यह बड़ा ही रहस्य भरा महोत्सव है। समाज के पहले से लेकर आखिरी व्यक्ति तक का ध्यान रखते हुए उसके उत्थान के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों को अपनाते हुए, इन्सान की आवश्यकताओं व महत्ता को समझाकर उसके विकास के लिए निर्गुण, निराकार परात्पर ब्रह्म सगुण-साकार होकर गुनगुनाता, गीत गाता, नाचता, खिलाता और खाता, अनेक अठखेलियाँ करता हुआ, इस जीव को अपनी असलियत का दान करता हुआ, उसे अपनी महिमा में जगाता हुआ प्रगट हुआ है। उसी को श्रीकृष्णावतार कहते हैं।
श्रीकृष्ण के जीवन में न पुकार है न आवाज है। श्रीकृष्ण के जीवन में केवल प्रसन्नता है। श्रीकृष्ण नाचते हैं तो पूरे नाचते हैं, हँसते हैं तो पूरे हँसते हैं। हम लोग हँसते हैं तो थोड़ा इज्जत-आबरू का, अड़ोस-पड़ोस का ख्याल रखकर हँसते हैं। आप हँसोगे तो इधर-उधर देखकर हँसोगे फिर भी पूरे नहीं हँसोगे। रोओगे तब भी पूरे नहीं रोओगे, नाचोगे तो भी पूरे नहीं नाचोगे किन्तु श्रीकृष्ण जिस समय जो करते हैं, पूरा करते हैं। खाते हैं तो पूरा, डाँटते हैं तो पूरा, नाचते हैं तो पूरा। इस अवतार ने, आदिनारायण ने हमारे जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने के लिए ही सारी लीलाएँ की हैं।
श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक घटना कुछ न कुछ संदेश अवश्य देती है। उन्हें अपनाकर आप अवश्य ही वहाँ तक पहुँच सकते हैं, जहाँ स्वयं श्रीकृष्ण हैं। आप श्रीकृष्ण के जीवन को अपना आदर्श बनाकर, उसके अनुसार आचरण कर उस पथ के पथिक बन सकें, यही हार्दिक शुभकामना…….
‘जैसे अग्नि सुवर्ण आदि धातुओं के मल को नष्ट कर देती है, ऐसे ही भक्ति से किया गया भगवान का कीर्तन सब पापों के नाश का अत्युत्तम साधन है।’
पाश्चात्य वैज्ञानिक डॉ. डायमंड अपने प्रयोगों के पश्चात जाहिर करता है कि पाश्चात्य रॉक संगीत, पॉप संगीत सुनने वाले और डिस्को डास में सम्मिलित होने वाले, दोनों की जीवनशक्ति क्षीण होती है, जबकि भारतीय शास्त्रीय संगीत और हरि-कीर्तन से जीवनशक्ति का शीघ्र व महत्तर विकास होता है। हरि-कीर्तन हमारे ऋषि-मुनियों एवं संतों ने हमें आनुवंशिक परंपराओं के रूप में प्रदान किया है और यह भोग-मोक्ष दोनों का देने वाला है।
जापान में एक्यप्रेशर चिकित्सा हुआ। उसके अनुसार हाथ की हथेली व पाँव के तलवों में शरीर के प्रत्येक अंग के लिए एक निश्चित बिंदु है, जिसे दबाने से उस-उस अंग का आरोग्य-लाभ होता है। हमारे गाँवों के नर-नारी, बालक-वृद्ध यह कहाँ से सीखते? आज वैज्ञानिकों ने जो खोजबीन करके बताया वह हजारों-लाखों साल पहले हमारे ऋषि-मुनियों, महर्षियों ने सामान्य परंपरा के रूप में पढ़ा दिया कि हरि-कीर्तन करने से तन-मन स्वस्थ और पापनाश होता है। हमारे शास्त्रों की पुकार हरि-कीर्तन के बारे में इसीलिए है ताकि सामान्य-से-सामान्य नर-नारी, आबालवृद्ध, सब ताली बजाते हुए कीर्तन करें, भगवदभाव में नृत्य करें, उन्हें एक्यूप्रेशर चिकित्सा का अनायास ही फल मिले, उनके प्राण तालबद्ध बनें (प्राण तालबद्ध बनने से, प्राणायाम से आयुष्य बढ़ता है), मन के विकार, दुःख, शोक आदि का नाश हो और हरिरसरूपी अमृत पियें।
लाल बहादुर शास्त्री एक गरीब विधवा माता के सुपुत्र थे। गरीबी के कारण उनकी माँ ने उन्हें पढ़ने के लिए अपने एक दूर के रिश्तेदार के यहाँ भेज दिया। लालबहादुर से वे लोग जूठे बर्तन मँजवाते, कपड़े धुलवाते तिस पर गालियाँ अलग से मिलतीं। लालबहादुर वास्तव में बहादुर निकले। शिला सम हृदय बनाकर उन्होंने अनेक बार अपमान तिरस्कार सहा पर डटे रहे और पढ़ लिख के एक दिन भारत के प्रधानमंत्री पद तक पहुँचे। उनकी ईमानदारी और कर्त्तव्यनिष्ठा को आज भी याद किया जाता है।
ईश्वरचन्द्र के सामने बड़ी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति थी। दिन भर तो वे कालेज में पढ़ते-पढ़ाते, वहाँ से आकर चार लोगों के लिए भोजन तैयार करते, सबको भोजन कराकर बर्तन माँजते और रात के दो बजे तक पढ़ते। अपने इस कठिन परिश्रम से वे व्याकरण, साहित्य, स्मृति, अलंकार आदि में पारंगत हो गये और धीरे-धीरे ʹविद्यासागरʹ के रूप में उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गयी। आज भी उन्हें उनकी उदारता व समाज सेवा के लिए याद किया जाता है।
ऐसे ही स्वामी रामतीर्थजी भी विद्यार्थी-अवस्था में बड़ी अभावग्रस्त दशा में रहे। कभी तेल न होता तो तो सड़क के किनारे के लैम्प के नीचे बैठकर पढ़ लेते। कभी धन के अभाव में एक वक्त ही भोजन कर पाते। फिर भी दृढ़ संकल्प और निरन्तर पुरुषार्थ से उन्होंने लौकिक विद्या ही नहीं पायी अपितु आत्मविद्या में भी आगे बढ़े और मानवीय विकास की चरम अवस्था आत्मसाक्षात्कार को उपलब्ध हुए। अमेरिका का प्रेसिडेंट रूजवेल्ट उनके दर्शन और सत्संग से धन्य-धन्य हो जाता था। कहाँ तो एक गरीब विद्यार्थी और कहाँ ૐकार के जप व प्रभुप्राप्ति के दृढ़ निश्चय से महान संत हो गये !
हे विद्यार्थी ! पुरुषार्थी बनो, संयमी बनो, उत्साही बनो। लौकिक विद्या तो पाओ ही पर उस विद्या को भी पा लो, जो मानव को जीते-जी मृत्यु के पार पहुँचा देती है। उसे भी जानो जिसको जानने से सब जाना जाता है, इसी में तो मानव-जीवन की सार्थकता है। हे वीर ! तुम बढ़े चलो….
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