“इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ ! इन गंदे अंगों के पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ !”

vemna, detachment, renunciation

Rishi Vemna

आंध्र प्रदेश में एक धनाढय सेठ का छोटा पुत्र वेमना माता-पिता की मृत्यु के बाद अपने भैया और भाभी की छत्रछाया में पला-बढ़ा। उसकी भाभी लक्ष्मी उसे माँ से भी ज्यादा स्नेह करती थी। वह जितने रूपये माँगता उतने उसे भाभी से मिल जाया करते। बड़ा भाई तो व्यापार में व्यस्त रहने लगा और छोटा भाई वेमना खुशामदखोरों के साथ घूमने लगा। उनके साथ भटकते-भटकते एक दिन वह वेश्या के द्वार तक पहुँच गया। वेश्या ने भी देखा कि ग्राहक मालदार है। उसने वेमना को अपने मोहपाश में फँसा लिया और कुकर्म के रास्ते चल पड़ा।

अभी वेमना की उम्र केवल 16-17 साल की ही थी। वेश्या जो-जो माँगें उसके आगे रखती, भाभी से पैसे लेकर वह उन्हें पूरी कर देता। एक बार उस वेश्या ने हीरे-मोतियों से जड़ा हार, चूड़ियाँ और अँगूठी माँगी।

वेमना उस वेश्या के मोहपाश में पूरी तरह बँध चुका था। उसने रात को भाभी के गहने उतार लिये। भाभी ने देख के अनदेखा कर दिया। कुछ दिनों बाद वेमना ने भाभी का मँगलसूत्र उतारने की कोशिश की, तब भाभी ने पूछाः “सच बता, तू क्या करता है ? पहले के गहने कहाँ गये ?” सच्चाई जानकर भाभी रो पड़ी। सोचने लगी कि ‘इतनी सी उम्र में ही यह अपना तेज बल सब नष्ट कर रहा है।’

किंतु भाभी कोई साधारण महिला नहीं थी, सत्संगी थी। उसने देवर को गलत रास्ते जाने से रोकने के लिए डाँट-फटकार की जगह विचार का सहारा लिया और देवर के जीवन में भी सदविचार आ जाय – ऐसा प्रयत्न किया। उसने एक शर्त रखकर वेमना को जेवर दियेः

“बेटा ! वह तो वेश्या ठहरी। तू जैसा कहेगा, वैसा ही करेगी। उसे कहना कि ‘तू नग्न होकर सिर नीचे करक और अपने घुटनों के बीच से हाथ निकालकर पीछे से ले, तब मैं तुझे गहने दूँगा।’ जब वह इस तरह तेरे से गहने लेने लगे तब तू काली माता का स्मरण करके उनसे प्रार्थना करना कि हे माँ ! मुझे विचार दो, भक्ति दो। मुझे कामविकार से बचाओ।”

दूसरे दिन वेमना की शर्त के अनुसार जब वेश्या गहने लेने लगी, तब वेमना ने माँ काली से सदबुद्धि के लिए प्रार्थना की। भाभी की शुभ भावना और माँ काली की कृपा से वेमना का विवेक जाग उठा कि ‘इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ। इन गंदे अंगों पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ….’ यह विचार आते ही वेमना तुरन्त गहने लेकर भाभी के पास आया और भाभी के चरणों में गिर पड़ा। भाभी ने वेमना का और भी मार्गदर्शन किया।

वेमना मध्यरात्रि में ही माँ काली के मंदिर में चला गया और सच्चे हृदय से प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर माँ काली ने उसे योग की दीक्षा दे दी और माँ के बताये निर्देश के अनुसार वह लग गया योग-साधना में। उसकी सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होने लगीं और कुछ सिद्धियाँ भी आ गयीं। अब वेमना वेमना न रहा, योगिराज वेमना होकर प्रसिद्ध हो गया। उनके सत्संग से ‘वेमना योगदर्शनम्’ और ‘वेमना तत्त्वज्ञानम्’ – ये दो पुस्तकें संकलित हुई। आज भी आंध्र प्रदेश के भक्त लोग इन पुस्तकों को पढ़कर योग और ज्ञान के रास्ते पर चलने की प्रेरणा पाते हैं।

कहाँ तो वेश्या के मोह में फँसने वाला वेमना और कहाँ करूणामयी भाभी ने सही रास्ते पर लाने का प्रयास किया, माँ काली से दीक्षा मिली, चला योग व ज्ञान के रास्ते पर और भगवदीय शक्तियाँ पा लीं, भगवत्साक्षात्कार कर लिया एवं कइयों को भगवान के रास्ते पर लगाया। कई व्यसनी-दुराचारियों के जीवन को तार दिया। जिससे वे संत वेमना होकर आज भी पूजे जा रहे

Satsang

भोगों से वैराग्य

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स्वास्थय की कुंजियाँ

अच्युताय कमरकस


अच्युताय कमरकस (Achyutaya kamarkas)
(एक दिव्य औषधि)

कमरकस वृष्य,बल्य व अस्थिसंधानक है।यह हड्डीयों को मजबूत बनाता है।वीर्य को पुष्ट करता है।स्वप्नदोष अथवा प्रदररोग के कारण आयी हुई दुर्बलता,क्षीणता,नपुंसकता व कमरदर्द मे लाभदायी है ।

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स्वास्थय की कुंजियाँ

घर-घर में पहुँचाओ स्वास्थ्य का खजाना


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आजकल देश विदेश में कई जगहों पर मरीज को जरा-सा रोग होने पर भी लम्बी जाँच पड़ताल और अकारण ऑपरेशन करके व लम्बे बिल बनाकर गुमराह करके लूटा जाता है। जिससे समाज की कमर ही टूट गयी है। वैद्यक क्षेत्र से सम्बन्धित इन लोगों के कमीशन खाने के लोभ के कारण मरीज तन, मन और धन से भी पीड़ित हो रहे हैं। कई मरीज बापूजी के पास रोते-बिलखते आते हैं कि लाखों रुपये लुट गये, दुबारा-तिबारा ऑपरेशन करवाया, फिर भी कुछ फायदा नहीं हुआ। स्वास्थ्य सदा के लिए लड़खड़ा गया। बापूजी ! अब…..

