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भगवद् ज्ञान, शांति, लाभ कैसे मिले? Part 2


लेकिन सुगन्धित पानी पीना हो, जिसमें डी.डी.टी पड़ती है, पेप्सी, कोका ये वो, तो ७-८ रुपये लगाओ, पेट को, दिमाग को और बुद्धि को तामसी बनाओ और उससे भी ज्यादा पैसा खर्चो ब्रांडी के लिए । घर से निकलते हो तो भोजन का टिफ़िन बना कर निकलते हो, पानी घर से नहीं ले जाते हो स्टेशन पर पानी मिलता है, भोजन से जीवन में पानी ज्यादा ज़रूरी है लेकिन सहज में मिलता है । भोजन से और पानी से श्वास ज्यादा ज़रूरी है उसके लिए न टिफ़िन भरते हो, न वाटर बैग लेते हो सहज में मिलता है । ऐसे ही परमात्मा का सुख सहज में है, परमात्मा का ज्ञान सहज में है, परमात्मा का माधुर्य सहज में है लेकिन अभागी नादानी, नासमझी ये मिले, ये मिले, मैं सी.ए. हो जाऊं । हो गए सी.ए., जॉब मिल जाए, मिल गयी जॉब फिर क्या ? मैरिज (शादी) हो जाये, हो गयी, बच्चे हो जाएँ, हो गए, फिर क्या ? बुढ़ापे में कुछ नहीं मर जायें तो अच्छा है, तो बेवकूफ मरने के लिए जीवन थोड़े था ! जीवन दाता का ज्ञान पाकर अपना नकली ‘मैं’ छोड़कर असली ‘मैं’ में मिलना था ।

bapuji-vigrah_3     कल मैंने बताया था कि जब तक सद्गुरु नहीं मिलते तब तक भगवान की शरण ली जाती है और ५ भगवान जो हैं, बड़े उदार हैं, बड़े दयालु हैं, बड़े हितैषी हैं, बड़े त्यागी हैं । भगवान विष्णु और उनके अवतार, भगवान शिव, गणपति, सूर्य और आद्यशक्ति, इनकी उपासना पूजा करोगे तो संसारी स्वार्थ से करोगे तो वो चीज़ें पाने के लिए भटक-भटक के थोड़ी बहुत मिलेगी लेकिन उनके साथ प्रीति करते हो कि बस हमारा जिसमें मंगल हो, प्रभु ! आप वो ही कृपा करना तो वो इष्ट देव आपको संत के द्वार पहुँचा देंगे । आपने इन ५ देवों में से किसी न किसी देवता की उपासना की है अथवा तो गॉड देवता मानकर, अल्ला को देवता मानकर कुछ न कुछ सत्कर्म किया है उसी का फल है कि आप संत के द्वार आ गए ।

प्रचेताओं की कथा –

इष्टदेव आपको प्रेरणा देते हैं, रक्षा करते हैं लेकिन इष्टदेव बहुत प्रसन्न होंगे तो प्रचेताओं को कहा शिवजी ने कि तुमको नारायण स्तवन का मंत्र मैं देता हूँ, नारायण तुमको मिलेंगे । साधना किया और भगवान नारायण मिले, नारायण भगवान ने कहा कि राजकुमारों दसों के दस भाई, पिता राज्य दे रहे थे न लेकर तुमने शिवजी का दर्शन किया, हमारा दर्शन किया अब तुमको जो चाहिए माँग लो । जैसे मारवाड़ में, मरू भूमि में वृक्ष होना कठिन है ऐसे ही जवानी में विवेक-वैराग्य होना कठिन है और तुम्हारे को है विवेक । ऐश-आराम छोड़कर, राज्य का दिखावटी सुख छोड़कर इष्ट के दर्शन करने में सफल हुए हो तो तुमको जो अभिष्ट हो मांग लो । प्रचेताओं ने कहा कि “प्रभु ! बच्चा जैसे अपनी मति से मांगता है तो ठगा जाता है, खिलोने मांग लेगा, चॉकलेट मांग लेगा और कुछ मांग लेगा । हम बालक बुद्धि के हैं, हमारा जिसमें परम हित हो और आप जिसको परम उत्कर्ष मानते हों, आपकी नज़र में जो परम श्रेष्ठ हो, परम हितकारी हो और जिसको पाने के बाद पाना न रहे, जानने के बाद जानना न रहे और जिसमें स्थित होने के बाद बड़े भारी दुःख से भी आदमी प्रभावित न हो, ऐसी कोई सर्वोपरि चीज़ जो आपकी नज़र में सर्वोपरि है वो ही हमको देने की कृपा करें ।” भगवान नारायण विशेष प्रसन्न हुए कि प्रचेताओं तुम्हारी बुद्धि धन्य है ! सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ तो अपने आत्मदेव को जानना है जिससे भगवान ब्रह्मा, ब्रह्मा हैं, विष्णु विष्णु हैं, शिव शिव हैं, तुम तुम हो और हम हम हैं, जो सबका सार सदा मौजूद है । दुःख सदा मौजूद नहीं है, सुख सदा मौजूद नहीं हैं, बचपन मौजूद नहीं है, जवानी मौजूद नहीं है लेकिन उसको जानने वाला सदा मौजूद है । मैं मैं जहाँ से उठती हैं, उस आत्मदेव को जानने के लिए तुमको देवऋषि नारदजी का सत्संग मिलेगा, ये मैं आशीर्वाद देता हूँ । देवऋषि नारदजी का सत्संग मिलने का भगवान ने आशीर्वाद दिया । शिवजी ने दर्शन दिया, विष्णुजी ने दर्शन दिया और बाद में परम कल्याण के लिये नारदजी का सत्संग मिलने का आशीर्वाद मिला । वहां तक तो तुम पहुँच गए हो, अब नारदजी नहीं तो बापूजी लेकिन है तो सत्संग वही तत्वज्ञान का । अब छोटी-मोटी चीज़ों में उलझने की गलती न करो, बस ।

