Achyutaya Product

अच्युताय हरड बहेडा आँवला


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शहदयुक्त(त्रिफला टेबलेट) यह गोली श्रेष्ठ रसायन,बलप्रद एवं पौष्टिक है।यह नेत्रों के लिए हितकर वर्ण एवं स्वर को उत्तम करनेवाली,मेधावर्धक,वीर्यवर्धक,भुख को बढाने वाली एवं रूचिकारक है ।ईसके नियमित सेवन से मस्तिष्क रोग,दंतरोग,हृदय रोग एवं गुर्दे(Kidney)की विभिन्न प्रकार की बीमारियों से रक्षा होती है ।यह चर्मरोग(skin Disease),मोटापा(Obesity),दमा,खाँसी,कब्ज(Constipation),पेट का फूलना,अजीर्ण आदि मे भी अत्यंत लाभदायक है ।

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संत वाणी

बड़े पीर की कथा


                                                 बड़े पीर की कथा 

INDIAN FLAG-2

 

       (श्रद्धा के साथ -साथ बुद्धि योग जरूरी )

 

मानवमात्र की सफलता का मूल उसकी आत्मश्रद्धा में निहित है। आत्मश्रद्धा का सीधा संबंध संकल्पबल के साथ है। तन-बल, मन-बल, बुद्धि-बल एवं आत्मबल ऐसे कई प्रकार के बल हैं, उनमें आत्मबल सर्वश्रेष्ठ है। आत्मबललल   में अचल श्रद्धा यह विजय प्राप्त करने की सर्वोत्तम कुंजी है। जहाँ आत्मबल में श्रद्धा नहीं है वहीं असफलता, निराशा, निर्धनता, रोग आदि सब प्रकार के दुःख देखने को मिलते हैं। इससे विपरीत जहाँ आत्म बल में अचल श्रद्धा है वहाँ सफलता, समृद्धि, सुख, शांति, सिद्धि आदि अनेक प्रकार के सामर्थ्य देखने को मिलते हैं।

जैसे-जैसे मनुष्य अपने सामर्थ्य में अधिकाधिक विश्वास करता है, वैसे-वैसे वह व्यवहार एवं परमार्थ दोनों में अधिकाधिक विजय हासिल करता है। अमुक कार्य करने का उसमें सामर्थ्य है, ऐसा विश्वास और श्रद्धा-यह कार्यसिद्धि का मूलभूत रहस्य है।

मनुष्य अपनी उन्नति शीघ्र नहीं कर पाता इसका मुख्य कारण यही है कि उसे अपने सामर्थ्य पर संदेह होता है। वह ‘अमुक कार्य मेरे से न हो सकेगा’ ऐसा सोच लेता है। जिसका परिणाम यह आता है कि वह उस कार्य को कभी करने का प्रयत्न भी नहीं करता। आत्मश्रद्धा का सीधा संबंध संकल्पबल के साथ है।

आत्मबल में अविश्वास प्रयत्न की सब शक्तियों को क्षीण कर देता है। प्रयत्न के बिना कोई भी फल प्रगट नहीं होता। अतः प्रयत्न को उत्पन्न करने वाली आत्मश्रद्धा का जिसमें अभाव है उसका जीवन निष्क्रिय, निरुत्साही एवं निराशाजनक हो जाता है। जहाँ-जहाँ कोई छोटा-बड़ा प्रयत्न होता है वहाँ-वहाँ उसके मूल में आत्मश्रद्धा ही स्थित होती है और अंतःकरण में जब तक आत्मश्रद्धा स्थित होती है तब तक प्रयत्नों का प्रवाह अखंड रूप से बहता रहता है। आत्मश्रद्धा असाधारण होती है तो प्रयत्न का प्रवाह किसी भी विघ्न से न रुके ऐसा असाधारण एवं अद्वितिय होता है।

