Parent's Worship Day

What is mppd?


Matri-Pitri Pujan Divas (MPPD) is a special day celebrated in India to honor and express gratitude towards parents, emphasizing the importance of parental respect and love.

Matri-Pitri Pujan Divas (MPPD) has several names that reflect its significance across different cultures and religions. Here’s a comprehensive list of its names:

Names of Matri-Pitri Pujan Divas:

MPPD

Matri-Pitri Pujan Divas (मातृ-पितृ पूजन दिवस)

Abba-Ammi Ibadat Day (अब्बा -अम्मी इबादत दिन)

Parent’s Worship Day

Celebration Context:

Inclusivity: The celebration is embraced by various communities, including Muslim families, which showcases the universal respect and love for parents.

Cultural Significance: Each name reflects the importance of honoring one’s parents, emphasizing a shared value across religions.

It’s wonderful to see such a beautiful tradition that unites people in gratitude and love for their parents!

Overview of Matri-Pitri Pujan Divas:

Meaning: The term translates to “Parents Worship Day.”

Celebration: It is observed by performing rituals and ceremonies dedicated to mothers (Matri) and fathers (Pitri).

Objective:

To instill values of respect and gratitude towards parents among children.

To foster a sense of family unity and appreciation for the sacrifices made by parents.

Key Components:

Rituals:

Worshiping parents through prayers and offerings.

Engaging in activities that reflect love and appreciation.

Activities:

Organizing community events and gatherings.

Schools often participate by educating students about the significance of respecting parents.

Significance:

Cultural Importance: Reinforces traditional values and strengthens family bonds.

Awareness: Encourages younger generations to acknowledge and appreciate parental efforts.

Inspiration Behind MPPD:

The source of inspiration for Matri-Pitri Pujan Divas (MPPD) is Asaram Bapu, a spiritual leader in India. He initiated this observance in 2007 as an alternative to Valentine’s Day, aiming to promote respect and gratitude towards parents.

Key Points about the Inspiration:

Founder: Asaram Bapu

Year Established: 2007

Purpose: To encourage the younger generation to honor and appreciate their parents, emphasizing the importance of familial bonds and respect.

This day serves as a reminder of the sacrifices parents make and the love they provide, fostering a culture of gratitude and respect.

Date of Celebration:

Matri-Pitri Pujan Divas (MPPD) is celebrated every year on February 14. This date coincides with Valentine’s Day, but it serves a different purpose—honoring and expressing gratitude towards parents.

Key Points:

Date: February 14

Purpose: To celebrate and appreciate the love, sacrifices, and efforts of parents.

This unique observance encourages individuals to reflect on the importance of family bonds and the respect owed to parents.

Inclusivity Across Religions:

Matri-Pitri Pujan Divas (MPPD) resonates with a broader audience beyond Hinduism and is celebrated by individuals from various religious backgrounds, including:

Hindus

Muslims

Sikhs

Christians

Key Points:

Inclusivity: Celebrated across multiple religions.

Universal Theme: The day focuses on honoring and expressing gratitude towards parents, which is a universal value.

This celebration promotes love and respect for parents, regardless of religious affiliation, making it a beautiful occasion for many.

Visit Websites:
https://paretnsworshipday.org
https://mppd.in/
http://mppd.ashram.org/

Standard
ईश्वर प्राप्ति, उद्देश्य, कथा अमृत, जीवन, दर्शन ध्यान, ध्यानामृत, प्रश्नोत्तरी, बापू के बच्चे नही रहते कच्चे, महत्वपूर्ण का चुनाव, यौगिक प्रयोग, विचार विमर्श, विज्ञान, विवेक जागृति, संस्कार सिंचन, सनातन संस्कृति

” चाय के दो कप “


जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी – जल्दी करने की इच्छा होती है , सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं , उस समय ये बोध कथा , ” काँच की बरनी और दो कप चाय ” हमें याद आती है ।

दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं …

lesson for life

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी ( जार ) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची … उन्होंने छात्रों से पूछा – क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ … आवाज आई … फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे – छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये h धीरे – धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये , फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्या अब बरनी भर गई है , छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ … कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले – हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया , वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई , अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे … फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा , क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ .. अब तो पूरी भर गई है .. सभी ने एक स्वर में कहा .. सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली , चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई … प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया – इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो …. टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान , परिवार , बच्चे , मित्र , स्वास्थ्य और शौक हैं , छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी , कार , बडा़ मकान आदि हैं , और रेत का मतलब और भी छोटी – छोटी बेकार सी बातें , मनमुटाव , झगडे़ है .. अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती , या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते , रेत जरूर आ सकती थी … ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है … यदि तुम छोटी – छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा … मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो , बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ , घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको , मेडिकल चेक – अप करवाओ … टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो , वही महत्वपूर्ण है ….. पहले तय करो कि क्या जरूरी है … बाकी सब तो रेत है .. छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे .. अचानक एक ने पूछा , सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि ” चाय के दो कप ” क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये , बोले .. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया …

jeevan me mahatvapurna batein

इसका उत्तर यह है कि , जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे , लेकिन हमारे पास उस परम पिता परमात्मा को सिमरन करने के लिए हमेशा समय होना चाहिए |

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विचार विमर्श, संत वाणी, सनातन संस्कृति

संतान के रूप में पुनर्जन्म लेकर कौन आता है…


पूर्व जन्म के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता- पिता, भाई-बहिन,पति-पत्नि- प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे -सम्बनधी, इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते है, सब मिलते है । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या हमें इनसे कुछ लेना होता है ।

वैसे ही संतान के रूप में हमारा कोई पूर्व जन्म का सम्बन्धी ही जन्म लेकर आता है । शास्त्रों में चार प्रकार के जन्म को बताया गया है :-

1. ऋणानुबन्ध :– पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, तो वो आपके घर में संतान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में, या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो ।

2. शत्रु पुत्र:–पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में संतान बनकर आयेगा, और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट या झगड़ा करेगा, या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा ।

3. उदासीन:– इस प्रकार की सन्तान माता-पिता को न तो कष्ट देती है और ना ही सुख । विवाह होने पर ऐसी संतानें माता- पिता से अलग हो जाती है ।

4. सेवक पुत्र:– पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिये आपकी सेवा करने के लिये पुत्र बनकर आता है । 

आप यह ना समझे कि यह सब बाते केवल मनुष्य पर ही लागू होती है । इन चार प्रकार में कोइ सा भी जीव आ सकता है । जैसे आपने किसी गाय की निःस्वार्थ भाव से सेवा की  है, तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है । यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पाला और उसके दूध देना बन्द करने के पश्चात उसे घर से निकाल दिया हो तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी ।

यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा । इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं करे । क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे उसे वह आपको सौ गुना करके देगी । यदि आपने किसी को एक रूपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रूपये जमा हो गये है । यदि आपने किसी का एक रूपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रूपये निकल गये ।

इसलिए मनुष्य जन्म मिला है तो उसका सदुपयोग करके अपना भविष्य संवार लो, कौन जाने कब आपके सुकर्म आपको जन्म-मरण के चक्रव्यूह से आज़ाद करवा दें और कब आपके द्वारा किये गए छोटे से दुष्कर्म भी आपको पुनर्जन्म के चक्रव्यूह में फंसा दें | 

इसलिए हे मनुष्य, अभी भी समय है, जाग जा, संभल जा, संतों की शरण में जा और अपना जीवन सफल बना, न जाने किस घडी जीवन की शाम हो जाये !!

 

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