Festival, Holi, Satsang

होली उत्सव के पीछे का रहस्य


holi, asharam

Bapuji ke vachan

ये होली उत्सव के पीछे ऋतू-परिवर्तन का रहस्य छुपा है..और विघ्न-बाधाओं को मिटाने की घटनाए भी छुपी है.. और बच्चों को ऋतू-परिवर्तन के समय जो रोग होते उन रोगों को मिटाने का भी इस उत्सव में बड़ा भारी रहस्य है..

रघु राजा ने ये रहस्य नारद जी से उजागर करवाया था..रघु राजा के राज्य में वसंत ऋतू में बच्चे बिमारी से घिर जाते..मन्दाग्नि हो जाती, खान-पान पचता नहीं था..कई बच्चे तो मौत के शिकार हो जाते..तो राजा का कर्तव्य है की प्रजा की तकलीफ राजा की है..कई उपाय खोजने के बाद भी रास्ता नहीं मिला तो देव ऋषि नारद जी से प्रार्थना किये की हमारे राज्य में बच्चों की तंदुरुस्ती लड़खडाने लगी है..कई बच्चे मौत के मुंह में चले गए…तो देव ऋषि नारद जी ने उपाय बताया की इन दिनों में ऐसा उत्सव मनाया जाय..तो उस के बाद बच्चो की अग्नि मंदता दूर हुयी, रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ी..बच्चे,किशोर युवान स्वस्थ रहेने लगे..

ये होली का उत्सव बहुत कुछ हमारे हीत का दे देता है..सूर्य के सीधे तीखे किरण पड़ते तो शरीर में सर्दियों में जमा कफ़ पिघलने लगता है..और जठरा में आ जाता है.. और जठरा मंद हो जाती है..पलाश के फूल मन्दाग्नि निवर्तक है..इसलिए पलाश के फूलों का रंग से, पलाश के पत्तल से, पलाश के दोने से कितने सारे फायदे होते है..राजस्थान में अभी भी ये प्रथा है..महाराष्ट्र में केले के पत्ते पर भोजन करते…इस से चांदी के बर्तन में भोजन करने का लाभ होता है, लेकिन पलाश पत्ते के पत्तल और दोने में भोजन करने से सोने के बर्तन करने का लाभ होता है….अभी तो कागज़ के प्लेटे आ गए..दोने आ गए..इन सब में वो लाभ नहीं होता, जो खाकरे(पलाश) के पत्तल और दोने से होता है..

अब खाकरे के दोने और पत्तल तुम कहा ढूंढ़ने जाओगे?..इसलिए खाकरे(पलाश) के सार स्वरुप केसुड़े के फूल का रंग बना कर तुम्हारे शरीर के रोम कुपो पर ऐसी असर पड़े की वर्ष भर आप की रोग प्रतिकारक शक्ति बनी रहे..खाकरा लीवर को भी मजबूत करता है..लीवर कमजोर होता उन को काविल(जौंडिस ) होता है..जो केसुड़े के फूलों का रंग लगाते उन को काविल(जौंडिस) नहीं होता…मन्दाग्नि भी नहीं होता..मन्दाग्नि के कारण कई बीमारियाँ भी होती है..

सुनामी ने कहर किया तो जापानी बेचारे तबाही के बिच झुंझ रहे है..जी करता है की मैं जा कर वहाँ सेवा करू…तन-मन-धन से जापानियों की सेवा का रास्ता हम खोज लेंगे…
नारायण हरी.. हरि ॐ हरि…

इन दिनों में:-

1)नंगे सीर धुप में कभी ना घुमे..

2)नीम के 25-से-40 पत्ते एक काली मिर्च के साथ चबा के खाए और पानी पिए… ये पित्त जन्य रोग और वायु जन्य रोग को विदाय देने की व्यवस्था है..

3) इन दिनों में बिना नमक का भोजन करने का आग्रह रखे..नमक नहीं छोड़ सकते तो कम कर दो..ये नमक से बचने के दिन है..एक महिना नमक कम कर दो..खड़े नमक से घर में पोता मारे तो घर की निगेटिव ऊर्जा चली जाती है..हफ्ते-15 दिन में ऐसा एक बार जरुर किया करे.
4)ऋतू परिवर्तन है तो ट्यूमर और ब्लोकेज जोर मारेगा..कई लोगो की रोग प्रतिकार शक्ति कमजोर होती तो रोग की संभावना बढ़ जाती है..तो घर के मुख्य द्वार पर नीम और आसोपाल के पत्ते का तोरण लगाना भी हीतकारी रहेगा..