‘मैं अमुक कार्य कर पाऊँगा’ – ऐसी साधारण श्रद्धा भी यदि अंतःकरण में होती है तभी प्रयत्न का आरंभ होता है एवं प्रयत्न में मनुष्य में निहित गुप्त सामर्थ्य को प्रगट करने वाला अमोघ बल समाविष्ट होता है। दियासिलाई में अग्नि है किन्तु जब तक उसे पिसा नहीं जाता तब तक करोड़ वर्ष भी वह यूँ ही पड़ी रहे तो भी उसमें से अग्नि प्रगट नहीं होती। से घिसकर ही अग्नि को प्रगट किया जा सकता है ऐसे ही मनुष्य में निहित अत्यंत सामर्थ्य प्रयत्न के द्वारा ही प्रगट होता है।

मनुष्य में कितना सामर्थ्य निहित है इसका निर्णय कोई भी नहीं कर सकता। शास्त्र को उसे शाश्वत, सर्व सामर्थ्यवान, सर्वज्ञ, सत्-चित्-आनन्द, अनंत, अखंड, अव्यय, अविनाशी, निरंजन, निराकार, निर्लेप एवं परम प्रेमास्पद कहते हैं अतः मनुष्य जो चाहे वह हो सकता है। पाणिनी जैसे वैयाकरणिक, पतंजलि जैसे योग-प्रवर्तक, वशिष्ठजी जैसे तत्त्वज्ञ, विश्वामित्र जैसे महान तपस्वी, जैमिनी जैसे उत्तम मीमांसक, कालिदास जैसे समर्थ कविकुलशिरोमिणी, धन्वंतरि जैसे वैद्य, भास्कराचार्य जैसे प्रखर ज्योतिर्विद, लिंकन जैसे मानवतावादी, गाँधी जी जैसे सत्यनिष्ठ, रमण महर्षि जैसे तत्त्वनिष्ठ, टैगोर जैसे महान कवि, जिब्रान जैसे सर्वांग सर्जक, स्वामी रामतीर्थ जैसे वैरागी, विवेकानन्द जैसे धर्म-धुरंधर, हेनरी फोर्ड जैसे उद्योगपति, आईन्सटाईन जैसे वैज्ञानिक, सुकरात जैसे सत्यवक्ता, डायोजिनियस जैसे निःस्पृही, सीजर जैसा विजेता, तुकारामजी जैसे क्षमाशील एवं ज्ञानदेव जैसा ज्ञानी-ऐसी आत्मश्रद्धा को अंतःकरण में स्थिर करके ही हुआ जा सकता है।

जिसके अंतःकरण में आत्मश्रद्धा स्थित हो वह भले एकदम अकेला हो, साधनविहीन हो फिर भी सफलता उसी का वरण करती है। उसके रोम-रोम में व्याप्त आत्मश्रद्धारूपी लौहचुंबक आस-पास से अनगिनत साधनरूपी लौहकणों को खींच लेता है। इसके विपरीत जिसकी आत्मश्रद्धा दब गयी हो वह भले लाखों मनुष्यों से घिरा हुआ हो एवं असंख्य साधनों से संपन्न हो फिर भी पराजित होता है। ऐसे कई उदाहरण हमें खुली आँखों देखने को मिलते हैं।

अपने इष्टावतार श्री रामचन्द्रजी के जीवन का ही दृष्टांत लें। जिसने देवताओं तक को अपना दास बना लिया था ऐसे रावण को हराने का निश्चय जब उन्होंने किया तब उनके पास कौन-से साधन थे ? समुद्र को पार करने के लिए उनके पास एक छोटी-सी नौका तक न थी। रावण एवं उसकी विशाल सेना से टक्कर ले सके ऐसा एक भी योद्धा उस वक्त उनके पास न था फिर भी श्रीराम ने निश्चय किया सीता को पाने का, रावण को हराने का तो अमित शक्तिवाला रावण भी रणभूमि की धूल चाटने लगा। 

 

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संत वाणी

Biggest Wonder ! (सबसे बड़ा आश्चर्य !!! )