पूज्य बापू जी व्यथित हृदय से समाज की दुर्दशा सुनी और इस पर काबू पाने के लिए आश्रम द्वारा कई चल चिकित्सालय एवं आयुर्वैदिक चिकित्सालय खोल दिये। आश्रम द्वारा औषधियों का कहीं निःशुल्क तो कहीं नाममात्र दरों पर वितरण किया जाने लगा। परंतु इतने से ही संत हृदय कहाँ मानता है ? स्वास्थ्य का अनुपम अमृत घर-घर तक पहुँचे, इस उद्देश्य से लोकसंत पूज्य बापू जी ने आरोग्य के अनेकों सरल उपाय अपने सत्संग-प्रवचनों में समय-समय पर बताये हैं। जिन्हें आश्रम द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं ‘ऋषि-प्रसाद’ व ‘दरवेश-दर्शन’ तथा समाचार पत्र ‘लोक कल्याण सेतु’ में समय-समय पर प्रकाशित किया गया है। उनका लाभ लाखों करोड़ों भारतवासी और विदेश के लोग उठाते रहे हैं।

ऋतुचर्या का पालन तथा ऋतु-अनुकूल फल, सब्जियाँ, सूखे मेवे, खाद्य वस्तुएँ आदि का उपयोग कर स्वास्थ्य की सुरक्षा करने की ये सुन्दर युक्तियाँ संग्रह के रूप में प्रकाशित करने की जन जन की माँग आरोग्यनिधि-2 के रूप में साकार हो रही है। आप इसका खूब-खूब लाभ उठायें तथा औरों को दिलाने का दैवी कार्य भी करें। आधुनिकता की चकाचौंध से प्रभावित होकर अपने स्वास्थ्य और इस अमूल्य रत्न मानव-देह का सत्यानाश मत कीजिए।

आइये, अपने स्वास्थ्य के रक्षक और वैद्य स्वयं बनिये। अंग्रेजी दवाओं और ऑपरेशनों के चंगुल से अपने को बचाइये और जान लीजिए उन कुंजियों को जिनसे हमारे पूर्वज 100 वर्षों से भी अधिक समय तक स्वस्थ और सबल जीवन जीते थे।

इस पुस्तक का उद्देश्य आपको रोगमुक्त करना ही नहीं, बल्कि आपको बीमारी हो ही नहीं, ऐसी खान-पान और रहन-सहन की सरल युक्तियाँ भी आप तक पहुँचाना है। अंत में आप-हम यह भी जान लें कि उत्तम स्वास्थ्य पाने के बाद वहीं रुक नहीं जाना है, संतों के बताये मार्ग पर चलकर प्रभु को भी पाना है…. अपनी शाश्वत आत्मा-परमात्मा को भी पहचानना है।

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Bapuji, Bhajan

जोगी का ज्ञान करें है नित्य उजाला सतत सभी के हृदय में ….


सूर्य करें है दिन में उजाला, चाँद करें है रात में, जोगी का ज्ञान करें है नित्य उजाला सतत सभी के हृदय में ….

Hami se hai jamana 45

जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में…..
जोगी रे क्या जादू है तेरे प्यार में… जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे ज्ञान में…
सौभाग्य से मिले ये जोगी, सबको धन्य किया है।
शांति, प्रेम और ज्ञान का, अमृत, हमने यहीं पिया है।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे जोग में…
दूर भगाकर सारी उदासी, सबको प्रसन्नता देते।
तन-मन पुलकित कर देते, बदले में कुछ नहीं लेते।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में….
दुर्बलता कायरता मिटाकर, हमको वीर बनाते।
बल के भाव हैं भीतर भरते, हर विपदा को हटाते।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे ज्ञान में….
जोगी के दर पे हम आये, भाग्य हमारा जागे।
दर्शन करके इस जोगी के, शोक दुःख सब भागे।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे जोग में…..
जब-जब मेरा जोगी झूमे, लगे है सावन आया।
मुरझाये दिल खिल जाते हैं, वसंत जैसे छाया।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में….
बड़ा सलोना जोगी मेरा, मनभावन और पावन।
जब भी आये लगे है जैसे, खुशियों का हो सावन।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे ज्ञान में….
चिंता शोक न तनिक रहे यहाँ, ऐसी आभा इनकी।
शरण जो आये दरस जो पाये, बदली दुनिया उनकी।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे जोग में….
जोगी की संगति में आकर, ऊँचा धन है पाया।
कोई इसको छुड़ा न पाये, शाश्वत रंग लगाया।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में….
सूर्य करे है दिन में उजाला, चाँद करे रातों में।
जोगी ज्ञान का करे उजाला, सतत सभी के दिलों में।।
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे ज्ञान में….
जोगी रे क्या जादू है तुम्हरे प्यार में…..

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