सब से बड़ा हीतकारी है अभयदान ! अपने आत्मा का चिंतन करो..

कन्या-दान, गोदान, गोरस-दान, सुवर्ण दान, विद्या दान , भूमि दान, धन दान, अन्न दान आदि अष्ट-प्रकार के दान से भी अभयदान हजार गुना बड़ा है…अभयदान से पता चलता है की ये सुनामी आई, इस से हजार गुना बड़ी सुनामी आये फिर भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती..हम तो सत -चित-आनंद स्वरुप आत्मा है..शरीर को तो कितना भी संभालो सुनामी में नहीं गए तो और किसी ढंग से जानेवाले है.. मकान,शरीर और ये व्यवस्थाये तो देर-सवेर लड़खडाने वाली है..लेकिन इन सारी व्यवस्था के फायदा उठा के आप के सत-स्वभाव, चेतन स्वभाव और आप के आनंद स्वभाव का आप को साक्षात्कार हो जाए!इस से आप परम निर्भीक हो जाओगे!!
ये सूरज बरफ का गोला होकर धरती पर पड़ जाए और धरती उलटी होकर आकाश में उड़ने लगे ..अपन सब निचे गीर जाए तभी भी अपना कुछ नहीं बिगड़ेगा ये साक्षात्कार हो जाता है! 🙂
ये सूर्य जो है ना, ऐसे अरबो अरबो सूरज है एक आकाश गंगा में..इस सब में सब से छोटा सूरज है जो हम देख रहे…फिर भी ये सूरज पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है! सूर्य पे जाकर खड़े होके देखे तो पृथ्वी कितनी लगेगी?13 लाख-वा हिस्सा!! ज़रा-सा..ऐसी कई आकाश गंगा जिस से संचलीत होती है वो तुम्हारा अंतरात्मा चैत्यन्य से तुम्हारा शरीर संचालीत होता है..और वो ही अंतरात्मा की सत-ता, चेतन-ता सब के अन्दर है..

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संत वाणी

संत दर्शन का क्या फल होता है ?


संत दर्शन का क्या फल होता है ?

bapuji (18)

