कथा अमृत, दर्शन ध्यान, यज्ञ, विचार विमर्श, विवेक जागृति, संत वाणी, सनातन संस्कृति

श्री योग वशिस्ठ महारामायण


 

रामजी ! जगत् कार्य और कारण से रहित है तो आत्मा और जगत् की एकता कैसे हो इससे मैं जो दृष्टान्त कहूँगा उसका एक अंश अंगी कार करना, सब देश अंगीकार न करना । हे रामजी! कार्य कारण की कल्पना मूर्खों ने की है । उसके मिटाने के लिये मैं स्वप्न दृष्टान्त कहता हूँ, उसके समझने से तेरे मन का संशय नष्ट हो जावेगा । दृग और दृश्य का भेद मूर्ख को भासता है । उसके दूर करने के अर्थ मैं स्वप्न दृष्टान्त कहूँगा जिसके विचारने से मिथ्याविभाग कल्पना का अभाव होता है ।

हे रामजी! ऐसी कल्पना का नाशकर्ता यह मेरा मोक्ष उपाय शास्त्र है । जो पुरुष आदि से अंत-पर्यन्त इसे विचारेगा सो पूर्ण संस्कारी होगा । जो पद पदार्थ को जाननेवाला हो और दृश्य को बारंबार विचारे तो उसका दृश्य भ्रम नष्ट होगा । इस शास्त्र के विचार में किसी तीर्थ, तप, दान आदिक की अपेक्षा नहीं है । जहाँ स्थान हो वहाँ बैठे और जैसा भोजन गृह में हो वैसा करे और बारंबार इसका विचार करे तो अज्ञान नष्ट होकर आत्मपद की प्राप्ति होवेगी । हे रामजी ! यह शास्त्र प्रकाशरूप है । जैसे अन्धकार में पदार्थ नहीं दीखता और दीपक के प्रकाश से चक्षुसहित दीखता है वैसे शास्त्र रूपी दीपक विचाररूपी नेत्रसहित हो तो आत्मपद की प्राप्ति हो ।

हे रामजी ! आत्मज्ञान विचार बना वर और शाप से प्राप्त नहीं होता । जब विचार करके दृढ़ अभ्यास कीजिये तब प्राप्त होता है इससे इस मोक्षपावन शास्त्र के विचार से जगद्भ्रम नष्ट हो जावेगा और जगत् को देखते देखते जगत् भाव मिट जावेगा । जैसे लिखी हुई सर्प की मूर्ति से बिना विचार भ्रम होता है और जब बिचारकर देखिये तब सर्पभ्रम मिट जाता है वैसे ही जगद्भ्रम विचार करने से नष्ट हो जाता है और जन्म-मरण का भय भी नहीं रहता । हे रामजी! जन्ममरण का भय भी बड़ा दुःख है, परन्तु इस शास्त्र के विचार से वह भी नष्ट हो जाता है । जिन्होंने इसका विचार त्यागा है वह माता के गर्भ में कीट होकर भी कष्ट से न छूटेंगे और विचारवान् पुरुष आत्मपद को प्राप्त होंगे । जो श्रेष्ठ ज्ञानी है उसको अनन्त सृष्टि अपना ही रूप भासती है कोई पदार्थ आत्मा से भिन्न नहीं भासता । जैसे जिसको जल का ज्ञान है उसको लहर और आवर्त्त सब जलरूप ही भासती है वैसे ही ज्ञानवान् को सब आत्मरूप ही भासता है और वह इन्द्रियों के इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में इच्छा द्वेष नहीं करता, सदा एकरस मन के संकल्प से रहित शान्तरूप होता है जैसे मंदराचल पर्वत के निकलने से क्षीर समुद्र शान्त हुआ है वैसे ही संकल्प विकल्प रहित मनुष्य शान्तिरूप होता है ।

