कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।। गीता 4/17
अर्थ : कर्म का ज्ञान होना चाहिये, विकर्म का ज्ञान होना चाहिये और अकर्म का भी ज्ञान होना चाहिये; क्योंकिं कर्म की गति गहन है ।। 17 ।।
व्याख्या : जिसके मन को राग और द्वेष हिलाते रहते हों, समय-समय अहंकार निकल हो, जिसको काम, क्रोध, लोभ, मोह और भय परेशान करते हों, ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य, कर्म कहलाता है, ये पाप और पुण्य से मिश्रित होते हैं, लेकिन जब व्यक्ति इनके ऊपर उठकर मन व इन्द्रियों को अपने वश में कर चित्त को शुद्ध कर लेता है, तब वह योगी हो जाता है, फिर उसके द्वारा किया गया प्रत्येक कर्म निष्काम होता है, फलरहित होता है, इसको अकर्म कहते हैं । लेकिन जो कर्म समाज की व्यवस्था को गड़बड़ा दें, दूसरों को पीड़ा पहुंचाएं या अपने को अधोगति में ले जाएं, वे विकर्म या उल्टे कहलाते हैं, जो पाप फल देते हैं, विकर्म व्यक्ति तब करता है जब कोई भी विकार अपना प्रचंड रूप ले लें या चित्त में घोर अज्ञान हो । असलियत में इन कर्मों को समझना बड़ा मुश्किल है, क्योंकि कब कौन सा कर्म व्यक्ति कर ले या कौन सा कर्म अपना फल देने लगे, पता ही नहीं लगता । कर्म की गति को कोई भी नहीं जान पाया है, इसलिए भगवान कह रहे हैं कि कर्म की गति गहन है ।

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