शुकदेवजी महाराज की पूजा करके सोने की चौखट में चरण धोकर, अर्घ्यपात्र से पूजन करके राजा परीक्षत ने हाथ जोड़ कर स्तुति की, मौन खड़े रहे तो ‘राजन ! कुछ पूछना चाहते हो ?’ बोले, जी प्रभु ।

मनुष्य को जीवन काल में क्या जान लेना चाहिए और मृत्यु नज़दीक हो तो क्या करना चाहिए ?

शुकदेवजी ने कहा तुमने ऊँचे में ऊँची बुद्धि की पराकाष्ठा का परिचय दिया है ।

तस्मात् सर्व आत्मन: राजन हरि अभिधीयते ।

श्रोतव्य कीर्तितव्यश्च स्मृतव्यो भगवत गणम ।।

    भगवान का ज्ञान पा लेना चाहिए, भगवान के गुण गान करना चाहिए, भगवान की कीर्ति में अपने दिल को, अपने मन को तदाकार करना चाहिए । और मृत्यु नज़दीक आये तो शरीर को मैं मानने की गलती छोड़ना चाहिए । मरने वाला शरीर मरेगा तुम अमर हो, बीमार शरीर होता है लेकिन बेवकूफ बोलते हैं मैं बीमार हूँ, दुःख मन में आता है निगुरे बोलते हैं मैं दुखी हूँ । चिंता चित्त में आती है बावरे बोलते हैं मैं चिंतित हूँ, ये सब प्रकृति में होता है, तुम आत्मा हो, परमात्मा के सनातन सपूत हो, इसको जान लो । ये जगत स्वप्ना है देखते-देखते बदल रहा है लेकिन फिर भी जो नहीं बदलता है वो अपना आपा अपना है ।

उमा कहूँ मैं अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब स्वप्ना ।

    ये जगत स्वप्ने जैसा है लेकिन निगुरों को सच्चा लगता है, ठोस लगता है इसलिए टेंशन-टेंशन-टेंशन, स्वप्ने के जगत को सच्चा मान के टेंशन के शिकार हो रहे हैं । टेंशनों (चिंताओं) की दावा एलोपेथी वालों के पास नहीं है । शारीरिक टेंशन, मानसिक टेंशन, बौधिक टेंशन, हाँ नींद की गोली देंगे पड़े रहो, तन्द्रा में, पक्की नींद नहीं आती । पेन किलर (दर्द निवारक गोलियाँ) देंगे, बदमाशी का नाम है पेन किलर, पेन (दर्द) तो नहीं मरता पेन की खबर देने वाले कई सेलस (कोशिकाएं) मर जाते हैं और कई सेलस मूर्छित हो जाते हैं, फिर पेन होने लगता है । क्या ख़याल है, बात सच्ची लगती है ! पेन किलर्स के चक्कर में मत आओ । ये टेंशन तुमको देखकर टेंशन में आ जाये, शारीरिक, मानसिक, बौधिक, भगवद ज्ञान पा लो । भगवद शांति पा लो, भगवद लाभ पा लो ।

भगवद्ज्ञान, भगवद्शांति, भगवद्लाभ कैसे मिले ?

जिनको भगवद शांति लाभ मिला है ऐसे पुरुषों का संग करो । ऐसे पुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ो, ऐसे पुरुषों को आदर्श मानकर, ऐसे पुरुषों के सिद्धांत में अपने मन को चलाओ और भगवान का ज्ञान पा लो तो भगवान कैसे हैं ? सब शास्त्रों में खोजकर भगवान की एड्रेस ले लो तो तुम्हारी मर्ज़ी नहीं तो हमने खोज-खोज के जितना भी खोज सके, एक छोटा-सा पुस्तक तैयार किया है । ब्रह्माजी भगवान की स्तुति करते हैं प्रभु ! आप ऐसे हैं, ऐसे हैं । नारदजी स्तुति करते हैं, प्रह्लाद्जी करते हैं । धृतराष्ट्र करते हैं जिन-जिन को परमात्मा का साक्षत्कार हुआ है उन्होंने परमात्मा के विषय में वर्णन किया है । आपको तैयार माल मिलता है, ‘नारायण स्तुति’ पुस्तक पढ़ते जाओ, जैसे भगवान हैं स्वीकार करते जाओ । तो आपके हृदय में जल्दी भगवद्ज्ञान प्रकट हो जायेगा । दूसरा ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तक को पढ़ो तो जो जगत के तरफ आकर्षण होने के कारण जीव न करने जैसे कर्म करता है और बंधनों में पड़ता है उससे बच जाओगे । ‘ईश्वर की ओर’, ‘नारायण स्तुति’ और ‘जीवन विकास’ पुस्तक पढ़ें, ये इस गुरु पूनम पर साधकों के लिए पैकेज है पैकेज । जैसे दसवी वाला ग्यारहवीं में और ग्यारहवीं वाला बारहवीं, बारहवीं वाला कॉलेज में जाता है, ऐसा ये जम्प है ।