संतसेवाका फल
तैलंग स्वामी बड़े उच्चकोटि के संत थे।वे 280 साल तक धरती पर रहे। रामकृष्ण परमहंस ने उनके काशी में दर्शन किये तो बोलेः”साक्षात् विश्वनाथजी इनके शरीर में निवास करते हैं।” उन्होंने तैलंग स्वामी को ‘काशी के सचल विश्वनाथ’नाम से प्रचारित किया।तैलंग स्वामी जी का जन्म दक्षिण भारत केविजना जिले के होलिया ग्राम में हुआ था। बचपन में उनका नाम शिवराम था। शिवराम कामन अन्य बच्चों की तरह खेलकूद में नहीं लगता था। जब अन्य बच्चे खेल रहे होते तो वेमंदिर के प्रांगण में अकेले चुपचाप बैठकर एकटक आकाश की ओर या शिवलिंग को निहारतेरहते। कभी किसी वृक्ष के नीचे बैठे-बैठे ही समाधिस्थ हो जाते। लड़के का रंग-ढंग देखकर माता-पिता को चिंता हुई कि कहीं यह साधु बन गया तो ! उन्होंने उनका विवाहकराने का मन बना लिया। शिवराम को जब इस बात का पता चला तो वे माँ से बोलेः “माँ ! मैं विवाह नहीं करूँगा, मैं तो साधुबनूँगा। अपने आत्मा की, परमेश्वर की सत्ता का ज्ञान पाऊँगा, सामर्थ्य पाऊँगा।” माता-पिता के अति आग्रह करने पर वे बोलेः “अगर आप लोग मुझे तंग करोगे तो फिर कभी मेरा मुँह नहीं देखसकोगे।”माँ ने कहाः “बेटा! मैंने बहुत परिश्रम करके, कितने-कितने संतों की सेवा करकेतुझे पाया है। मेरे लाल ! जब तक मैं जिंदा रहूँ तब तक तो मेरेसाथ रहो, मैं मर जाऊँ फिर तुम साधु हो जाना। पर इस बात का पता जरूर लगाना कि संतके दर्शन और उनकी सेवा का क्या फल होता है।””माँ! मैं वचन देता हूँ।”कुछ समय बाद माँ तो चली गयी भगवान केधाम और वे बन गये साधु। काशी में जाकर बड़े-बड़े विद्वानों, संतों से सम्पर्ककिया। कई ब्राह्मणों, साधु-संतों से प्रश्न पूछा लेकिन किसी ने ठोस उत्तर नहींदिया कि संत-सान्निध्य और संत-सेवा का यह-यह फल होता है। यह तो जरूर बताया किएक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध।तुलसी संगत साध की, हरे कोटि अपराध।।परंतु यह पता नहीं चला कि पूरा फल क्याहोता है। इन्होंने सोचा, ‘अब क्या करें ?’किसी साधु ने कहाः “बंगाल में बर्दवान जिले की कटवा नगरी में गंगाजी के तट परउद्दारणपुर नाम का एक महाश्मशान है, वहीं रघुनाथ भट्टाचार्य स्मृति ग्रंथ लिख रहेहैं। उनकी स्मृति बहुत तेज है। वे तुम्हारे प्रश्न का जवाब दे सकते हैं।”अब कहाँ तो काशी और कहाँ बंगाल, फिर भीउधर गये। रघुनाथ भट्टाचार्य ने कहाः “भाई ! संत के दर्शन औरउनकी सेवा का क्या फल होता है, यह मैं नहीं बता सकता। हाँ, उसे जानने का उपायबताता हूँ। तुम नर्मदा किनारे चले जाओ और सात दिन तक मार्कण्डेय चण्डी का सम्पुटकरो। सम्पुट खत्म होने से पहले तुम्हारे समक्ष एक महापुरुष और भैरवी उपस्थितहोंगे। वे तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं ।”शिवरामजी वहाँ से नर्मदा-किनारेपहुँचे और अनुष्ठान में लग गये। देखो, भूख होती है तो आदमी परिश्रम करता है औरपरिश्रम के बाद जो मिलता है न, वह पचता है। अब आप लोगों को ब्रह्मज्ञान की तो भूखहै नहीं, ईश्वरप्राप्ति के पुरुषार्थ करना नहीं है तो कितना सत्संग मिलता है, उससेपुण्य तो हो रहा है, फायदा तो हो रहा है लेकिन साक्षात्कार की ऊँचाई नहीं आती।हमको भूख थी तो मिल गया गुरुजी का प्रसाद।अनुष्ठान का पाँचवाँ दिन हुआ तो भैरवीके साथ एक महापुरुष प्रकट हुए। बोलेः “क्या चाहते हो ?”शिवरामजी प्रणाम करके बोलेः “प्रभु ! मैं यह जानना चाहताहूँ कि संत के दर्शन, सान्निध्य और सेवा का क्या फल होता है ?”महापुरुष बोलेः “भाई! यह तो मैं नहीं बता सकता हूँ।”