विचार विमर्श, संत वाणी, सनातन संस्कृति, Guru Vani

धर्मो रक्षति रक्षितः – पूज्य बापूजी की अमृतवाणी


 

This slideshow requires JavaScript.

जो धर्म का हनन करता है, धर्म उसका ही नाश कर देता है ! और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है ! पर धर्म है क्या ?

आइये सुनते हैं बापूजी धर्म के बारे में क्या बताते हैं :

धर्म वही है जो आपको ऊपर उठने की प्रेरणा दे, और जहाँ आज हैं, वहां से नीचे न गिरें बल्कि ऊपर उठते जायें ! इसी व्यवस्था का नाम धर्म है !

 

Standard
सनातन संस्कृति, Bapuji

बापूजी द्वारा सेवा कार्य – गरीबों में भंडारा


 

भंडारा भंडारा2 भंडारा21 भंडारा23

 

गरीब और पिछड़े लोग एवं प्रशासन के अनदेखे लोग बापूजी के विशेष कृपा पात्र  हैं ! होली, दशहरा, दीवाली आदि पर्वों पर जब सभी लोग अपने मित्रो-परिजनों के साथ मिलकर ख़ुशी मनाते हैं, तब बापूजी कहीं सुदूर क्षेत्रों में जाकर इन गरीब और पिछड़े आदिवासियों को अन्न, वस्त्र, बर्तन, मिठाई एवं घर के लिए अन्य उपयोगी वस्तुएं प्रदान कर उनके जीवन को रोशन करते हैं !

 

 

Standard
विचार विमर्श, संत वाणी, Satsang

ब्रह्मज्ञानी सदा निर्लेपा !


संसारी वही है जो संसार में रहे, सुख दुःख का अनुभव करे और साधक वो है जो संसार में रहकर भी उससे अलग है !

तुलसीदास जी ने कहा है कि एक बार अपनी आत्मा का अनुभव कर लो, फिर उसके बाद कोई मुश्किल नहीं आएगी !

Standard
Holi

मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली !


कैसे मनायें स्वास्थ्यप्रद वैदिक होली ?

 होली का त्यौहार हमारे पूरे देश में मनाया जाता है। यह पर्व मूल में बड़ा ही स्वास्थ्यप्रद एवं मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाला है लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस पवित्र उत्सव में नशा, वीभत्स गालियाँ और केमिकल युक्त रंगों का प्रयोग करके कुछ लोगों ने ऋषियों की हितभावना – समाज की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और प्राकृतिक उन्नति की भावनाओं का लाभ लेने से समाज को वंचित कर दिया है।

जिस उद्देश्य से होली के पर्व की शुरुआत हमारे ऋषियों द्वारा की गयी थी उसके बारे में बताते हुए संत आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘यह होली का त्यौहार हास्य-विनोद करके छुपे हुए आनंद-स्वभाव को जगाने के लिए है। जो हो गया – हो… ली… बीत गया सो बीत गया, उससे राग-द्वेष मत करो। भविष्य का भय मत करो। वर्तमान में कहीं फँसो नहीं, आसक्ति करो नहीं। अपने दिल को प्रह्लाद की नाईं रसमय बना दो।’’ इस पर्व के स्वास्थ्य हितकारी पहलुओं को उजागर करते हुए वे कहते हैं कि ‘‘होली के दिनों में सुबह 20-25 नीम के कोमल पत्ते और एक काली मिर्च चबा के खाने से व्यक्ति वर्षभर निरोग रहता है।’’ पलाश के फूलों से होली खेलने की परम्परा का फायदा बताते हुए आशारामजी बापू कहते हैं कि ‘‘पलाश कफ, पित्त, कुष्ठ, दाह, वायु तथा रक्तदोष का नाश करता है। साथ ही रक्तसंचार में वृद्धि करता है एवं मांसपेशियों का स्वास्थ्य, मानसिक शक्ति व संकल्पशक्ति को बढ़ाता है। होली की रात्रि (16 मार्च) को पूरी रात जागरण करके जप-ध्यान से अनंत गुना फल मिलता है।’’ केमिकल रंगों की हानियों से बचने के लिए प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग करें।

प्राकृतिक रंग बनाने की सरल विधियाँ

   * केसरिया रंग : पलाश के फूलों को रात को पानी में भिगो दें। सुबह केसरिया रंग को ऐसे ही प्रयोग में लायें या उबालकर, उसे ठंडा करके होली का आनंद उठायें।

   * सूखा हरा रंग : केवल मेंहदी चूर्ण या उसे समान मात्रा में आटे में मिलाकर बनाये गये मिश्रण का प्रयोग करें।

   * गीला पीला रंग : 2 चम्मच हल्दी चूर्ण 2 लीटर पानी में डालकर अच्छी तरह उबालें।

   * गीला लाल रंग : दो चम्मच मेंहदी चूर्ण को एक लीटर पानी में अच्छी तरह घोल लें।

rang

संत आशारामजी बापू द्वारा पिछले तीन दशकों से ‘सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली रंगोत्सव’ मनाया जाता है जिसमें पलाश के फूलों से बने प्राकृतिक रंग में गंगाजल, तीर्थों का जल आदि मिलाकर प्राकृतिक रंग बनाया जाता है । इस होली महोत्सव से रोग, शोक, दुःख, संताप मिटने के अनेकों के अनुभव हैं । रासायनिक रंगों से होली खेलने में प्रति व्यक्ति लगभग 35 से 300 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि संत आशारामजी बापूजी के सान्निध्य में खेली जानेवाली सामूहिक प्राकृतिक-वैदिक होली में प्रति व्यक्ति लगभग 30 से 60 मि.ली. से कम पानी लगता है । इस प्रकार देश की जल-सम्पदा की हजारों गुना बचत होती है । पलाश के फूलों का रंग बनाने के लिए उन्हें इकट्ठे करनेवाले आदिवासियों को रोजी-रोटी मिल जाती है ।

इस होलिकोत्सव से गरीबों, अनाथों, आदिवासियों तथा पूरे समाज की सेवा के आश्रम संचालित वार्षिक सेवा प्रोजेक्ट्स की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं तथा संत श्री आशारामजी बापू के अवतरण दिवस (20 अप्रैल) से इनका नया प्रारूप क्रियान्वित हो जाता है । गर्मियों में प्याऊ, शरबत वितरण अभियान भी राष्ट्रीय स्तर पर चलाया जाता है ।            

नोट:  केसुड़े के फूलों से निर्मित रंग, औषधियां व सत्साहित्य प्राप्त करने हेतु नजदीकी संत श्री आशारामजी आश्रम से  सम्पर्क करें | फ़ोन : 079-39877788

Standard