तुम अपने को दीन-हीन कभी मत समझो। तुम आत्मस्वरूप से संसार की सबसे बड़ी सत्ता हो। तुम्हारे पैरों तले सूर्य और चन्द्र सहित हजारों पृथ्वियाँ दबी हुई हैं। तुम्हें अपने वास्तविक स्वरूप में जागने मात्र की देर है। अपने जीवन को संयम-नियम और विवेक वैराग्य से भरकर आत्माभिमुख बनाओ। अपने जीवन में ज़रा ध्यान की झलक लेकर तो देखो! आत्मदेव परमात्मा की ज़री झाँकी करके तो देखो! बस, फिर तो तुम अखण्ड ब्रह्माण्ड के नायक हो ही। किसने तुम्हें दीन-हीन बनाए रखा है? किसने तुम्हें अज्ञानी और मूढ़ बनाए रखा है? मान्यताओं ने ही ना…? तो छोड़ दो उन दुःखद मान्यताओं को। जाग जाओ अपने स्वरूप में। फिर देखो, सारा विश्व तुम्हारी सत्ता के आगे झुकने को बाध्य होता है कि नहीं? तुमको सिर्फ जगना है…. बस। इतना ही काफी है। तुम्हारे तीव्र पुरूषार्थ और सदगुरू के कृपा-प्रसाद से यह कार्य सिद्ध हो जाता है।
कुण्डलिनी प्रारम्भ में क्रियाएँ करके अन्नमय कोष को शुद्ध करती है। तुम्हारे शरीर को आवश्यक हों ऐसे आसन, प्राणायाम, मुद्राएँ आदि अपने आप होने लगते हैं। अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष की यात्रा करते हुए कुण्डलिनी जब आनन्दमय कोष में पहुँचती है तब असीम आनन्द की अनुभूति होने लगती है। तमाम शक्तियाँ, सिद्धियाँ, सामर्थ्य साधक में प्रकट होने लगता है। कुण्डलिनी जगते ही बुरी आदतें और व्यसन दूर होने लगते हैं।





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