Festival, Special Day, Special Tithi

महाशिवरात्रि


महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना और आत्मशुद्धि का पर्व है। इस दिन व्रत, ध्यान और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र जाप से आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। शिवलिंग अभिषेक, रात्रि जागरण और शिवकथा सुनने से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शिव परिवार का प्रतीकात्मक संदेश समरसता, संतुलन और साधना को दर्शाता है। इस शुभ अवसर पर शिवभक्ति से जीवन में नई चेतना और शक्ति का संचार करें। हर-हर महादेव!

ॐ नमः शिवाय और महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है, जो भगवान शिव की आराधना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए समर्पित है। इस पावन रात्रि में शिव जी की भक्ति करने से आत्मशुद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि और “बम” बीज मंत्र

“बम” शब्द बीज मंत्र है – शिवरात्रि की रात को सवा लाख जप करने से वायु दोष, गठिया बीमारी, मानसिक तनाव आदि दूर हो जाते हैं। शिवरात्रि के दिन “बम बम भोले” का जाप करने से वायु संबंधी बीमारियां समाप्त हो जाती हैं और व्यक्ति की ऊर्जा संतुलित होती है।

ग्रह-नक्षत्रों का योग और आध्यात्मिक प्रभाव :

फाल्गुन मास की अमावस्या को ग्रह नक्षत्रों का विशेष संयोग बनता है, जिससे इस दिन की ऊर्जा अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होती है। यह दिन ध्यान, साधना, और भक्ति के लिए सर्वोत्तम माना जाता है। शिवरात्रि के दिन उपवास और संयम रखने से व्यक्ति का मन और बुद्धि उच्च आध्यात्मिक स्तर पर पहुँचते हैं।

संयम और शिव आराधना का महत्व :

ॐ नमः शिवाय का जाप और संयम रखने से आध्यात्मिक कल्याण होता है। शिवरात्रि का प्रभाव हमारे मन, बुद्धि, और चित्त पर पड़ता है। इस दिन पति-पत्नी को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए, क्योंकि इस दिन सांसारिक कर्म करने से नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है, जिससे जीवन में हताशा, निराशा, और आत्महत्या के विचार उत्पन्न हो सकते हैं।

सनातन संस्कृति की महिमा :

चार प्रमुख प्राचीन संस्कृतियां हैं – मिश्र की संस्कृति, प्राचीन रोम की संस्कृति, चीन की संस्कृति और हिंदुस्तान की सनातन संस्कृति। लेकिन जहां अन्य संस्कृतियाँ विलुप्त हो गईं, वहीं भारतीय सनातन संस्कृति आज भी जीवित है। शिवालयों में आज भी लाखों करोड़ों श्रद्धालु ॐ नमः शिवाय का जाप करते हैं, जिससे भारतीय संस्कृति की जीवंतता का प्रमाण मिलता है।

शिव जी की उपासना और प्रतीकात्मकता :

भगवान शिव को व्यसन भंग का नहीं, बल्कि भुवन भंग का व्यसन है। शिव सृष्टि के ऐसे माली हैं, जो कभी-कभी उथल-पुथल मचाकर नए और सुंदर जगत की रचना करते हैं। शिव जी का वेशभूषा हमें जीवन के गहरे संदेश देती है:

मुंडों की माला – इसका अर्थ है, वे उन्हीं को स्वीकारते हैं जिनके मस्तक में भगवत ज्ञान का प्रकाश हो।

गले में सर्प – यह जीवन की अस्थिरता और माया का प्रतीक है।

शमशान की राख – हमें यह सिखाती है कि यह शरीर नश्वर है और अहंकार त्यागना चाहिए।

त्रिशूल – यह तीन प्रकार के कष्ट (आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक) को दूर करने का प्रतीक है।

कैलाश पर निवास – यह ऊँचे आध्यात्मिक स्तर और मन की स्थिरता को दर्शाता है।

शिव परिवार से जीवन के संदेश :

भगवान शिव का पूरा परिवार हमें जीवन में समता, सहिष्णुता और संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।

शिव जी का वाहन बैल और पार्वती जी का वाहन सिंह – जो प्राकृतिक रूप से शत्रु होते हैं, लेकिन शिव के पास प्रेम और संतुलन में रहते हैं।

गणपति का वाहन चूहा और कार्तिकेय का वाहन मोर – ये एक-दूसरे के स्वाभाविक शत्रु हैं, फिर भी शिव परिवार में समरसता से रहते हैं।

