संत वाणी

कुत्ते से भी नीच कौन ?


 

वशिष्ठ जी बोले हे रामजी ! सबसे नीच कुत्ता है,क्योकि जो कोई उसके निकट जाता है उसको काट लेता है ,वो घर-घर में भटकता है और मलिन स्थानो में जाता है,वैसे ही अज्ञानी जीव श्रेष्ठ पुरुषो की निंदा करता है और

मन में तृष्णा रखता है ……

part-1

part-2

 

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मंत्र - अनुष्ठान

मौन मंदिरों में साधक करते हैं, मंत्र – अनुष्ठान !


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पिरामिड (ब्रह्माण्डीय ऊर्जा)

 

हमारे ऋषियों ने ब्रह्माण्ड के तत्वों का सूक्ष्म अध्ययन करके उनसे लाभ लेने के लिए अनेक प्रयोग किये। सनातन धर्म के मंदिरों की छत पर बनी त्रिकोणीय आकृति उन्हीं प्रयोगों में से एक है। जिसे वास्तुशास्त्र एवं वैज्ञानिक भाषा में पिरामिड कहते हैं। यह आकृति अपने-आप में अदभुत है।

पिरामिड चार त्रिकोणों से बना होता है। ज्यामितिशास्त्र के अनुसार त्रिकोण एक स्थिर आकार है। अतः पिरामिड स्थिरता का प्रदाता है। पिरामिड के अंदर बैठकर किया गया शुभ संकल्प दृढ़ होता है। कई प्रयोगों से यह देखा गया कि किसी बुरी आदत का शिकार व्यक्ति यदि पिरामिड में बैठकर उसे छोड़ने का संकल्प करे तो वह अपने संकल्प में सामान्य अवस्था की अपेक्षा कई गुना अधिक दृढ़ रहता है और उसकी बुरी आदत छूट जाती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पिरामिड में कोई भी दूषित, खराब या बाधक तत्त्व नहीं टिकते हैं। अपनी विशेष आकृति के कारण यह केवल सात्त्विक ऊर्जा का ही संचय करता है। इसीलिए थोड़े दिनों तक पिरामिड में रहने वाले व्यक्ति के दुर्गुण भी दूर भाग जाते हैं।

पिरामिड में किसी भी पदार्थ के मूल कण नष्ट नहीं होते इसलिए इसमें रखे हुए पदार्थ सड़ते-गलते नहीं हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है मिस्र के पिरामिडों में हजारों वर्ष पहले रखे गये शव, जो आज भी सुरक्षित हैं।

mandir,shikhar,मंदिर,शिखरमिस्र के पिरामिड मृत शरीर को नष्ट होने से बचाने के लिए बनाये गये हैं। इनकी वर्गाकार आकृति पृथ्वी तत्त्व का ही गुण संग्रह करती है जबकि मंदिरों के शिखर पर बने पिरामिड वर्गाकार के साथ-साथ तिकोने व गोलाकार आकृति के होने से पंच महाभूतों को सक्रिय करने के लिए बनाये गये हैं। इस प्रकार के सक्रिय (ऊर्जामय) वातावरण में भक्तों की भक्ति, क्रिया तथा ऊर्जाशक्ति का विकास होता है।

पिरामिड ब्रह्माण्डीय ऊर्जा जिसे विज्ञान कॉस्मिक एनर्जी कहता है, उसे अवशोषित करता है। ब्रह्माण्ड स्वयं ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का स्रोत है तथा पिरामिड अपनी अदभुत आकृति के द्वारा इस ऊर्जा को आकर्षित कर अपने अंदर के क्षेत्र में घनीभूत करता है। यह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा पिरामिड के शिखरवाले नुकीले भाग पर आकर्षित होकर फिर धीरे-धीरे इसकी चारों भुजाओं से पृथ्वी पर उतरती है। यह क्रिया सतत चलती रहती है तथा इसका अद्वितीय लाभ इसके भीतर बैठे व्यक्ति या रखे हुए पदार्थ को मिलता है।

दक्षिण भारते के मंदिरों के सामने अथवा चारों कोनों में पिरामिड आकृति के गोपुर इसी उद्देश्य से बनाये गये हैं। ये गोपुर एवं शिखर इस प्रकार से बनाये गये हैं ताकि मंदिर में आने-जाने वाले भक्तों के चारों ओर ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का विशाल एवं प्राकृतिक आवरण तैयार हो जाय।

https://i0.wp.com/www.womansworld.in/wp-content/uploads/2013/12/meditation-1.jpgअपनी विशेष आकृति से पाँचों तत्त्वों को सक्रिय करने के कारण पिरामिड शरीर को पृथ्वी तत्त्व के साथ, मन को वायु तथा बुद्धि को आकाश-तत्त्व के साथ एकरूप होने के लिए आवश्यक वातावरण तैयार रहता है।