श्रावणी पूनम ब्राह्मणों के लिए, दशहरा क्षत्रियों के लिए, दिवाली बनियों के लिए, होली चारों वर्णों के लिए लेकिन ये गुरु पूनम तो चारों वर्णों के लिए और देवता ब्रहस्पति गुरु का पूजन करते हैं गुरु पूनम पर, दैत्य शुक्राचार्य का पूजन करते हैं और भगवान कृष्ण और राम अपने गुरुओं का पूजन करते हैं, वो आज गुरु पूर्णिमा है । लघु को गुरु बना दे । लघु चीज़, लघु वस्तु, लघु ‘मैं’ में उल्झे हुए को गुरु तत्व में जगा दे, गुरु ज्ञान में जगा दे, इस गुरु पूनम के निमित्त ये कार्यक्रम में जो आये हैं उनको जो पुण्य होता है उसके आगे हज़ार तीर्थ करने का फल क्या है, लाख तीर्थ करने का फल क्या है ? सेंकडों एकादशी का व्रत अच्छा है, सत्संग की तुलना कौन कर सकता है ?

तीर्थ नहाये एक फल, संत मिले फल चार ।

सतगुरु मिले अनंत फल कहत कबीर विचार ।।

    जिसने सत्संग तीर्थ में गोता मार लिया उसने तो अरसठ तीर्थ कर लिए । अरसठ तीर्थ गुरूजी ना चरणे, गुरूजी नी चरण रज उड़ी-उड़ी लागे । मोहे अंग बेनुड़ी मने भाग्ये मिलो सत्संग ।। जिसको सत्संग रुपी तीर्थ में गोता मारने का अवसर आ गया वो कुम्भ के तीर्थ में काहे को दौड़-धुप करेगा ! जिसको सत्संग रुपी तीर्थ में अवगाहन करने का अवसर आ गया वो काशी और मथुरा के तीर्थ में क्यों धक्के खायेगा ?

घरमा छे काशी ने घरमा मथुरा, घरमा छे गोकुलियो गाँव रे ।

मारे नथी जाऊं नथी जाऊं तीरथ धाम रे ।।

अरसठ तीर्थ गुरूजी ना चरणे, गुरूनी चरण रज उड़ी-उड़ी लागे मोहे अंग ।

  बेनुड़ी मने भाग्ये मिल्यो सत्संग ।। —मीरा बाई

    सत्संग में ये द्रण निश्चय कर लो कि अब ज़रा से दुःख से हम दुखी हो जायें वो दिन गए । दुखाकार वृत्ति से जुड़ते हैं तो दुखी हैं, वृत्ति आती है चली जाती है, सुखाकार वृत्ति से जुड़कर अभिमान करते हैं तो हम सुखी हैं । लेकिन वास्तव में तो हम हैं अपने आप हर वृत्ति के बाप । दुखद वृत्ति आई-गयी, सुखद वृत्ति आई गयी, मूर्ख बच्चे जैसे खिलोनों में उलझते हैं ऐसे ही मूर्ख जनता सुख-दुःख की वृत्तियों में उलझती है । अब हम सत्संगी हुए हैं, ये वृत्तियाँ तो होती रहेंगी, तरंग तो उठते रहेंगे लेकिन पानी की गहराई ज्यों की त्यों है । ऐसे ही सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मरण ये सब खेल तो होता रहेगा लेकिन उसको जानने वाला आत्मदेव ज्यों का त्यों है । आप तो धन्य हो जाओगे, आपकी मीठी नज़र जिन पर पड़ेगी वो भी धनभागी हो जायेंगे ।

स तरति लोकान् तारयति ।

    वो तर जायेंगे, दूसरों को तारने वाले हो जायेंगे । तो व्यास पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा, आषाणी पूर्णिमा का पर्व मनुष्यों के लिए, देवताओं के लिए, दैत्यों के लिए और भगवान के लिए महत्वपूर्ण है । गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आत्म शांति पाना, लेकिन जिनको प्रसिद्धि चाहिए, चलो रक्त दान करो, फलाना करो, कैसे भी स्टंट करके प्रसिद्ध हो जाओ, भक्तों का खून बांटो ।