महाशिवरात्रि की पूजन विधि :

व्रत और उपवास – पूरे दिन उपवास रखें या गाय का दूध, सेव फल या अंगूर लें।

शिवलिंग अभिषेक – जल, दूध, दही, शहद, बेलपत्र और गंगाजल से अभिषेक करें।

ॐ नमः शिवाय का जाप – कम से कम 108 बार जाप करें।

रात्रि जागरण – पूरी रात जागकर शिव कथा, मंत्र जाप और ध्यान करें।

बिल्वपत्र चढ़ाना – बिल्वपत्र शिव जी को अत्यंत प्रिय हैं और यह वायु दोष को दूर करता है।

शिवरात्रि के चार प्रमुख रात्रियाँ :

महाशिवरात्रि – यह “अहोरात्रि” कहलाती है।

जन्माष्टमी – इसे “मोहरात्रि” कहा जाता है।

होली – यह “दारुणरात्रि” के रूप में जानी जाती है।

काली चौदस – इसे “कालरात्रि” कहते हैं।

इन चार रात्रियों में ध्यान, संयम और आध्यात्मिक साधना करने से व्यक्ति के मन और बुद्धि का स्तर उच्च केंद्रों पर पहुँच जाता है और जीवन में शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

ॐकार और शिव भक्ति का प्रभाव :

ॐ नमः शिवाय का जाप इच्छित वस्तु को प्राप्त करने और आत्मिक उन्नति के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

रोज 108 बार ॐकार जप करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

दुगुना जप करने वाले को विष्णु पद की प्राप्ति होती है।

तिगुना जप करने वाला साक्षात शिव तत्व में लीन हो जाता है।

आरती और मंदिर दर्शन का महत्व :

मंदिर में प्रवेश कर हाथ ऊपर उठाने से मन और प्राण उच्च स्तर पर जाते हैं। घंटा बजाने से नकारात्मक विचार शांत हो जाते हैं और सद्भावना का संचार होता है। शिव पूजा में प्रयुक्त प्रत्येक वस्तु का विशेष आध्यात्मिक महत्व है।

निष्कर्ष :

महाशिवरात्रि का यह पावन पर्व आत्मशुद्धि, भक्ति, और ध्यान के लिए एक सुनहरा अवसर है। शिवरात्रि के दिन संयम, पूजा और मंत्र जाप करने से आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

महाशिवरात्रि व्रत : 26 फरवरी
निशीथकाल
(रात्रि 12:15 से 1:04 तक)
(प्रहर :- प्रथम : शाम 6:29 से, द्वितीय : रात्रि 9:34 से, तृतीय : मध्यरात्रि 12:39 से, चतुर्थ : 27 फरवरी प्रातः 3:45 से) (पारणा : 27 फरवरी)

आओ, इस महाशिवरात्रि पर ॐ नमः शिवाय का जाप करें और अपने जीवन को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दें।

ॐ नमः शिवाय।

Standard
Biography, Sant Charitra

राजा भरथरी का वैराग्य शतक


Raja Bhartrihari’s Vairagya Shatak: A Spiritual Guide to Letting Go, The Wisdom of Detachment: Exploring Vairagya Shatak, Understanding Life Through Raja, Bhartrihari’s Vairagya Shatak, Letting Go of Desires: Insights from Vairagya Shatak, Finding Peace in Detachment: Lessons from Vairagya Shatak
Raja Bhartrihari’s Vairagya Shatak

राजा भरथरी का वैराग्य शतक: सांसारिक मोह-माया से मुक्ति की प्रेरणा :

राजा भरथरी राजा भर्तृहरि के नाम से भी पहेचाने जाते है । राजा भरथरी का “वैराग्य शतक” भारतीय साहित्य का एक ऐसा अनुपम रत्न है, जिसमें सांसारिक मोह-माया और भौतिक सुखों की अस्थिरता को समझाते हुए वैराग्य का महत्व बताया गया है। इस शतक में सौ श्लोकों का संग्रह है, जो मनुष्य को जीवन के सच्चे अर्थ और परमात्मा की ओर प्रेरित करता है। आइए इस काव्य के प्रमुख संदेशों को सरल शब्दों में समझते हैं।

  1. संसार की नश्वरता :