पिरामिड किसी भी पदार्थ की सुषुप्त शक्ति को पुनः सक्रिय करने की क्षमता रखता है। फलतः यह शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू के दिशा-निर्देशन में उनके कई आश्रमों में साधना के लिए पिरामिड बनाये गये हैं। मंत्रजप, प्राणायाम एवं ध्यान के द्वारा साधक के शरीर में एक प्रकार की विशेष सात्त्विक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा उसके शरीर के विभिन्न भागों से वायुमण्डल में चली जाती है परंतु पिरामिड ऊर्जा का संचय करता है। अपने भीतर की ऊर्जा को बाहर नहीं जाने देता तथा ब्रह्माण्ड की सात्त्विक ऊर्जा को आकर्षित करता है। फलतः साधक पूरे समय सात्त्विक ऊर्जा के बीच रहता है।

आश्रम में बने पिरामिडों में साधक एक सप्ताह के लिए अंदर ही रहता है। उसका खाना पीना अंदर ही पहुँचाने की व्यवस्था है। इस एक सप्ताह में पिरामिड के अंदर बैठे साधक को अनेक दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। यदि उस साधक की पिरामिड में बैठने से पहले तथा पिरामिड से बाहर निकलने के बाद की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो पिरामिड के प्रभाव को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

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पिरामिड द्वारा उत्पन्न ऊर्जा शरीर की नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में बदल देती है जिसके कारण कई रोग भी ठीक हो जाते हैं। व्यक्ति के व्यवहार को परिवर्तित करने में भी यह प्रक्रिया चमत्कारिक साबित हुई है। विशेषज्ञों ने तो परीक्षण के द्वारा यहाँ तक कह दिया कि पिरामिड के अंदर कुछ दिन तक रहने पर मांसाहारी पशु भी शाकाहारी बन सकता है।

इस प्रकार पिरामिड की सात्त्विक ऊर्जा का यदि साधना व आदर्श जीवन के निर्माण हेतु प्रयोग किया जाय तो आशातीत लाभ हो सकते हैं। हमारे ऋषियों का मंदिरों की छतों पर पिरामिड शिखर बनाने का यही हेतु रहा है। हमें उनकी इस अनमोल देन का यथावत् लाभ उठाना चाहिए।

अधिकांश लोग यही समझते हैं किं पिरामिड मिस्र की देन है परंतु यह सरासर गलत है। पिरामिड के बारे में हमारे ऋषियों ने मिस्र के लोगों से भी सूक्ष्म एवं गहन खोजें की हैं। मिस्र के लोगों ने पिरामिड को मात्र मृत शरीरों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया जबकि हमारे ऋषियों ने इसे जीवित मानव की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए बनाया है।

भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है तथा भारत के अति प्राचीन शिल्पग्रंधों एवं शिवस्वरोदय जैसे धार्मिक ग्रंथों में भी पिरामिड की जानकारी मिलती है। अतः यह सिद्ध होता है कि पिरामिड मृत चमड़े की सुरक्षा करने वाले मिस्रवासियों की नहीं अपितु जीवात्मा एवं परमात्मा के एकत्व का विज्ञान जानने वाले भारतीय ऋषियों की देन है।

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संत वाणी

वास्तविक उद्देश्य क्या है ?


                                   वास्तविक उद्देश्य क्या है ?

