राजस्थान में राष्ट्र जागृति हरिनाम संकीर्तन यात्रा
सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण
ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आशारामजी बापू की हितभरी वाणी
हमारे देश का भविष्य हमारी युवा पीढ़ी पर निर्भर है किन्तु उचित मार्गदर्शन के अभाव में वह आज गुमराह हो रही है। ब्रितानी औपनिवेशिक संस्कृति की देन वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में जीवन के नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीनता बरती गयी है। फलतः आज के विद्यार्थी का जीवन कौमार्यावस्था से ही विलासी और असंयमी हो जाता है। पाश्चात्य आचार-व्यवहार के अंधानुकरण से युवानों में जो फैशनपरस्ती, अशुद्ध आहार-विहार के सेवन की प्रवृत्ति, कुसंग, अभद्रता, चलचित्र-प्रेम आदि बढ़ रहे हैं, इससे दिनोंदि उनका पतन होता जा रहा है। वे निर्बल और कामी बनते जा रहे हैं। उनकी इस अवदशा को देखकर ऐसा लगता है कि वे संयमी जीवन की, ब्रह्मचर्य की महिमा से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। लाखों नहीं, करोड़ो-करोड़ों छात्र-छात्राएँ अज्ञानतावश अपने तन मन के मूल ऊर्जा-स्रोत का व्यर्थ में क्षय कर पूरा जीवन दीनता-हीनता-दुर्बलता में तबाह कर देते हैं और सामाजिक अपयश के भय से मन-ही-मन कष्ट झेलते रहते हैं। इससे उनका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है और सामान्य शारीरिक-मानसिक विकास भी नहीं हो पाता। इसका मूल कारण क्या है ? दुर्व्यसन तथा अनैतिक, अप्राकृतिक एवं अमर्यादित मैथुन द्वारा वीर्य की क्षति ! इससे रोगप्रतिकारक शक्ति घटती है, जीवनशक्ति का ह्रास होता है।
ब्रह्मचर्य के द्वारा ही हमारी युवा पीढ़ी अपने व्यक्तित्व का संतुलित एवं श्रेष्ठतर विकास कर सकती है। ब्रह्मचर्य के पालन से बुद्धि कुशाग्र बनती है, रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है तथा महान-से-महान लक्ष्य निर्धारित करने एवं उसे सम्पादित करने का उत्साह उभरता है, संकल्प में दृढ़ता आती है, मनोबल पुष्ट होता है। आध्यात्मिक विकास का मूल भी ब्रह्मचर्य ही है। भारत का सर्वांगीण विकास सच्चरित्र एवं संयमी युवाधन पर ही आधारित है। इसकी अवहेलना करना हमारे देश व समाज के हित में नहीं है। यौवन की सुरक्षा से ही सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण हो सकता है।


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