हे रामजी ! और तेज दाहक होता है परन्तु ज्ञान का तेज जिस घट में उदय होता है सो शीतल और शान्तिरूप हो जाता है और फिर उसमें संसार का विकार कोई नहीं रहता । जैसे कलियुगमें शिखावाला तारा उदय होता है और कलियुग के अभाव में नहीं उदय होता वैसे ही ज्ञानवान् के चित्त में विकार उत्पन्न नहीं होता । हे रामजी! संसार भ्रम आत्मा के प्रमाद से उत्पन्न होता है, आत्मज्ञानहोने से वह यत्न के बिना ही शान्त हो जाता है । फूल और पत्र के काटने में भी कुछ यत्न होता है परन्तु आत्मा के पाने में कुछ यत्न नहीं होता क्योंकि बोधरूप को बोध ही से जानता है । हे रामजी! जो जाननेमात्र ज्ञानस्वरूप है उसमें स्थित होने का क्या यत्न है ।  

Yoga Vasistha     

आत्मा शुद्ध और अद्वैतरूप है और जगद्भ्रममात्र है । जिसकी सत्यता पूर्वापर विचार से न पाइये उसको भ्रममात्र जानिये और पूर्वापर विचार से जो स्थिर रहे उसको सत्यरूप जानिये । इस जगत् की सत्यता आदि अन्त में नहीं है । इससे स्वप्नवत् है । जैसे स्वप्न आदि अन्त में कुछ नहीं होता वैसे ही जाग्रत भी आदि अन्त में नहीं है इससे जाग्रत और स्वप्न दोनों तुल्य हैं । हे रामजी! यह वार्त्ता बालक भी जानता है कि जिसकी आदि अन्त में सत्यता न पाइये सो स्वप्नवत् है । जिसका आदि भी न हो और अन्त भी न रहे उसका मध्य भी असत्य जानिये । उसका दृष्टान्त यह है कि संकल्प पुरीवत् ध्यान नगर की नाई, स्वप्नपुरी की नाईं; वर और शाप से जो उपजता है उसकी नाईं और ओषधि से उपज की नाईं, इन पदार्थों की सत्यता न आदि में होती है और न अन्त में होती है और मध्य में जो भासता है सो भी भ्रममात्र है वैसे ही यह जगत् अकारण है और कार्यकारणभाव सम्बन्ध से भासता है तो कार्य-कारण से कार्यरूप जगत् हुआ, पर आत्मसत्ता अकारण है । जगत् साकार और आत्मा निराकार है । इस जगत् दृष्टान्त जो आत्मा में देंगे उसको तुमको एक अंश ग्रहण करना चाहिये । जैसे स्वप्न की सृष्टिका पूर्व अपर भाव आत्मा है, क्योंकि अकारण है और मध्यभाव का दृष्टान्त नहीं मिलता क्योंकि उपमेय अकारण है तो उसका इसके समान दृष्टान्त क्योंकर हो । इससे अपने बोध के अर्थ के दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण करना |

हे रामजी ! जो विचार वान् पुरुष हैं सो गुरू और शास्त्र के वचन सुनके सुखबोध के अर्थ दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण करते हैं तो उनको आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है, क्योंकि वे सारग्राहक होते हैं और जो अपने बोध के अर्थ दृष्टान्त का एक अंश ग्रहण नहीं करते और वाद करते हैं उनको आत्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं होती । इससे दृष्टान्त का एक अंश सारभूत ग्रहण करके दृष्टान्त के सर्वभाव से न मिलना चाहिये और पृथक को देखकर तर्क न करना चाहिए । जैसे अन्धकार में पदार्थ पड़ा हो तो दीपक के प्रकाश से देख लेते हैं क्योंकि दीपक के साथ प्रयोजन है, ऐसा नहीं कहते कि दीपक किसका है और तेलबत्ती कैसी है और किस स्थान की है वैसे ही दृष्टान्त का एक अंश आत्मबोध के निमित्त अंगी कार करना ।