जो चैतन्य सबके रोम-रोम में बस रहा है वह राम…… जो चैतन्य सबको आकर्षित कर रहा है वह कृष्ण…. उस चैतन्य में अगर मन लग जाये तो बेड़ा पार है। जहाँ से हमारी संवित उठती है वही सारे विश्व का आधार है। वही तुम्हारा अन्तर्यामी आत्मा तुम्हारे अति निकट है और सदा रहता है। पत्नी का साथ छोड़ना पड़ेगा, पति का साथ छोड़ना पड़ेगा, साहब का साथ छोड़ना पड़ेगा, अरे लाला ! इस शरीर का भी साथ छोड़ना पड़ेगा लेकिन उस अन्तर्यामी साथी का साथ कभी नहीं छोड़ना पड़ेगा। बस, अभी से उसी में आ जाना है, और क्या करना है ? यह कोई बड़ा काम है ? जिसका कभी साथ नहीं छूटता है उसमें राग करना है। जिसका साथ टिकता नहीं है उससे राग हटा देना है।
साथ टिकेगा नहीं उस चीज से अपना राग हटा लेंगे तो तुम स्वतन्त्र हो जाओगे। अगर साथ न टिकने वाली चीजों में राग रहा तो कितना दुःख होगा ! दुःख ही होगा, और क्या होगा ?
हम उसी से सम्बन्ध जोड़ रहे हैं जिससे आखिर तोड़ना है। जिससे सम्बन्ध तोड़ना है उसके साथ तो प्रारब्धवेग से सम्बन्ध होता रहेगा, आता रहेगा, जाता रहेगा….. लेकिन जिससे सम्बन्ध कभी नहीं टूटता उसकी केवल स्मृति रखनी है, सम्बन्ध जोड़ने का परिश्रम भी नहीं करना है। दुनिया के अन्य तमाम सम्बन्धों को जोड़ने के लिए मेहनत करनी पड़ती है।
कलेक्टर की कुर्सी के लिए सम्बन्ध जोड़ना है तो बचपन से पढ़ाई करते-करते…. मजदूरी करते-करते…. परीक्षाओं में पास होते-होते आखिर आई.ए.एस. हो गये। फिर कलेक्टर पद पर नियुक्ति हुई तब कुर्सी से सम्बन्ध जुड़ा। कभी एक जिले में तो कभी दूसरे जिले में बदली होती रही….. आखिर बुढ़ापे में साहब बेचारा देखता ही रह जाता है। जवानी में तो हुकूमत चलाई लेकिन अब छोरे कहना नहीं मानते। इससे तो हे भगवान ! मर जाएँ तो अच्छा।
अरे ! तू मरने के लिए जन्मा था कि मुक्त होने के लिए जन्मा था ?
तुम पैदा हुए थे मुक्त होने के लिए। तुम पैदा हुए थे अमर आत्मेदव को पाने के लिए।
“पढ़ते क्यों हो ?”
“पास होने के लिए।”
“पास क्यों होना है ?!”
“प्रमाणपत्र पाने के लिए।”
“प्रमाणपत्र क्यों चाहिए ?”
“नौकरी के लिए।”
“नौकरी क्यों चाहिए ?”
“पैसे कमाने के लिए।”
“पैसे क्यों चाहते हो ?”
“खाने के लिए।”
“खाने क्यों चाहते हो ?”
“जीने के लिए।”
“जीना क्यों चाहते हो ?”
“…………….”
कोई जवाब नही। कोई ज्यादा चतुर होगा तो बोलेगाः “मरने के लिए।” अगर मरना ही है तो केवल एक छोटी सी सुई भी काफी है। मरने के लिए इतनी सारी मजदूरी करने की आवश्यकता नहीं है। वास्तव में हर जीव की मेहनत है स्वतन्त्रता के लिए, शाश्वतता के लिए, मुक्ति के लिए। मुक्ति तब मिलती है जब जीव रागरहित होता है।

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भजन

लाखो दरबार दुनिया में यू तो


                             लाखो दरबार दुनिया में यू तो 

hami se hai jaman 382

 

यदि हमारा मन ईर्ष्या-द्वेष से रहित बिल्कुल शुद्ध हो तो जगत की कोई वस्तु हमें नुक्सान नहीं पहुँचा सकती | आनंद और शांति से भरपूर ऐसे महात्माओं के पास क्रोध की मूर्ति जैसा मनुष्य भी पानी के समान तरल हो जाता है | ऐसे महात्माओं को देख कर जंगल के सिंह और भेड़ भी प्रेमविह्वल हो जाते हैं | सांप-बिच्छू भी अपना दुष्ट स्वभाव भूल जाते हैं |

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बाल संस्कार केंद्र

BSK-बापू जी के उदगार


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बाल संस्कार केन्द्र माने क्या? जानते हो?

बाः बापू के प्यारे बालक जहाँ पढ़ते हैं वह स्थान।

लः लक्ष्यभेदी बनाने वाला।

सं- संस्कृति के रक्षक बनाने वाला।

स्- स्वाध्यायी और स्वाश्रयी बनानेवाला।

काः कार्यकुशल बनाने वाला।

रः रचनात्मक शैली द्वारा मानव-रत्न तराशनेवाला।

केः केसरी सिंह के समान निर्भय बनाने वाला।

न्- न्यायप्रिय बनाने वाला।

द्रः हृदय को द्रवीभूत, और जीवन को दृढ़ मनोबलवाला बनाने की शिक्षा देने वाला स्थान।

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