देखो, यह हिन्दू धर्म की कितनी सच्चाईहै ! हिन्दू धर्म में निष्ठा रखने वाला कोई भी गप्प नहीं मारता किऐसा है, ऐसा है। काशी में अनेक विद्वान थे, कोई गप्प मार देता !लेकिन नहीं, सनातन धर्म में सत्य की महिमा है। आता है तो बोलो, नहीं आता तो नहींबोलो। शिवस्वरूप महापुरुष बोलेः “भैरवी ! तुम्हारे झोले मेंजो तीन गोलियाँ पड़ी हैं वे इनको दे दो।”फिर वे शिवरामजी को बोलेः “इस नगर के राजा के यहाँ संतान नहीं है। वह इलाज कर-करके थक गयाहै। ये तीन गोलियाँ उस राजा की रानी को खिलाने से उसको एक बेटा होगा, भले उसकेप्रारब्ध में नहीं है। वही नवजात शिशु तुम्हारे प्रश्न का उत्तर देगा।”शिवरामजी वे तीन गोलियाँ लेकर चले।नर्मदा किनारे जंगल में आँधी –तूफानों के बीच पेड़ के नीचे सात दिन के उपवास,अनुष्ठान शिवरामजी का शरीर कमजोर पड़ गयाथा। रास्ते में किसी बनिया की दुकान से कुछ भोजन किया और एक पेड़ के नीचे आरामकरने लगे। इतने में एक घसियारा आया। उसने घास का बंडल एक ओर रखा। शिवरामजी कोप्रणाम किया, बोलाः “आज की रात्रि यहीं विश्राम करके मैं कलसुबह बाजार में जाऊँगा।”शिवरामजी बोलेः “हाँ,ठीक है बेटा ! अभी तू जरा पैर दबा दे।”वह पैर दबाने लगा। शिवरामजी को नींद आगयी और वे सो गये। घसियारा आधी रात तक उनके पैर दबाता रहा और फिर सो गया। सुबहहुई, शिवरामजी ने उसे पुकारा तो देखा कि वह तो मर गया है। अब उससे सेवा ली है तोउसका अंतिम संस्कार तो करना पड़ेगा। दुकान से लकड़ी आदि लाकर नर्मदा के पावन तट परउसका क्रियाकर्म कर दिया और नगर में जा पहुँचे।राजा को संदेशा भेजा कि ‘मेरेपास दैवी औषधि है, जिसे खिलाने से रानी को पुत्र होगा।राजा ने इन्कार कर दिया कि “मैं रानी को पहले ही बहुत सारी औषधियाँ खिलाकर देख चुका हूँपरंतु कोई सफलता नहीं मिली।”शिवरामजी ने मंत्री से कहाः “राजा को बोलो जब तक संतान नहीं होगी, तब तक मैं तुम्हारेराजमहल के पास रहूँगा।” तब राजा ने शिवरामजी की औषधि ले ली।शिवरामजी ने कहाः “मेरीएक शर्त है कि पुत्र जन्म लेते ही तुरंत नहला-धुलाकर मेरे सामने लाया जाये। मुझेउससे बातचीत करनी है, इसीलिए तो मैं इतनी मेहनत करके आया हूँ।”यह बात मंत्री ने राजा को बतायी तो राजाआश्चर्य से बोलाः “नवजात बालक बातचीत करेगा !चलो देखते हैं।”रानी को गोलियाँ खिला दीं। दस महीने बादबालक का जन्म हुआ। जन्म के बाद बालक को स्नान आदि कराया तो वह बच्चा आसन लगाकरज्ञान मुद्रा में बैठ गया। राजा की खुशी का ठिकाना न रहा। रानी गदगद हो उठी कि “यह कैसा बबलू है कि पैदा होते ही ॐऽऽऽ करने लगा !ऐसा तो कभी देखा-सुना नहीं।”सभी लोग चकित हो गये। शिवरामजी के पासखबरें पहुँची। वे आये, उन्हें भी महसूस हुआ कि ‘हाँ, अनुष्ठान काचमत्कार तो है !’ वे बालक को देखकर प्रसन्न हुए, बोले, “बालक ! मैं तुमसे एक सवाल पूछने आया हूँ किसंत-सान्निध्य और संत सेवा का क्या फल होता है ?”नवजात शिशु बोलाः “महाराज! मैं तो एक गरीब, लाचार, मोहताज घसियारा था। आपकी थोड़ी सीसेवा की और उसका फल देखिये, मैंने अभी राजपुत्र होकर जन्म लिया है और पिछले जन्मकी बातें सुना रहा हूँ। इसके आगे और क्या-क्या फल होगा, इतना तो मैं नहीं जानताहूँ।।”ब्रह्म का ज्ञान पाने वाले, ब्रह्म कीनिष्ठा में रहने वाले महापुरुष बहुत ऊँचे होते हैं परंतु उनसे भी कोई विलक्षण होतेहैं कि जो ब्रह्मरस पाया है वह फिर छलकाते भी रहते हैं। ऐसे महापुरुषों के दर्शन,सान्निध्य व सेवा की महिमा तो वह घसियारे से राजपुत्र बना नवजात बबलू बोलने लगगया, फिर भी उनकी महिमा का पूरा वर्णन नहीं कर पाया तो मैं कैसे कर सकता हूँ !

