योग्यताओँ का निखार कैसे हो ?
दिल्ली गुरुपूनम सत्संग ४ जूलाई २००९

हमारे शारीरिक व मानसिक आरोग्य का आधार हमारी जीवनशक्ति (Life Energy) है। यह प्राणशक्ति भी कहलाती है।
छात्रों के महान आचार्य पूज्य बापू जी द्वारा सूक्ष्म विश्लेषण
हमारे जीवन जीने के ढंग के अनुसार हमारी जीवनशक्ति का ह्रास या विकास होता है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने योगदृष्टि से, अंतदृष्टि से और जीवन का सूक्ष्म निरीक्षण करके जीवनशक्ति विषयक गहनतम रहस्य खोज लिये थे। डॉ. डायमंड ने उन मनीषियों की खोज को कुछ हद तक समझने की कोशिश कीः
भाव का अभाव
ईर्ष्या, घृणा, तिरस्कार, भय, कुशंका आदि कुभावों से जीवनशक्ति क्षीण होती है। भगवत्प्रेम, श्रद्धा, विश्वास, हिम्मत और कृतज्ञता जैसे सदभावों से जीवनशक्ति पुष्ट होती है।
किसी प्रश्न के उत्तर में ʹहाँʹ कहने के लिए सिर को आगे-पीछे हिलाने से जीवनशक्ति का विकास होता है। नकारात्मक उत्तर में सिर को दायें-बायें घुमाने से जीवनशक्ति कम होती है।
हँसने और मुस्कराने से जीवनशक्ति बढ़ती है। रोते हुए, उदास, शोकातुर व्यक्ति को या उसके चित्र को देखने से जीवनशक्ति का ह्रास होता है।
ʹहे भगवान ! हे खुदा ! हे मालिक ! हे ईश्वर….ʹ ऐसा अहोभाव से कहते हुए हाथों को आकाश की ओर उठाने से जीवनशक्ति बढ़ती है।
धन्यवाद देने से, धन्यवाद के विचारों से हमारी जीवनशक्ति का विकास होता है। ईश्वर को धन्यवाद देने से अंतःकरण में खूब लाभ होता है।
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