यूँ तो ब्रह्माण्ड में अनेको मंत्र गुंजायमान होते हैं पर सच्चा और सार्थक मंत्र वही जो फलीभूत होता है गुरुमुख से मिलने पर और ध्यान, नियम-संयम के साथ जप करने के पश्चात | धर्म और शास्त्र की किताबों में मंत्र तो आपको खूब खूब मिल जायेंगे, पर जब तक उस मंत्र का सही ज्ञान नहीं होगा, उस मंत्र के अर्थ में प्रीती नहीं होगी, तब तक पूरी लगन से उसका जप न हो पायेगा | वैसे भी आप इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि जिस बात का या काम का सही मतलब और अर्थ पता हो, उसी को करने में मन लगता है, ठीक उसी प्रकार से जब व्यक्ति को अपने मंत्र का सही अर्थ मालूम होगा, तभी वो उसमे प्रीती कर पायेगा | संत-महात्माओं का इस विषय पर क्या कथन है, आइये जानते हैं और अपने आप को मंत्र के अर्थ में डुबाकर उसमें प्रीती उत्पन्न करते हैं |
गुरुदेव के अनुसार अर्थ प्रेमस्वरुप ही है | बार-बार जपे, बार–बार अर्थ में गोते मारे तो प्रीति बढती है | अंतरात्मा की आवाज सुननी चाहिये, पर कैसे पता चले कि, ये आत्मा की आवाज है या मन की आवाज है ? इसको जानने का भी एक सरक उपाय है |
यदि आत्मा की आवाज होगी तो निर्वासनिक होगी और मन की आवाज होगी तो सवासनिक होगी |
उदाहरण के तौर पर :
अनुष्ठान किया और लड़का लौट के आया, “गुरूजी ! गुरूजी !! अंतरात्मा की आवाज है कि बेटा शादी कर ले |” गुरूजी ने कहा कि ये अंतरात्मा की आवाज नहीं है; ये तेरे काम-विकार की, वासना की आवाज है| मन को बोलती है कि भगवान ने बोला है | अगर किसी के प्रति बोलते कि ये ऐसा ही होगा तो क्या हमारे मन में तटस्थता है कि द्वेष है ? अगर द्वेष है तो फिर उसका घाटा होने वाला हो चाहे न होने वाला, हमको लगेगा कि इसको ऐसा होगा | चुनाव के दिनों में जिन नेताओं के प्रति नफरत थी तो बोले वो हार जाएगा और देवयोग से वो हारा तो बोले देखा, मैं बोल रहा था ना … हार गया | लेकिन ऐसे कई है जिनके लिए हार जाय.. वो जीते है और जिनके लिए जीतेंगे अंतरात्मा के आवाज सुनकर… सट्टा भी लगाये वो हार गये | तो ये अंतरात्मा की आवाज नहीं है अपनी मन की मलिनता, वासना, बेवकूफी होती है |तो फिर अब अंतरात्मा की आवाज क्या होती है ? सदैव याद रखो कि ज्यों-ज्यों आप निष्पक्ष हो जाओगे , अंत:करण शांत, स्वस्थ हो जायेगा त्यों-त्यों आत्मा की आवाज होगी और आप उसे पहचानने लग जायेंगे |


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