निमित्त जो भी सेवाकार्य करना पडे़ उसमें दक्ष रहो। लापरवाही, उपेक्षा या बेवकूफी से कार्य में विफल नहीं होना चाहिये, दक्ष रहना चाहिये। जैसे, ग्राहक कितना भी दाम कम करने को कहे, फिर भी लोभी व्यापारी दलील करते हुए अधिक-से-अधिक मुनाफा कमाने की कोशिश करता है, ऐसे ही ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में चलते हुए कितनी ही प्रतिकूल परिस्थितियाँ आ जायें, फिर भी साधक को अपने परम लक्ष्य में डटे रहना चाहिये। सुख आये या दुःख, मान हो या अपमान, सबको देखते जाओ…. मन से विचारों को, प्राणों की गति को देखने की कला में दक्ष हो जाओ।

            नौकरी कर रहे हो तो उसमें पूरे उत्साह से लग जाओ, विद्यार्थी हो तो उमंग के साथ पढो़, लेकिन व्यावहारिक दक्षता के साथ-साथ आध्यात्मिक दक्षता भी जीवन में होनी चाहिए। साधक को सदैव आत्मज्ञान की ओर आगे बढना चाहिए। कार्यों को इतना नही बढाना चाहिये कि आत्मचिंतन का समय ही न मिले। सम्बंधोम् को इतना नहीं बढाना चाहिए कि जिसकी सत्ता से सम्बंध जोडे जाते हैं उसी का पता न चले।

            एकनाथ जी महाराज ने कहा हैः ‘रात्रि के पहले प्रहर और आखिरी प्रहर में आत्मचिंतन करना चाहिये। कार्य के प्रारंभ में और अंत में आत्मविचार करना चाहिये।’ जीवन में इच्छा उठी और पूरी हो जाय तब जो अपने-आपसे ही प्रश्न करे किः ‘आखिरइच्छापूर्ति से क्या मिलता है?’ वह है दक्ष। ऐसा करने से वह इच्छानिवृत्ति के उच्च सिंहासन पर आसीन होनेवाले दक्ष महापुरुष की नाईं निर्वासनिक नारायण में प्रतिष्ठित हो जायेगा।

            अगला सदगुण है। ममतारहित होना। देह में अहंता और देह के सम्बंधियों में ममता रखता है, उतना ही उसके परिवार वाले उसको दुःख के दिन दिखा देते हैं। अतः साधक को देह और देह के सम्बंधों से ममतारहित बनना चाहिये।

            आगे बात आती है- गुरु में दृढ़ प्रीति करने की। मनुष्य क्या करता है? वास्तविक प्रेमरस को समझे बिना संसार के नश्वर पदार्थों में प्रेम का रस चखने जाता है और अंत में हताशा, निराशा तथा पश्चाताप की खाई में गिर पडता है। इतने से भी छुटकारा नहीं मिलता। चौरासी लाख जन्मों की यातनाएँ सहने के लिये उसे बाध्य होना पडता है। शुद्ध प्रेम तो उसे कहते हैं जो भगवान और गुरु से किया जाता है। उनमें दृढ प्रीति करने वाला साधक आध्यात्मिकता के शिखर पर शीघ्र ही पहुँच जाता है। जितना अधिक प्रेम, उतना अधिक समर्पण और जितना अधिक समर्पण, उतना ही अधिक लाभ।

कबीर जी ने कहा हैः

 

प्रेम न खेतों उपजे, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो, शीश दिये ले जाये॥

 

            शरीर की आसक्ति और अहंता जितनी मिटती जाती है, उतना ही स्वभाव प्रेमपूर्ण बनता जाता है। इसीलिए छोटा-सा बच्चा, जो निर्दोष होता है, हमें बहुत प्यारा लगता है क्योंकि उसमें देहासक्ति नहीं होती। अतः शरीर की अहंता और आसक्ति नहीं होती। अतः शरीर की अहंता और आसक्ति छोड़कर गुरु में, प्रभु में दृढ़ प्रीति करने से अंतःकरण शुद्ध होता है। ‘विचारसागर’ ग्रन्थ में भी आता हैः ‘गुरु में दृढ़ प्रीति करने से मन का मैल तो दूर होता ही है, साथ ही उनका उपदेश भी शीघ्र असर करने लगता है,जिससे मनुष्य की अविद्या और अज्ञान भी शीघ्र नष्ट हो जाता है।’

            इस प्रकार गुरु में जितनी-जितनी निष्ठा बढ़ती जाती है, जितना-जितना सत्संग पचता जाता है, उतना-उतना ही चित्त निर्मल व निश्चिंत होता जाता है।

            इस प्रकार परमार्थ पाने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है, जीवन में पवित्रता, सात्विक्ता, सच्चाई आदि गुण प्रकट होते जाते हैं और साधक ईर्ष्यारहित हो जाता है।

            जिस साधक का जीवन सत्य से युक्त, मान, मत्सर, ममता और ईर्ष्या से रहित होता है, जो गुरु में दृढ़ प्रीतिवाला, कार्य में दक्ष तथा निश्चल चित्त होता है, परमार्थ का जिज्ञासु होता है – ऐसा नौ-गुणों से सुसज्ज साधक शीघ्र ही गुरुकृपा का अधिकारी होकर जीवन्मुक्ति के विलक्षण आनन्द का अनुभव कर लेता है अर्थात परमात्म-साक्षात्कार कर लेता है।

 

 

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पर्व

रक्षा बंधन सन्देश


रक्षा बंधन सन्देश 

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गुरु संकल्प को साकार करनेवाली : श्रावणी पूर्णिमा
– पूज्य बापूजी