अपने अंगों का दान न करें –

नेत्र दान करो, रक्त दान करो, रामसुखदास जी बोलते हैं शास्त्रों में मना किया हुआ है कि प्रकृति के दिए हुए अंग आप ज्यों के त्यों प्रकृति को सौंप दें । नेत्र दान करके जायेंगे, किडनी दान करेंगे, वो करेंगे, उसी नेत्र से वो दुराचार करेगा तो क्या करोगे ? अब इतने नेत्रों वाले हैं तो उन्होंने क्या झक-मार लिया, जो तुम्हारे दो नेत्र प्रकृति के नीयम के विरुद्ध तुम निकलवा के बड़े दानी बनते हो । ईश्वर को और प्रकृति को अपना मैं दान कर दो न ! प्रकृति के कायदे के विरुद्ध क्यों जाते हो ? प्रकृति के कायदे को क्यों तोड़ते हो ? दे डालोगे तो दूसरे जन्म में नेत्र विहीन प्राणी बनोगे तब तौबा हो जाएगी ! रामसुखदास महाराज ने शास्त्रों का उदाहरण दिया कि अपने अंगों का दान नहीं करना, अपने अंग, मेरी किडनी इसको दे दो, मेरा इसको ये दे दो, वो दे दो । हाँ किडनी वाले को किडनी ठीक करने के लिए पुनर्नवा खिलाओ । कल आये थे एक भक्त, उनको डॉक्टरों ने डायेलेसिस करवाने को कहा, पहले ८-८ होती थी फिर ४-४ होने लगी अब ठीक हो गए । पुनर्नवा पौधा है, उसके रस से बनती हैं गोलियाँ, पुनर्नवा को सातोड़ी बोलते हैं, साका भी बोलते हैं, वो खाओ खिलाओ, ठीक हो जाओगे । एक मंत्र है हार्ट अटैक कभी नहीं होगा, बाय-पास सर्जरी कभी नहीं करना । अपने पास है हृदय सुधा, २-२ चम्मच पियो ब्लॉकेज खुल जाता है और सस्ते में मिलता है, अथवा दूसरे घरेलु उपास हैं । सीजरिन नहीं कराना चाहिए, गाय के गोबर का रस १० ग्राम दे दो, अपने आप प्रसूति होगी । बच्चा अन्दर कमज़ोर है, मर जायेगा, ये है वो है, डरा डरा के एबॉर्शन कराते हैं, ऐसे लोभियों के चक्कर में मत आओ । जितना दूध पीते हैं, ४०० ग्राम पीते हैं तो २०० पानी डाल दो, घर में जो सोने की अंगूठी या जो कुछ सोने का हो वो डाल दो उबालने को धो के अथवा चांदी का, उबलते-उबलते पानी सूख जाए वो ही दूध गर्भवती पिए । एक-आध खजूर डाल के उबालो, एक-आध चम्मच घी डाल दो, अपने आप बच्चा और माँ पुष्ट होगी । नारियल और मिश्री चबा के खाए, बुढ़ापा भी दूर रहे, नारंगी खाये बुढ़ापे की झुर्रियां दूर रहें, नारियल खाए, नारंगी खाए, बच्चा भी ठाक, माँ भी ठीक, बाप भी ठीक ।

ॐ….हरि ॐ…लम्बा श्वास लो, गहरा-गहरा-गहरा, ॐ…(कंठ से) २ बार ऐसा रोज़ करने से हाइपो थायराइड, हाइपर थायराइड होगा नहीं, है तो नियंत्रित रहेगा और सुख-दुःख में सम रहने का आपका आत्म बल बढेगा । फिर से गहरा श्वास लो ॐ…(कंठ से) । नशा पिला के गिरा दे ये तो सबको आता है साकी, लेकिन गिरते हुए को जगा दे, सम्हाल दे वो तो कोई संत महापुरुष का ही काम है । वाहवाही का नशा, धन का नशा, सत्ता का नशा, न जाने क्या-क्या नशा, जिसमें शांति नहीं है, सूझ-बूझ नहीं है वो नशा है । नशे में तो एक दूसरे को उल्लू बनाते रहते हैं । जहाज़ में भी बैठो तो तुम्हारे जहाज़ के कप्तान, फलाने जहाज़ में कमांडर हैं, कप्तान समझता है कि मेरा नाम हो रहा है लेकिन किसी कप्तान का नाम आज तक मेरे दिमाग में नहीं आया, हर जहाज़ में कप्तानों का नाम बोलते हैं । सेविकाओं का नाम बोलते हैं, सेविकाएँ समझती हैं कि हमारा नाम हो रहा है, वो उसी में बिचारे उल्लू होते रहते हैं । नशा पिला के गिराना तो सबको आता है लेकिन गिरते हुए को होश दे के सम्हालना ये सत्पुरुषों का काम है । नारायण हरि हरि ॐ हरि । मैं पक्का कहता हूँ, मैंने तो जहाज़ की कितनी मुसाफिरी की, महीने में लगभग १०-१५ बार, २० बार जहाज़ में बैठना होता है । आज तक किसी कैप्टन का, किसी कप्तान का, किसी परिचारिका का नाम मेरे स्मरण में नहीं है लेकिन वो सब हवा में रहते हैं कि अपना नाम होगा पायलट बनेंगे तो, उल्लू बन जाते हैं बिचारे । और नाम सच्चा भी नहीं है, जन्म के बाद रखा गया था ।

मान पुड़ी है ज़हर की खाए सो मर जाए । चाह उसी की राखता वो भी अति दुःख पाये ।।

गुरुजी के संकेत की अवहेलना का फल –

दादू दीन दयाल के शिष्य थे केशवदास और गुरु के संकेत में क्या चमत्कार होता है ! दीन दयाल का सेवक जैसे यहाँ रसोड़ा सम्हालने वाले हैं न…शैलेन्द्र और वासु, ऐसा उनका कोई था शैलेन्द्र वासु, उसका नाम था केशवदास । मिट्टी के चूल्हे बनते हैं उसमें लकड़ियाँ डालते हैं रसोई में, तो चूल्हे की मिट्टी थोड़ी गिर गयी थी, चूल्हा थोड़ा टूट गया था । भोजन तो पूरा हो गया दोपहर का, केशवदास ने