हे रामजी ! जिसके वाक्य से अर्थ सिद्ध हो और जो अनुभव को प्रकट करे वह वचन अंगीकार करना और जिससे वाक्यार्थ सिद्ध न हो उसका त्याग करना । जो पुरुष अपने बोध के निमित्त वचन को ग्रहण करता है वही श्रेष्ठ है और जो बाद के निमित्त ग्रहण करता है वह मूर्ख है । जो कोई अभिमान को लेकर ग्रहण करता है वह हस्ती के समान अपने शिर पर मिट्टी डालता है–उसका अर्थ सिद्ध नहीं होता और जो अपने बोध के निमित्त वचन को ग्रहण करके विचारपूर्वक उसका अभ्यास करता है उसका आत्मा शान्त होता है । हे रामजी! आत्मपद पाने के निमित्त अवश्यमेव अभ्यास चाहिये । जब शम, विचार, संतोष और सन्त समागम से बोध को प्राप्त हो तब परमपद को पाता है । हे रामजी। जो कोई दृष्टान्त देता है वह एक देश लेकर कहता है, सर्वमुख कहने से अखण्डता का अभाव हो जाता है सर्वमुख दृष्टान्त मुख्य को जानिये वह सत्यरूप होता है । ऐसे तो नहीं होता कि आत्मा तो सत्यरूप,कार्य कारण से रहित और चैतन्य है उसके बताने के लिये कार्य कारण जगत् का दृष्टान्त कैसे दीजिये जो कोई जगत् का दृष्टान्त देता है वह केवल एक अंश लेके कहता है और बुद्धिमान भी दृष्टान्त के एक अंश को ग्रहण करते हैं । श्रेष्ठ पुरुष अपने बोध के निमित्त सार को ही ग्रहण करते हैं जैसे क्षुधार्थी को चावलपाक प्राप्त हो तो भोजन करने का प्रयोजन है वैसे ही जिज्ञासु को भी यही चाहिये कि अपने बोध के निमित्त सार को ग्रहण करके वाद न करे, क्योंकि उसकी उत्पत्ति और स्थिति का वाद करना व्यर्थ है ।

हे रामजी ! वाक्य वही है जो अनुभव को प्रकट करे और जो अनुभव को न प्रकट करे उसका त्याग करना चाहिये । कदाचित् स्त्री का वाक्य आत्मानुभव को प्रत्यक्ष करनेवाला हो तो उसको भी ग्रहण करना चाहिये और जो परमगुरु के तथा वेदवाक्य भी हों और अनुभव को प्रकट न करें तो उनका त्याग चाहिये । जब तक विश्राम न पावे तब तक विचार करना चाहिये । विश्राम का नाम तुरीयपद है जैसे मन्दराचल पर्वत के क्षोभ से क्षीरसमुद्र शान्त हुआ था वैसे ही विश्राम की प्राप्ति होने से अक्षय शान्ति होती है । हे रामजी! तुरीयपद संयुक्त पुरुष श्रुति-स्मृति उक्त कर्मों के करने से कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता और न करने से कुछ प्रत्यवाय नहीं होता । वह सदेह हो चाहे विदेह हो गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो उसको कुछ नहीं करना है । वह पुरुष संसारसमुद्र से पार ही है । हे रामजी! उपमेय की उपमा एक अंश से ग्रहण कर जानता है तब बोध की प्राप्ति होती है और बोध के बिना मुक्ति को प्राप्त नहीं होता, वह केवल व्यर्थ वाद करता है । हे रामजी! जिसके घट में शुद्धि स्वरूप आत्म सत्ता विराजमान है वह जो उसको त्यागकर और विकल्प उठाता है तो वह चोग चञ्चु और मूर्ख है ।