राजा भरथरी ने अपने श्लोकों में यह समझाया है कि संसार के सभी सुख-दुख, रिश्ते-नाते, धन-दौलत और यश क्षणभंगुर हैं। इन पर अत्यधिक आसक्ति करना व्यर्थ है, क्योंकि अंत में सब कुछ नष्ट हो जाता है।

उदाहरण:
“यह संसार एक सपने की तरह है। जैसे सपना टूटते ही सब समाप्त हो जाता है, वैसे ही जीवन भी अनित्य (अस्थाई) है।”

  1. मोह-माया से मुक्ति :

भरथरी ने यह सिखाया कि मोह और माया मनुष्य को अपने कर्तव्यों और जीवन के वास्तविक उद्देश्य से भटकाते हैं। उन्होंने हमें अपने मन को इन बंधनों से मुक्त करने की प्रेरणा दी।

संदेश:
“जो व्यक्ति मोह के जाल से मुक्त हो जाता है, वही सच्चा सुख और शांति प्राप्त कर सकता है।”

  1. धन और यश का अस्थायित्व

भरथरी के अनुसार, धन और यश किसी के स्थायी साथी नहीं होते। ये चीजें आज किसी के पास हैं तो कल किसी और के पास चली जाती हैं। इन पर अहंकार करना व्यर्थ है।

विचार:
“धन नाशवान है, और यश केवल समय के साथ फीका पड़ जाता है। स्थायी तो केवल आत्मा और परमात्मा का ज्ञान है।”

  1. वैराग्य अपनाने की प्रेरणा

भरथरी ने वैराग्य को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। वैराग्य का अर्थ है, सांसारिक चीजों से मन हटाकर आध्यात्मिक पथ पर चलना। इसका मतलब संसार से भागना नहीं, बल्कि उसके असली स्वरूप को समझना है।

प्रेरणा:
“वैराग्य वह अवस्था है, जब मनुष्य अपने मन को शांत कर लेता है और आत्मा का साक्षात्कार करता है।”

  1. परमात्मा का स्मरण

“वैराग्य शतक” में बताया गया है कि सच्चा सुख केवल परमात्मा की भक्ति और ज्ञान में है। सांसारिक चीजें केवल मन को भटकाती हैं और असली आनंद से दूर करती हैं।

शिक्षा:
“जो व्यक्ति परमात्मा को समझ लेता है, वह संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है।”

निष्कर्ष

भरथरी का “वैराग्य शतक” हमें यह सिखाता है कि सांसारिक मोह-माया और भौतिक सुखों में पड़कर हम अपने जीवन के असली उद्देश्य को भूल जाते हैं। उन्होंने आत्मा, परमात्मा और वैराग्य को जीवन का मार्गदर्शन बताया। इस ग्रंथ में भक्ति, ज्ञान और ध्यान का महत्व प्रमुख रूप से उभारा गया है।

“वैराग्य शतक” सिर्फ एक काव्य नहीं, बल्कि जीवन को समझने और उसके सही अर्थ तक पहुंचने की राह दिखाने वाला मार्गदर्शक है। इसे पढ़कर हमें अपने जीवन के उद्देश्य और आत्मा की शुद्धि पर विचार करने की प्रेरणा मिलती है।

Standard
कथा अमृत, दुर्लभ संवाद, पर्व, Ekadashi, Vrat

भीष्म पंचक


यह कथा महाभारत के भीष्म पितामह के अंतिम समय की है, जो जीवन और मृत्यु के बीच उनके अद्भुत दृष्टिकोण को दर्शाती है।

महाभारत के युद्ध के दौरान भीष्म पितामह जख्मी हो गए। वे अर्जुन को बुलाकर बाणों की शैय्या बनाने की बात करते हैं। वे जानते थे कि उनका शरीर दुःखी है, लेकिन उनकी चैतन्य आत्मा में कोई दुःख नहीं था। वे श्री कृष्ण का ध्यान करने लगे।

इसी बीच श्री कृष्ण ध्यान मग्न थे और उन्हें यह महसूस हुआ कि भीष्म पितामह उन्हें याद कर रहे हैं। कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “धर्म में अगर कोई इस समय पारंगत है तो वह भीष्म पितामह हैं। तुम उनके पास जाकर राजधर्म सीखो।”

श्री कृष्ण और पांडवों के साथ भीष्म पितामह के पास पहुंचे। उत्तरायण के दिन, भीष्म ने शरीर छोड़ने की तैयारी की थी। वे भारत के वीर, सर-शैय्या पर पड़े हुए, श्री कृष्ण से कहते हैं, “कन्हैया, तुम मेरे आँखों के पलकों में बसा हो। युधिष्ठिर, तुम कुशल तो हो?”

भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर से कहा, “तुम्हारे जीवन में कठिनाइयाँ आईं, वनवास और अज्ञातवास सहना पड़ा। यह सब काल की गति है। जिनके सलाहकार श्री कृष्ण जैसे हों, वे भी संसार के दुःखों से अछूते नहीं रहते। संसार को ‘दुःखालय’ कहा है। धन्य वे लोग हैं, जो संसार के दुःखों से पार पाने के लिए श्री कृष्ण के स्वरूप में मन लगाते हैं।”

भीष्म ने कृष्ण से पूछा, “मैंने ऐसा कौन सा क्रूर कर्म किया कि मुझे बाणों की शैय्या पर सोना पड़ा? मैंने ध्यान किया, 72 जन्मों का विश्लेषण किया, लेकिन मुझे ऐसा कोई घोर कर्म नहीं दिखा जिससे मुझे इतना दुःख भोगना पड़े |”

तब श्री कृष्ण मुस्कुराए और बोले, “पितामह, तुम्हें एक जन्म और पीछे जाकर ध्यान करना चाहिए था। तुम ठीक 73वें जन्म में उस हरे पंख वाले तिड़े को पकड़कर उसको पीड़ा दी थी। उसी कर्म का फल है जो तुम भोग रहे हो। कर्म करना मानव के हाथ में है, लेकिन उसका फल केवल ईश्वर के हाथ में है।”

“कर्म का फल तीन प्रकार का होता है – मंद, तीव्र और तर-तीव्र। मंद प्रारब्ध को भजन और पुरुषार्थ से बदला जा सकता है। तीव्र प्रारब्ध को दूसरे के सहयोग से हटाया जा सकता है, जबकि तर-तीव्र प्रारब्ध को भोगना ही पड़ता है।”

इसी बीच भीष्म ने कृष्ण से कहा, “अब समय आ गया है कि मैं इस शरीर को छोड़ने जा रहा हूँ। केशव, जब तक मैं महाप्रयाण नहीं करूं, तुम मेरे सामने खड़े रहो, मेरी दृष्टि तुम पर बनी रहे।”

भीष्म ने अपनी बुद्धि को कन्या कहा और कहा, “हे श्री कृष्ण, मैं अपनी शुद्ध बुद्धि को तुम्हें अर्पित करता हूँ। यही मेरी कन्या है, जिसे मैंने तप, व्रत, सत्य वचन से शुद्ध किया है। तुम इसे स्वीकार करो।”

यहां भीष्म पितामह ने अपने अंतिम समय में यही उपदेश दिया कि जीवन में राग और द्वेष को छोड़कर, बुद्धि को ईश्वर में अर्पित किया जाए, ताकि आत्मा परमात्मा से मिल सके।

इसके बाद, श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में पांडवों ने भीष्म पितामह का अंतिम संस्कार किया।

इस तरह, यह कथा जीवन, कर्म, और मृत्यु के गहरे अर्थ को स्पष्ट करती है और हमें यह समझाती है कि कर्म का फल कभी न कभी, कहीं न कहीं हमें भोगना ही पड़ता है, लेकिन ईश्वर की उपासना और सही मार्ग पर चलने से हमें मानसिक शांति मिल सकती है। इस सत्संग को महाभारत में “भीष्म-पंचक” कहा गया है | लोग इस समय भीष्म-पंचक व्रत करते है | भक्त मोक्ष की प्राप्ति के लिए उपवास रखते हैं. श्रद्धालु इस दौरान अच्छे स्वास्थ्य और अपने बच्चों के स्वास्थ्य के लिए भी उपवास करते हैं. इस महीने के दौरान सुबह जल्दी स्नान करने से भक्तों को सभी तीर्थ स्थानों में स्नान करने का लाभ मिलता है | इस व्रत का पालन पांच दिनों तक किया जाता है जो एकादशी व्रत के दिन भीष्मदेव को याद करके शुरू होता है और पूर्णिमा के दिन सम्पूर्ण होता है | भीष्म पंचक व्रत के दौरान अनाज खाने से बचना चाहिए और पिछले पांच दिनों में सिर्फ दूध या पानी का सेवन करना चाहिए | भीष्म पंचक को विष्णु पंचक के रूप में भी जाना जाता है |

Standard