     Biggest Wonder ! (सबसे बड़ा आश्चर्य !!! ) 

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आत्मा और परमात्मा की एकता का ज्ञान ही मुक्ति है। वास्तव में आप शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि एवं प्राण इन पाँचों से पृथक, सबको सत्ता देने वाले हो। आप ईश्वर से अभिन्न हो परंतु हृदय में काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं मत्सररूपी चूहों ने बिल बनाकर कचरा भर दिया है। विषयों की तृष्णा ने आत्मानंदरूपी दीपक को बुझाकर अज्ञान का अंधकार फैला दिया है।

अब प्रश्न है कि कचरा कैसे निकाला जाये ? झाड़ू लगाने से। बिल कैसे बंद हों ? पत्थर तथा कंकरीट भरने से। अंधकार कैसे दूर हो ? प्रकाश करने से।

संकल्प विकल्प कम करना, यह झाड़ू लगाना है। काम, क्रोध, लोभ, मोह व मत्सर इन पाँचों चोरों से अपने को बचान, यह बिलों को बंद करना है तथा आत्मज्ञान का विचार करना, यह प्रकाश करना है। ज्ञान का प्रकाश करके अविद्यारूपी अंधकार को हटाना है। आपकी हृदय गुफा में तो पहले से ही ऐसा दीपक विद्यमान है, जिसका तल और बाती कभी समाप्त ही नहीं होती। आवश्यकता है तो बस, ऐसे सदगुरू की जो अपनी ज्ञानरूपी ज्योत से आपकी ज्योत को जला दें।

जैसे सूर्य के ताप से उत्पन्न बादल कुछ समय के लिए सूर्य को ही ढँक लेते हैं, ऐसे ही आप भी अज्ञान का पर्दा चढ़ गया है। जैसे जल में उत्पन्न बुदबुदा जल ही है, परंतु वह जल तब होगा जब अपना परिच्छिन्न अस्तित्व छोड़ेगा।

बुदबुदे एवं लहरें सागर से प्रार्थना करने लगीं- “हे सागर देवता ! हमें अपना दर्शन कराइये।” सागर ने कहाः “ऐ मूर्खो ! तुम लोग मुझसे भिन्न हो क्या ? तुम स्वयं सागर हो, अपना स्वतंत्र अस्तित्व मानकर तुमने स्वयं को मुझसे भिन्न समझ लिया है।” इसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा दो भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं। अज्ञानतावश द्वैत का भ्रम हो गया है।

एक संत ने अपने शिष्य से कहाः “बेटा ! एक लोटे में गंगाजल भरकर ले आओ।” शिष्य दौड़कर पास ही में बह रही गंगा नदी से लोटे में जल भरके ले आया। गुरू जी ने लोटे के जल को देखकर शिष्य से कहाः “बेटा ! यह गंगाजल कहाँ है ?गंगा में तो नावें चल रही हैं, बड़े-बड़े मगरमच्छ और मछलियाँ क्रीड़ा कर रही हैं, लोग स्नान पूजन कर रहे हैं। इसमें वे सब कहाँ हैं ?”

शिष्य घबरा गया। उसने कहाः “गुरूजी ! मैं तो गंगाजल ही भरकर लाया हूँ।” शिष्य को घबराया हुआ देख संतश्री ने कहाः “वत्स ! दुःखी न हो। तुमने आज्ञा का ठीक से पालन किया है। यह जल कल्पना के कारण गंगाजल से भिन्न भासता है, परंतु वास्तव में है वही। फिर से जाकर इसे गंगाजी में डालोगे तो वही हो जायेगा। रत्तीभर भी भेद नहीं देख पाओगे। इसी प्रकार आत्मा और परमात्मा, भ्रांति के कारण अलग-अलग भासित होते हैं। वास्तव में हैं एक ही। मन की कल्पना से जगत की भिन्नता भासती है, परंतु वास्तव में एक ईश्वर ही सर्वत्र विद्यमान है।

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