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Mangalmay Channel

साजिस का पर्दाफास : भोलानन्द ने खोला राज़ – आसाराम बापू केस


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भोलानन्द ने खोली पोल : आसाराम बापू के खिलाफ हो रहा षड़यंत्र (Original)
मुजे विचलित किया गया था । मुजे फसाया गया था । – भोलानन्द का बयान ।
भोलानन्द उर्फ विनोद ने संत आसाराम बापू जी के खिलाफ साजिसकरताओंके नाम सबके सामने उजागर कीये  ।

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Indian Culture, Mangalmay Channel

Special Day for Jap and Meditation – Holi – Surat Sant Sammelan


कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ?

 होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।

जिस उद्देश्य से होली के पर्व की शुरुआत हमारे ऋषियों द्वारा की गयी थी उसके बारे में बताते हुए संत आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘यह होली का त्यौहार हास्य-विनोद करके छुपे हुए आनंद-स्वभाव को जगाने के लिए है। जो हो गया – हो… ली… बीत गया सो बीत गया, उससे राग-द्वेष मत करो। भविष्य का भय मत करो। वर्तमान में कहीं फँसो नहीं, आसक्ति करो नहीं। अपने दिल को प्रह्लाद की नाईं रसमय बना दो।’’ इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी पहलुओं को उजागर करते हुए वे कहते हैं कि ‘‘होली के दिनों में सुबह 20-25 नीम के कोमल पत्ते और एक काली मिर्च चबा के खाने से व्यक्ति वर्षभर निरोग रहता है।’’ पलाश के फूलों से होली खेलने की परम्परा का फायदा बताते हुए आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘पलाश कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है। साथ ही रक्तसंचार में वृद्धि करता है एवं मांसपेशियों का स्वास्थ्य, मानसिक शक्ति व संकल्पशक्ति को बढ़ाता है। होली की रात्रि (16 मार्च) को पूरी रात जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है।’’ केमिकल रंगों की हानियों से बचने के लिए प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करें।

प्राकृतिक रंग बनाने की सरल विधियाँ

   * केसरिया रंग : पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें। सुबह केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लायें या उबालकर, उसे ठंडा करके होली का आनंद उठायें।

  • सूखा हरा रंग : केवल मेंहदी चूर्ण या उसे समान मात्रा में आटे में मिलाकर बनाये गये मिश्रण का प्रयोग करें।

  • गीला पीला रंग : 2 चम्मच हल्दी चूर्ण 2 लीटर पानी में डालकर अच्छी तरह उबालें।

  • गीला लाल रंग : दो चम्मच मेंहदी चूर्ण को एक लीटर पानी में अच्छी तरह घोल लें।

संत आशारामजी बापू द्वारा पिछले तीन दशकों से ‘सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली रंगोत्सव’ मनाया जाता है जिसमें पलाश के फूलों से बने प्राकृतिक रंग में गंगाजल, तीर्थों का जल आदि मिलाकर प्राकृतिक रंग बनाया जाता है । इस होली महोत्सव से रोग, शोक, दुःख, संताप मिटने के अनेकों के अनुभव हैं । रासायनिक रंगों से होली खेलने में प्रति व्यक्ति लगभग 35 से 300 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि संत आशारामजी बापूजी के सान्निध्य में खेली जानेवाली सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली में प्रति व्यक्ति लगभग 30 से 60 मि.ली. से कम पानी लगता है । इस प्रकार देश की जल-सम्पदा की हजारों गुना बचत होती है । पलाश के फूलों का रंग बनाने के लिए उन्हें इकट्ठे करनेवाले आदिवासियों को रोजी-रोटी मिल जाती है ।

इस होलिकोत्सव से गरीबों, अनाथों, आदिवासियों तथा पूरे समाज की सेवा के आश्रम संचालित वार्षिक सेवा प्रोजेक्ट्स की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं तथा संत श्री आशारामजी बापू के अवतरण दिवस (20 अप्रैल) से इनका नया प्रारूप क्रियान्वित हो जाता है । गर्मियों में प्याऊ, शरबत वितरण अभियान भी राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जाता है ।

 

वैदिक ढंग से होली मनाना होता है हितकारी

होली का पर्व बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है । ऋषियों द्वारा समाज की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति के उद्देश्य के शुरू किये गये इस पर्व का आध्यात्मिक रहस्य बताते हुए संत  आशारामजी बापू कहते हैं कि