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भगवद् ज्ञान, शांति, लाभ कैसे मिले? Part 3


देखा कि शाम का भोजन बने उसके पहले मिट्टी ले आऊं और चूल्हा ठीक कर लूँ तो धीरे से मिट्टी लेने जा रहे थे । दादू दीन दयाल जी ने कहा कि ‘एऽ केशव कहाँ जा रहा है ?’ बताया कि ऐसे मिट्टी लेने जा रहा हूँ । ‘नहीं जाना बैठ जाओ, अभी नहीं जाना है ।’, अब देखो आप जो करना चाहते हैं गुरुजी वो रुकवा देते हैं और जो नहीं करना चाहते और नहीं जानते, वो गुरूजी आपको ज़बरन दे देते हैं, कल की कथा से । हम जो करना चाहते थे वो गुरूजी ने छीन लिया, भगवान ठाकुरजी पूजा-वूजा और हम जो नहीं चाहते थे वो खज़ाना हुमोक गुरूजी ने दे दिया । गुरु की पहुँच और सूझ-बूझ के आगे हम बबलू हैं सब । दादू जी ने कहा ‘नहीं जाओ केशव छोड़ो, केशव वापिस आ के बैठ गया ।’ केशव ने देखा कि गुरूजी अब उधर चले गए तो धीरे-से खिसक गया, किसी को पता न चले । चश्मेबद्दूर, साईं है भरपूर, लेकिन नज़र छुपा के वापिस केशव खिसक गया । खिसक गया और ज्यों मिट्टी लेने गया ज़रा-सा हिला न ढुला, पूरी की पूरी मिट्टी की परात केशव पर पड़ी और केशव मर गया । गुरूजी तक ख़बर पहुंची, गुरूजी ने बोला हमने मना किया था नहीं जाना, केशव था ? बोले हाँ, गया । चलो अब उसका शरीर उधर ही पहाड़ी पर रख दो, गीध और जीव-जंतु खा लेंगे । ६ प्रकार की देह त्याग की विधि होती है, जल में छोड़ देते हैं या तो जीव-जंतुओं के लिए छोड़ देते हैं या तो जला देते हैं या तो दफना देते हैं । गुरु की नज़र छुपा के गया और मिट्टी की दरार गिरी, वहीँ पूरा हो गया । केशवदास शिष्य चूल्हे की मिट्टी में कुत्ते की मौत मर गया।

bapuji-vigrah_2वेद बंधू नाम का एक तपस्वी खूब साधना करता था, लेकिन कुछ अनुभव नहीं हुआ, बड़ा छटपटाया । नवरात्रि का उपवास किया, व्रत के दिनों में सातवें दिन सर्प आ गया, भक्ति भाव वाला था वेद बंधू, सर्प को दूध दिया । दूध पी के सर्प शांत हो जाता, नवरात्रि के नौ दिन तो पूरे हुए, दसवे दिन कुटिया में प्रकाश-प्रकाश हुआ । उस प्रकाश में कोई अजगेबी आदमी प्रकट हुआ । उस अजगेबी आदमी ने कहा संस्कृत में – कैवल्यं प्राप्स्यसि । तुम्हे कैवल्य की प्राप्ति होगी, मोक्ष की । वो अजगेबी पुरुष और कोई नहीं था भगवान वेद व्यास थे । व्यासजी ने कहा कि पूर्व जन्म में तुम पद्मपादाचार्य के शिष्य थे, वेद बंधू, लेकिन लोगों से पैसे एंठते थे, जो लोग थे उनको तुमने साथ लिया, धर्म की जगह पर धूर्तता का तुमने काम किया इसलिए इस जन्म में तुम साधन-भजन करते हुए भी अशांत हो । अशांति का कारण व्यासजी ने बता दिया, उन दयालु व्यासजी ने अशांति का कारण बता कर विदा ले ली, कहा, ‘जाओ उत्तरकाशी चले जाओ’ । २१ दिन का अनुष्ठान करो गुरु मंत्र का फिर ब्रह्म भोजन कराओ, तुम्हे शांति मिलेगी और इसी जन्म में तुम्हे कैवल्य की प्राप्ति होगी ।

नमस्ते व्यास विशाल बुद्धये  फुल्लारविंदा यत पत्र नेत्र:

येन त्वया भारत तैल पूर्ण प्रज्वालितो ज्ञानमय प्रति ।।

हमारे हृदय में अपना विवेक-वैराग्य का ज्ञान प्रकट हो, ईश्वर की ओर वापिस कूद पड़ना चाहिए । शुद्ध जल, शुद्ध अन्न और शुद्ध आचरण से सत्व गुण की वृद्धि होती है, अच्छे निर्णय होते हैं । जो लोग प्याज खाते हैं, वापिस बोलता है मैं तो गलती कर सकता हूँ लेकिन मेरा आराध्य देव, अजय नहीं गलती कर सकता है । न गुरु पूनम को देखा, न उज्जैन में देखा, गलती नहीं कर सकता है आराध्य देव है तुम्हारा, बुलाने पर भी नहीं आया और रात-रात को रोता है । अजय की लीलाएं बताऊँ न..तो आप को आश्चर्य होगा । बोले, साक्षात्कार हो गया है, हँसता रहता था, साक्षात्कार का ढोंग करता था और भी क्या-क्या बातें । आराध्य देव तुमने खोज लिया तुम्हारा आराध्य तुम महान हो, आराध्य देव अजय गलती नहीं कर सकता, मेरे में गलती हो सकती है, इतना गुण गान ! एक मेरा पूर्व जन्म का पाप पूरा हुआ अजय वाला, दूसरा पूर्व जन्म का पाप मेरा पूरा हुआ बबाल वाला, बड़ा अच्छा है, शांति है । नारायण हरि हरि ॐ हरि ।

तुम्हारी एकाग्रता शांति ये तुम न चाहो तो भी अनंत तीर्थ करने का फल देगी । सौ तीर्थ क्या होता है, हज़ार तीर्थ क्या होता है और एकादशी क्या होता है, ब्रह्मज्ञान के सत्संग के आगे ! स्नातं तेन सर्व तीर्थं, उसने सारे तीर्थों में स्नान कर लिया, सारे तीर्थों में स्नान करने का फल होता है । दातं तेन सर्व दानं, १००-२०० नहीं, सारी संपत्ति का तुमने दान कर दिया । कृतं तेन सर्व यज्ञं, १-२ यज्ञ नहीं, सारे यज्ञ तुमने कर लिए । येन क्षणं मन: ब्रह्मविचारे स्थिरं कृत्वा, एक क्षण के लिए भी ब्रह्म परमात्मा में तुमने मन को लगाया दिया । एक क्षण में स्वप्ना टूटा तो स्वप्ने की सारी मुसीबतें गयीं, तुम ६० साल स्वप्ने में दुखी थे लेकिन एक क्षण के लिए किसी ने मारा झटका तो ६० साल के दुःख की ऐसी-तैसी । ६० साल क्या होता है स्वप्ने का, एक क्षण जाग्रत की कैसी ऊँची होती है ! सत्संग जाग्रत में ले आता है । स्वप्ने में तुमने कितने भी तीर्थ कर लिए, यज्ञ कर लिए, तप कर लिए, १ क्षण तुम जाग जाओ जो शाश्वत वैभव विभु है, उसमें १ क्षण बहुत हो जाता है । मैं तो तुम्हारे भाग्य की सराहना करने वाले शब्द नहीं खोज पाऊंगा । बहुत बड़ा भारी पुण्य हो रहा है, बहुत बड़े भारी ऊँचे संस्कार मिल रहे हैं, उसका खाली आदर करो, हाथ जोड़ कर हमारी बात पर ध्यान दो । हम हाथ जोड़ के प्रार्थना करते हैं । हरि ॐ हरि हरि ॐ ।

ईश्वर प्राप्ति में बाधक और सहायक ११ बातें –

ईश्वर प्राप्ति में बाधक क्या है – १. मान की चाह २. अति भाषण ३. यश की लोलुपता ४. अधिक निद्रा ५. अधिक खान-पान ६. धन की लोलुपता, धन की मांग, दान की मांग ७. अति छोटी-छोटी बातों में, छोटे-छोटे लोगों में, छोटे-छोटे पुस्तकों में उलझना । ८. क्रोध और द्वेष, गुस्से-गुस्से में निर्णय लेना, ये हरामी है वो ऐसा है, वो ऐसा है । अपने अन्दर में हरामी नहीं होगा तो दूसरा हरामी नहीं दिखेगा । अपने अन्दर गन्दगी नहीं होगी तो दूसरे की गन्दगी का महत्व ही नहीं लगेगा । ९. काम आसक्ति, काम आसक्ति भी आदमी को बेईमान और ईश्वर से दूर करती है । १०. आलस्य ११. शौक । ये ११ बातें शिष्य के लिए नाश का साधन हैं, इनसे बचें और हितैषी ११ बातें अपने जीवन में लायें – १. गंदी आदत और गंदे स्वभाव का त्याग २. सत्संग में रूचि ३. दया, सबसे मैत्री ४. नम्रता भरा व्यवहार, शास्त्रोचित व्यवहार, ५. जप ६. नीयम ७. तपस्या ८. पवित्रता ९. सहनशीलता, सहनशीलता हो तो एकांत में नहीं भागेगा । सहनशीलता की कमी वाला ही भगेडू होता है । १०. मित भाषण ११ स्वाध्याय शीलता । मेरे गुरुदेव ९३ साल के थे, एक दिन भी मेरे गुरु स्वाध्याय के बिना नहीं रहे । ९३ साल की उम्र तक, जब महा प्रयाण कर रहे थे उस समय भी सत्संग की बात । शरीर में पीड़ा हो रही है तो बोले ये प्रारब्ध है।