हे रामजी ! प्रत्यक्ष प्रमाण मानने योग्य है, क्योंकि अनुमान और अर्थापत्ति आदि प्रमाणों से उसकी सत्ता ही प्रकट होती है । जैसे सब नदियों का अधिष्ठान समुद्र है वैसे ही सब प्रमाणों का अधिष्ठान प्रत्यक्ष प्रमाण है । वह प्रत्यक्ष क्या है सो सुनिये । हे रामजी! चक्षुजन्य ज्ञान संवित संवेदन है, जो उस चक्षु से विद्यमान होता है उसका नाम प्रत्यक्ष प्रमाण है । उन प्रमाणों को विषय करनेवाला जीव है । अपने वास्तव स्वरूप के अज्ञान से अनात्मारूपी दृश्य बना है उसमे अहंकृति से अभिमान हुआ है और अभिमान ही से सब दृश्य होता है उससे हेयोपादेय बुद्धि होती है जिससे राग द्वेष करके जलता है और आपको कर्ता मानकर बहिर्मुख हुआ भटकता है । हे रामजी! जब विचार करके संवेदन अन्तर्मुखी हो तब आत्मपद प्रत्यक्ष होकर निज भाव को प्राप्त होता है और फिर प्रच्छिन्नभाव नहीं रहता, शुद्ध शान्ति को प्राप्त होता है । जैसे स्वप्न से जगकर स्वप्न का शरीर और दृश्यभ्रम नष्ट हो जाता है वैसे ही आत्मा के प्रत्यक्ष होने से सब भ्रम मिट जाता है और शुद्ध आत्मसत्ता भासती है ।हे रामजी! यह दृश्य और दृष्टा मिथ्या है । जो दृष्टा है सो दृश्य होता है और दृश्य है सो दृष्टा होता है-यह भ्रम मिथ्या आकाशरूप है । जैसे पवन में स्पन्दशक्ति रहती है वैसे ही आत्मा में संवेदन रहती है । जब संवे दन स्पन्दरूप होती है तब दृश्यरूप होके स्थित होती है । जैसे स्वप्न में अनुभवसत्ता दृश्य रूप होके स्थित होती है वैसे ही यह दृश्य है । सब आत्मसत्ता ही है, ऐसा विचार करके आत्मपद को प्राप्त हो जावो और जो ऐसा विचार करके आत्मपद को प्राप्त न हो सको तो अहंकार का जो उल्लेख फुरता है उसका अभाव करो । पीछे जो शेष रहेगा सो शुद्धबोध आत्मसत्ता है । जब तुम शुद्धबोध को प्राप्त होगे तब ऐसी चेष्टा होगी जैसे यंत्र की पुतली संवेदन बिना चेष्टा करती है वैसे ही देहरूपी पुतली का चलानेवाला मन रूपी संवेदन है, उसके बिना पड़ी रहेगी और अहंकार का अभाव होगा । इससे यत्न करके उस पद के पाने का अभ्यास करो जो नित्य, शुद्ध और शान्तरूप है । हे रामजी! “दैव” शब्द को त्यागकर अपना पुरुषार्थ करो और आत्मपद को प्राप्त हो । जो कोई पुरुषार्थ में शूरमा है सो आत्मपद को प्राप्त होता है औरजो नीच पुरुषार्थ का आश्रय करता है सो संसारसमुद्र में डूबता है ।

इति ||

 

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Tatvik Satsang

मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ |


प्रसिद्ध ऋषि भृगु के मन में जिज्ञासा उठी कि ब्रह्म को जाना जाये — ब्रह्म को समझा जाये। उनके पिता वरुण जी वेदों को जानने वाले ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे। भृगुजी ने अपने ब्रह्मज्ञानी पिता वरुण जी से प्रार्थना की — “भगवन, मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ, अतेव आप कृपा कर के मुझे ब्रह्म का अर्थ समझाइये।”

