यह कथा महाभारत के भीष्म पितामह के अंतिम समय की है, जो जीवन और मृत्यु के बीच उनके अद्भुत दृष्टिकोण को दर्शाती है।
महाभारत के युद्ध के दौरान भीष्म पितामह जख्मी हो गए। वे अर्जुन को बुलाकर बाणों की शैय्या बनाने की बात करते हैं। वे जानते थे कि उनका शरीर दुःखी है, लेकिन उनकी चैतन्य आत्मा में कोई दुःख नहीं था। वे श्री कृष्ण का ध्यान करने लगे।
इसी बीच श्री कृष्ण ध्यान मग्न थे और उन्हें यह महसूस हुआ कि भीष्म पितामह उन्हें याद कर रहे हैं। कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “धर्म में अगर कोई इस समय पारंगत है तो वह भीष्म पितामह हैं। तुम उनके पास जाकर राजधर्म सीखो।”
श्री कृष्ण और पांडवों के साथ भीष्म पितामह के पास पहुंचे। उत्तरायण के दिन, भीष्म ने शरीर छोड़ने की तैयारी की थी। वे भारत के वीर, सर-शैय्या पर पड़े हुए, श्री कृष्ण से कहते हैं, “कन्हैया, तुम मेरे आँखों के पलकों में बसा हो। युधिष्ठिर, तुम कुशल तो हो?”
भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा, “तुम्हारे जीवन में कठिनाइयाँ आईं, वनवास और अज्ञातवास सहना पड़ा। यह सब काल की गति है। जिनके सलाहकार श्री कृष्ण जैसे हों, वे भी संसार के दुःखों से अछूते नहीं रहते। संसार को ‘दुःखालय’ कहा है। धन्य वे लोग हैं, जो संसार के दुःखों से पार पाने के लिए श्री कृष्ण के स्वरूप में मन लगाते हैं।”
भीष्म ने कृष्ण से पूछा, “मैंने ऐसा कौन सा क्रूर कर्म किया कि मुझे बाणों की शैय्या पर सोना पड़ा? मैंने ध्यान किया, 72 जन्मों का विश्लेषण किया, लेकिन मुझे ऐसा कोई घोर कर्म नहीं दिखा जिससे मुझे इतना दुःख भोगना पड़े |”
तब श्री कृष्ण मुस्कुराए और बोले, “पितामह, तुम्हें एक जन्म और पीछे जाकर ध्यान करना चाहिए था। तुम ठीक 73वें जन्म में उस हरे पंख वाले तिड़े को पकड़कर उसको पीड़ा दी थी। उसी कर्म का फल है जो तुम भोग रहे हो। कर्म करना मानव के हाथ में है, लेकिन उसका फल केवल ईश्वर के हाथ में है।”
“कर्म का फल तीन प्रकार का होता है – मंद, तीव्र और तर-तीव्र। मंद प्रारब्ध को भजन और पुरुषार्थ से बदला जा सकता है। तीव्र प्रारब्ध को दूसरे के सहयोग से हटाया जा सकता है, जबकि तर-तीव्र प्रारब्ध को भोगना ही पड़ता है।”
इसी बीच भीष्म ने कृष्ण से कहा, “अब समय आ गया है कि मैं इस शरीर को छोड़ने जा रहा हूँ। केशव, जब तक मैं महाप्रयाण नहीं करूं, तुम मेरे सामने खड़े रहो, मेरी दृष्टि तुम पर बनी रहे।”
भीष्म ने अपनी बुद्धि को कन्या कहा और कहा, “हे श्री कृष्ण, मैं अपनी शुद्ध बुद्धि को तुम्हें अर्पित करता हूँ। यही मेरी कन्या है, जिसे मैंने तप, व्रत, सत्य वचन से शुद्ध किया है। तुम इसे स्वीकार करो।”
यहां भीष्म पितामह ने अपने अंतिम समय में यही उपदेश दिया कि जीवन में राग और द्वेष को छोड़कर, बुद्धि को ईश्वर में अर्पित किया जाए, ताकि आत्मा परमात्मा से मिल सके।
इसके बाद, श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में पांडवों ने भीष्म पितामह का अंतिम संस्कार किया।
इस तरह, यह कथा जीवन, कर्म, और मृत्यु के गहरे अर्थ को स्पष्ट करती है और हमें यह समझाती है कि कर्म का फल कभी न कभी, कहीं न कहीं हमें भोगना ही पड़ता है, लेकिन ईश्वर की उपासना और सही मार्ग पर चलने से हमें मानसिक शांति मिल सकती है। इस सत्संग को महाभारत में “भीष्म-पंचक” कहा गया है | लोग इस समय भीष्म-पंचक व्रत करते है | भक्त मोक्ष की प्राप्ति के लिए उपवास रखते हैं. श्रद्धालु इस दौरान अच्छे स्वास्थ्य और अपने बच्चों के स्वास्थ्य के लिए भी उपवास करते हैं. इस महीने के दौरान सुबह जल्दी स्नान करने से भक्तों को सभी तीर्थ स्थानों में स्नान करने का लाभ मिलता है | इस व्रत का पालन पांच दिनों तक किया जाता है जो एकादशी व्रत के दिन भीष्मदेव को याद करके शुरू होता है और पूर्णिमा के दिन सम्पूर्ण होता है | भीष्म पंचक व्रत के दौरान अनाज खाने से बचना चाहिए और पिछले पांच दिनों में सिर्फ दूध या पानी का सेवन करना चाहिए | भीष्म पंचक को विष्णु पंचक के रूप में भी जाना जाता है |

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