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भेद में अभेद के दर्शन कराता हैः होलिकोत्सव


फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला पर्व ‘होली’ वर्ष का अंतिम पर्व है। यह ऐसा पर्व है जिसमें सभी वर्णों के लोग बिना किसी भेदभाव के सम्मिलित होते हैं।

प्राचीन काल में होलिकोत्सव के अवसर पर वेद के रक्षोहणं बलगहणम्…. आदि राक्षस विनाशक मंत्रों से यज्ञ की अग्नि में हवन किया जाता था और इसी पूर्णिमा से प्रथम चतुर्मास सम्बन्धी वैश्वदेव नामक यज्ञ का आरंभ होता था, जिसमें लोग खेतों में तैयार की हुई नयी आषाढ़ी फसल के अन्न – गेहूँ, जौ, चना आदि की आहुति देकर उस अर्थात बचे हुए अन्न को यज्ञशेष प्रसाद के रूप में ग्रहण करते थे। यज्ञांत में लोग उस भस्म को सिर पर धारण करके वंदना किया करते थे, जिसका विकृत रूप आज राख को बलात् लोगों पर उड़ाने के रूप में रह गया है। उस समय का धूलिहारी शब्द ही आज ही विकृत होकर धुलैंडी बन गया है।

शब्दकोष ग्रन्थों के अनुसार भुने हुए अन्न को संस्कृत भाषा में होलका नाम से पुकारा जाता है। अतः इसी नाम पर होलिकोत्सव का प्रारंभ मानकर इस पर्व को हम वेदकालीन कह सकते हैं। आज भी होलिकादहन के समय डंडे पर बँधी गेहूँ-जौ की बालियों को भूनते हैं – यह प्राचीन होलिकोत्सव की ही स्मृति दिलाता है।

वैदिक काल में यज्ञ के रूप में मनाये जाने वाले पर्व होलिकोत्सव में समय के साथ अनेक ऐतिहासिक घटनाएँ जुड़ती गयीं। नारद पुराण के अनुसार यह पवित्र दिन परमभक्त प्रह्लाद की विजय और हिरण्यकशिपु की बहन होलिका के विनाश की स्मृति का दिन है।

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