 वरुण जी ने भृगु से कहा, “तातन्न अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी —  ये सब ब्रह्म की उपलब्धि के द्वार हैं। इन सब में ब्रह्म की सत्ता स्फ-रित हो रही है।” फिर साथ में यह भी बताया कि सब प्रत्यक्ष दिखने वाले प्राणी जिस से उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीते हैं, तथा प्रयाण करते हुए जिस में विलीन हो जाते हैं, वही ब्रह्म है।

भृगु जी कुछ समझ नहीं पाये। उन्होंने वरुण जी से विस्तार पूर्वक समझाने की विनती की।

“मेरे समझाने से कुछ नहीं होगा”, वरुण जी बोले, “यह तुम्हें स्वयं ही समझना होगा। जाओ,तपस्या करो और स्वयं जानो इसका अर्थ।”

भृगु जी ने निष्ठापूर्वक पिता के कथन पर विचार किया, मनन किया। यही उनका तप था।

मनन के बाद भृगु जी इस निश्चय पर पहुँचे कि अन्न ही ब्रह्म है। उन्हें अन्न में वे सारे लक्षण नजर आये जो पिता जी ने बताये थे —

समस्त प्राणी अन्न से ही (अन्न के परिणार्मभूत वीर्य से) उत्पन्न होते हैं, अन्न खा कर ही जीवित रहते हैं और मरणोपरान्त अन्न देने वाली पृथ्वी में ही प्रविष्ट हो जाते हैं।

लेकिन वरुण जी ने भृगु महाराज के इस निश्चय का समर्थन नहीं किया। वे जानते थे कि पुत्र ने ब्रह्म के स्थूल रूप को ही समझा है। ब्रह्म के वास्तविक रूप तक उसकी बुद्धि अभी हीं पहुँची है।

भृगु जी ने फिर प्रार्थना की, “भगवन्! यदि मैं ठीक नहीं समझा तो आप ही मुझे ब्रह्मतत्त्व समझाइये।” लेकिन वरुण जी नहीं माने। उन्होंने कहा, “तू तप के द्वारा ब्रह्म को समझने की कोशिश कर। तेरा तप ब्रह्म का बोध कराने में सर्वथा समर्थ है।”

पिता की आज्ञा पाकर भृगु जी ने फिर तप शुरू किया। इस बार उन्होंने निश्चय किया —

प्राण ही ब्रह्म है।

लेकिन इस बार भी वरुण जी ने न तो उनके निश्चय का समर्थन किया और न ही उसे ब्रह्म का अर्थ समझाया।

“तुम्हारा तप ही ब्रह्म की प्राप्ति का साधन है।” — ऐसा कह कर उन्होंने भृगु जी को फिर से तपस्या करने के लिए कहा।

अगली दो बार भृगु जी के निश्चय थे —

मन ही ब्रह्म है।

विज्ञान ही ब्रह्म है।

लेकिन वरुण जी ने इन दोनों का भी समर्थन नहीं किया। उन्होंने सोचा — इस बार बेटा ब्रह्म के निकट आ गया है। उसका विचार स्थूल और सूक्ष्म दोनों जड़ तत्त्वों से ऊपर उठ कर चेतन तक तो पहुँच गया है, किन्तु ब्रह्म का स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है। इसे अभी और तपस्या की आवश्यकता है।

जब इस बार भी भृगु जी के निश्चय को समर्थन नहीं मिला तो वे पुनः तप करने चले गये।

पाँचवीं बार भृगु जी ने अन्तिम रूप से निश्चर्यपूर्वक जाना—

आनन्द ही ब्रह्म है।

सचमुच में आनन्द से ही सारे प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनन्द के सहारे ही वे जीते हैं, तथा इस लोक से प्रयाण करते हुए अन्त में आनन्द में ही विलीन हो जाते हैं।

इस प्रकार जान लेने पर भृगु जी को ब्रह्म का पूरा ज्ञान हो गया। तब से भृगु महाराज ब्रह्मज्ञानी कहलाने लगे।

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