श्रावणी पूर्णिमा को राखी पूर्णिमा कहते हैं । अरक्षित चित्त को, अरक्षित जीव को सुरक्षित करने का मार्ग देनेवाली और संकल्प को साकार करानेवाली पूर्णिमा है ‘श्रावणी पूर्णिमा’। यह ब्राह्मणों के लिए जनेऊ बदलकर ब्रह्माजी और सूर्यदेव से वर्ष भर आयुष्य बढाने की प्रार्थना करनेवाली पूर्णिमा है । यह पूर्णिमा समुद्री नाविकों के लिए समुद्रदेव की पूजा करके नारियल भेंट करने और अपनी छोटी उँगली से खून की बूँद निकालकर समुद्रदेव को अर्पण करके सुरक्षा की प्रार्थना करनेवाली पूर्णिमाहै ।

इस श्रावणी पूर्णिमा के दिन सामवेद का गान और तान अर्थात् संगीत का प्राकट्य हुआ था । इस दिन सरस्वती की उपासना करनेवाले रागविद्या में निपुणता का बल पा सकते हैं । इस श्रावणी पूर्णिमा से ऋतु-परिवर्तन होता है । इस कालखण्ड में शरद ऋतु शुरू होती है । शरीर में जो पित्त इकट्ठा हुआ है, वह प्रकुपित होता है ।

गुरुपूर्णिमा गुरु संकल्प करानेवाली पूर्णिमा है । यह लघु इन्द्रियों, लघु मन और लघु विकारों में भटकते हुए जीवन में से गुरु सुख-बडा सुख, आत्मसुख, गुरुज्ञान-आत्मज्ञान की ओर ले चलती है । लघु ज्ञान से लघु जीवनों से तो यात्रा करते-करते चौरासी लाख जन्मों से यह जीव भटकता आया । तो आषाढी पूर्णिमा, गुरुपूर्णिमा के बिल्कुल बाद की जो पूर्णिमा है, वह श्रावणी पूर्णिमा है; गुरुपूर्णिमा का संकल्प साकार करने के लिए है रक्षाबंधन पर्व, नारियली पूनम, श्रावणी पूनम। गुरुपूर्णिमा का गुरु संकल्प क्रिया में लाने की यह पूर्णिमा है । उसे व्यवहार में लाने के लिए यह पूर्णिमा प्रेरणा देती है ।

अँधेरी रात में श्रवण कुमार नदी से जल लाने गये थे । राजा दशरथ समझे कि मृग आया नदी पर और शब्दभेदी बाण मारा । तो जहाँ से शब्द आ रहा था बाण वहाँ गया और मातृ-पितृभक्त श्रवण की हत्या हो गयी। राजा दशरथ ने उस हत्या के पाप से म्लानचित्त होकर उसके माँ-बाप से क्षमायाचना की और श्रवण का श्रावणी पूनम के निमित्त खूब प्रचार भी किया ।

‘रक्षाबंधन महोत्सव’ यह अति प्राचीन सांस्कृतिक महोत्सव है । बारह वर्ष तक इन्द्र और दैत्यों के बीच युद्ध चला । आपके-हमारे बारह वर्ष, उनके बारह दिन । इन्द्र थक से गये थे और दैत्य हावी हो रहे थे। इन्द्र उस युद्ध से प्राण बचाकर पलायन के कगार पर आ खडे हुए । इन्द्राणी ने इन्द्र की परेशानी सुनकर गुरु की शरण ली । गुरु बृहस्पति तनिक शांत हो गये उस सत्-चित्-आनंद स्वभाव में, जहाँ ब्रह्माजी शांत होते हैं अथवा जहाँ शांत होकर ब्रह्मज्ञानी महापुरुष सभी प्रश्नों के उत्तर ले आते हैं, सभी समस्याओं का समाधान ले आते हैं । आप भी उस आत्मदेव में शांत होने की कला सीख लो ।

गुरुजी ने ध्यान करके इन्द्राणी को कहा : ‘‘अगर तुम अपने पातिव्रत्य-बल का उपयोग करके  यह संकल्प कर कि ‘मेरे पतिदेव सुरक्षित रहें’, इन्द्र के दायें हाथ में एक धागा बाँध दोगी तो इन्द्र हारी बाजी जीत लेंगे ।” गुरु की आज्ञा… ! महर्षि वसिष्ठजी कहते हैं : ‘‘हे रामजी ! त्रिभुवन में ऐसा कौन है जो संत की आज्ञा का उल्लंघन करके सुखी रह सके ?” और ऐसा त्रिभुवन में कौन है कि गुरु की आज्ञा पालने के बाद उसके पास दुःख टिक सके । मैंने गुरु की आज्ञा मानी तो मेरे पास किसी भी प्रकार का कोई दुःख भेजकर देखो, नहीं टिकता है । एक-दो नहीं, कितने-कितने आदमियों ने कुप्रचार करके दुःख भेजकर देखा, यहाँ टिकता ही नहीं क्योंकि मैंने गुरु की आज्ञा मान रखी है। आप भी गुरु की आज्ञा मानकर लघु कल्पनाओं से बाहर आइये, लघु शरीर के अहं से बाहर आइये, लघु मान्यताओं से बाहर आइये । इन्द्र विजयी हुए, इन्द्राणी का संकल्प साकार हुआ ।

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वां अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ।।

जिस पतले रक्षासूत्र ने महाशक्तिशाली असुरराज बलि को बाँध दिया, उसीसे मैं आपको बाँधती हूँ । आपकी रक्षा हो । यह धागा टूटे नहीं और आपकी रक्षा सुरक्षित रहे । – यही संकल्प बहन भाई को राखी बाँधते समय करे ।     
शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय ‘अभिबध्नामि’ के स्थान पर ‘रक्षबध्नामि’ कहे ।

 

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