होली अगर हो खेलनी, तो संत सम्मत खेलिये ।

संतान शुभ ऋषि मुनिन की, मत संत आज्ञा पेलिये ॥

तुम संतों और ऋषि-मुनियों की संतान हो । यदि तुम होली खेलना चाहते हो तो भाँग पीकर बाजार में नाचने की जरूरत नहीं है, दारू पीकर अथवा दुर्व्यसन करके अपने-आपको अधोगति में डालने की जरूरत नहीं है । सच्ची होली तो यह है कि ब्रह्मविद्या की अग्नि प्रकट हो जाय, भक्तिरस की अग्नि भभक उठे और उसमें तुम्हारी चिंता, दारिद्रय, मोह, ममता स्वाहा हो जाय । तुम कंचन जैसे शुध्द हो जाओ । इसीका नाम होली है ।”

इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी पहलुओं को उजागर करते हुए बापूजी कहते हैं : ”होली के बाद 20-25 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है । होली (16 मार्च) की रात को जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है । होली आदि पर्वों के दिन भूलकर भी संसार-व्यवहार नहीं करना चाहिए ।”

केमिकल रंगों से होली खेलने से अनेक हानियाँ होती है अतः संत आशारामजी बापू प्राकृतिक ढंग से होली खेलने का मार्ग बताते हैं ।

होली की नीति समझकर मनायें तो होगा ज्यादा लाभ

आज होली तो हम मना लेते हैं परंतु हमारे ऋषियों ने जिस उद्देश्य से इस पर्व की नीति बनायी थी, उससे हम मीलों दूर रह गये हैं । इस कारण होली का यथार्थ लाभ हमें नहीं मिल पा रहा है, उल्टा इस पर्व को रासायनिक रंगों से मनाने की कुप्रथा चल पड़ी और अनर्गलता ने इसे और भी विकृत बना दिया है ।

होली पर्व के उद्देश्य को बताते हुए आशारामजी बापू कहते हैं : ”होली का पर्व भेदभाव मिटाकर पारस्परिक प्रेम व सद्भाव प्रकट करने का एक अवसर है, अपने दुर्गुणों तथा कुसंस्कारों की आहुति देने का एक यज्ञ है तथा परस्पर छुपे हुए प्रभुत्व को, आनंद को, सहजता को, निरहंकारिता के सुख को उभारने का उत्सव है ।”

इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी व साधना में उन्नतिकारक पहलुओं को उजागर करते हुए बापू कहते हैं : ”होली के बाद 20-25 दिन तक बिना नमक का अथवा कम नमकवाला भोजन करना स्वास्थ्य के लिए हितकारी है । इस दिनों में पचने में भारी भोजन करना हानिकारक है । होली (16 मार्च) की रात को जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है ।”

रासायनिक नहीं प्राकृतिक रंगों से खेलें होली

रासायनिक रंगों से होली खेलना स्वास्थ्य के लिए बहुत ही खतरनाक है । काले रंग में उपस्थित लेड ऑक्साइड गुर्दे की बीमारी व दिमाग की कमजोरी पैदा करता है । कॉपर सल्फेट जो कि हरे रंग में पाया जाता है, उससे आँखों में जलन, सूजन तथा अस्थायी अंधत्व जैसी समस्याएँ होती हैं । लाल रंग में उपस्थित मरक्युरी सल्फाइड त्वचा का कैंसर पैदा करता है । दूसरे अन्य रंगों में भी कई हानिकारक रसायन पाये गये हैं, जो शारीरिक हाँनियों के अलावा स्वभाव में शुष्कता, उग्रता आने जैसी समस्याएँ भी उत्पन्न करते हैं ।

रासायनिक रंगों से बचकर प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की सीख देने के साथ-साथ आशारामजी बापू  परमात्मा की भक्ति के अछूट रंग में रँग जाने की बात पर विशेष जोर देते हुए कहते हैं : ”ऐसी परिस्थितियों से बचना जो आपको दुर्व्यसनों के जहरीले रंगों से रँगना चाहें । आप तो बस, अपने-आपको हरिभक्ति के रंग से… प्रभु और प्रभु के प्यारे संतों के आत्मानंद से रँग देना… इतना रँगना, इतना रँगना कि रंग नाहीं छूटे…’’

आज श्री चैतन्य महाप्रभुजी जयंती भी है ।

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