स्वाध्यायं प्रमादं न कुर्यात् ।

सत्संग के विचारों में आलस्य नहीं करो, लापरवाही नहीं करो, गुस्से में, आवेश में, कपट से निर्णय नहीं लो । नारायण हरि हरि ॐ हरि । जिस के गुरु कहीं जाते तो गुरूजी की आज्ञा ले के फिर जाते । उसी गुरु के शिष्य वापिस जब चाहे जहाँ चल मेरे भईया, गुरूजी को पता न चले । ॐ…दादू दीन दयाल ने अपने शिष्य को कहा मत जा लेकिन केशवदास फिर आराम से नज़र छुपा के गया, गया तो अकाल मृत्यु मर गया, फिर उसको आश्रम में क्यों लाओ ! फेंक दो ऊपर, कौए, चील, गीध नोच के कुत्ते की नाई । जो गुरु की अवज्ञा करता है उसकी अंत्येष्टि क्या करना ! फिकवा दिया दादूजी ने ख़ास केशवदास । वो भी चूल्हा बनाने के लिए मिट्टी लेने के लिए खिसक गया, नज़र बचा के एक बार ही । ॐ…तुम्हारी शांति स्थिरता देखकर मुझे सच-मुच तुम्हारे पुण्यों पर प्रसन्नता हुई ।

गुरु पूनम पर गुरुदेव का मानसिक पूजन –

मैं अपने गुरु देव का गुरु पूनम के दिन मानसिक पूजन करता था । गुरूजी को स्नान कराता, खूब प्रेम से पोंछता, वस्त्र पहनाता, तिलक करता फिर २-२ सफ़ेद फूलों की, मोगरे की सुगंधित माला पहनाता था । मन का ही लड्डू बनाना तो तेल का क्यों बनाना, घी का ही बनाना । मन से ही हार पहनाना तो १ हार क्यों लाना, २ हार पहनाता था मैं अपने गुरुदेव को । तो हार की सुगंध भी मानसिक और मेरे गुरूजी सत रूप हैं, गुरूजी चेतन रूप हैं, मेरे मन को, बुद्धि को, इन्द्रियों को जानने वाले गुरुदेव हज़ारा-हुज़ूर हैं, साक्षी हैं, चैतन्य हैं । गुरु को शरीर मानेंगे तो आप शरीर के अभिमान और शरीर के राग-द्वेष, पलायनवादिता और धोखेबाज़ी से कैसे बच सकते हैं ? जो गुरु से धोखा कर सकता है वो दूसरे से धोखा नहीं करेगा ये कौन बोलता है ? गुरु को धोखा दे के जो भाग सकता है वो दूसरे से कितना वफादार रहेगा ? हमने कभी १ मिनट के लिए भी गुरूजी को धोखा नहीं दिया, इस बात का हमको संतोष है । पहले गुरूजी की आज्ञा आती फिर हम जाते थे और गुरूजी के ध्यान में रहता कि अभी आज इधर है, आज इधर है । दाड़ी-बाल कटवाते अथवा तो मुंडन आज्ञा आती फिर करते थे । तुम्हारी एकाग्रता कहाँ से ले आये हो आज तुम !

तपेशु सर्वेषु एकाग्रता परं तपः ।

एकाग्रता परम तपस्या है लेकिन तुम्हारे बीच १०-२० मनचले लोग होते हैं न…सब गुड़-गोबर कर देते हैं । ऐसी एकाग्रता में अगर मैं रेल चला के बीच में आऊं-बैठूं, तुम देखते रहो तो बहुत कुछ हो सकता है लेकिन मूर्ख लोग बीच में दौड़-धूप करके माहौल बिगाड़ते हैं । अभी मैं रेलगाड़ी में आऊं और कोई बीच में नहीं उठे तो आज बहुत बढ़िया ध्यान लगेगा, कोई उठे तो तुरंत उसका कपड़ा पकड़ के बिठा देना, ठीक है । दीये की रौशनी सूरज की रौशनी में एकाकार हो जाती है ऐसे ही गुरु की कृपा की रौशनी में इष्ट की कृपा मिल जाती है । जब तक गुरु नहीं मिले तो इष्टदेव की पूजा-प्रार्थना ये करो और इष्टदेव गुरु से मिला देते हैं । एक इष्टदेव, एक गुरुदेव ११ गुनी ताकत हो जाती है । इष्ट का प्रकाश जैसे दीये का प्रकाश सूरज में एकाकार हो जाता है ऐसे ही इष्ट की कृपा गुरु की कृपा में एकाकार हो जाती है । ऐसा बड़ा गज़ब का है, ऐसे गुरु को धोखा दे के जाने वाले की ताकत की बराबरी कौन कर सकता है ! ॐ हरि हरि ॐ ।

ॐॐॐॐॐॐ ( दस बार कंठ से, कान में उंगली डाल कर प्रयोग, अपने बच्चों को और पड़ोस के बच्चों को इखट्टा करके ये कराओ, सबको लाभ होगा । गहरा श्वास लेना, ऐसा गहरा श्वास लो कि फेफड़ों के बंद छिद्र खुल जायें, रोग प्रतिकारक शक्ति, अनुमान शक्ति, क्षमा शक्ति, शौर्य शक्ति का विकास हो । अब आनंद शांति ॐॐ प्रभुजी ॐ गुरूजी । ध्यान में जो लाभ होता है वो चॉकलेट में, टॉफी में नहीं होता । गुरु को प्रीतिपूर्वक देखकर प्रेमाभक्ति जगाने से बहुत फायदा होता है ।

ज्ञान की मधुरता और गहराई

इनकी किरपा की समीक्षा निशदिन अब मैं हर क्षण करूँ, हर क्षण करूँ ।

मैं तो सदा तेरी भक्ति करूँ निशदिन तुम्हारी पूजा करूँ ।। हरि ॐ…

रिश्ते-नाते बहुत हैं जग में कोई न रिश्ता ऐसा ।

 गुरु और शिष्य का नाता है पवन गंगा जल के जैसा ।

कभी न विचलित हो ये श्रद्धा जो गुरु बोलें वो मैं करूँ, वो मैं करूँ ।

मैं तो सदा तेरी भक्ति करूँ निशदिन तुम्हारी पूजा करूँ ।। हरि ॐ…

दरश गुरु के, वचन गुरु के, सच्चा धन हैं चरण गुरु के

लग जाए बस प्रीत इन्ही से, हो जायें अर्पण इनमें ।

इनसे ही सारी खुशियाँ हैं, प्रेम इन्ही का पाते रहें, पाते रहें ।

मैं तो सदा तेरी भक्ति करूँ निशदिन तुम्हारी पूजा करूँ ।। हरि ॐ…

 

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भगवद् ज्ञान, शांति, लाभ कैसे मिले? Part 1


ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ प्रभु ॐ गुरु ॐ गुरु ॐ…प्रभु ॐ प्यारे ॐ हरि ॐ हरि ॐ…

ॐ घद्रम कर्णेभी शुनियामदेवा: घद्रम पश्येमाक्ष भीर्यजत्रा:

                   धीरेरंवे तुष्ठ्वा सज्जनो हिय्शेमा देव हितं यदायु ।। हरि ॐ…हरि ॐ…

चन्दनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनं

आपदां हरति नित्यं लक्ष्मी तिष्ठति सर्वदा ।।

हरि ॐ…हरि ॐ…हरि ॐ…हरि हरि ॐ नारायण हरि नारायण हरि हरि ॐ हरि

bapuji 1

जो कल आये थे, आज नहीं आये हैं वे हाथ ऊपर करो जल्दी ! नहीं करते ! कल आये थे आज नहीं आये हैं, जो नहीं आये हैं तो हाथ ऊपर कैसे करें ! ये कैसे जाना जाता है ? चेतन से जाना जाता है कि जड़ से, चेतन से । ज्ञान से जाना जाता है कि अज्ञान से, ज्ञान से । बोलते हैं दस हज़ार वर्ष की तपस्या, साठ हज़ार वर्ष की तपस्या कर ले कोई, सोने की लंका तो बना लेगा लेकिन परमात्मा का ज्ञान नहीं है तो सोने की लंका भी वासना तो नहीं मिटाएगी, अहंकार नहीं मिटाएगी, राग-द्वेष नहीं मिटाएगी । सोने का हिरण्यपुर बना लिया हिरण्यकश्यपु ने लेकिन मैं हिरण्यकश्यपु एक मात्र भगवान उसी अहंकार से प्रहलाद को सता सता के नरसिंह अवतार को आना पड़ा और हिरण्यकश्यपु का अंत हुआ । स्वप्ने में तुम २५ वर्ष की सजा भुगत रहे हो अथवा ६०-६५ साल के हो गए हो और तुम्हारा जीवन बुढ़ापे में लड़खड़ा गया है, तुम अपने को मानते हो कि मैं बहुत दुखी हूँ, ६५ साल मैंने दुःख देखा है । अब वो ६५ साल का तुम्हारा दुःख-सुख बड़ा है कि एक मिनट का झटका बड़ा है ? एक मिनट झटका लग जाए आँख खुल जाए तो ६५ वर्ष के दुखों की ताकत है कि तुम्हे दबा सकें ! स्वप्ने में आपने ६५ वर्ष से दुखी देखा अपने को, ६५ साल से मैंने कोई सुख नहीं देखा आप रो रहे हैं और महात्मा ने मार दी थप्पड़, और आप की आंख खुल गयी । अब महात्मा भी नहीं हैं, ६५ वर्ष का दुःख भी नहीं है लेकिन ६५ वर्ष के दुःख से जो तुम दुखी हो रहे थे, तुम को अपने पर हँसी आएगी । क्या ख़याल है ! ध्यान देना आत्मज्ञान इतना महान है ६५ वर्ष तो क्या ६० हज़ार वर्ष तपस्या कोई कर ले, फिर भी अपने आप का ज्ञान नहीं है तो सोने की लंका में और सुंदरियों में उलझ उलझ के रावण चले गए, हिरण्यकश्यपु अहं में उलझ के चले गए । कोई किसी में, कोई किसी में उलझ के संसार से हार जाता है ।

दो प्रकार के व्यक्ति –

दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं, एक हार का रास्ता पसंद कर ले, मैं भगवान की शरण हूँ, मैं सत्य की शरण हूँ, मैं कुछ नहीं हूँ, ईश्वर ही है, भगवान ही हैं, हार का रास्ता पसंद कर ले । हारते-हारते अपना अहं भी हार देते हैं, हारने को कुछ बच नहीं जाता । जीवन की श्याम में उनकी बड़ी जीत हो जाती है । जिस ईश्वर के लिए, धर्म के लिए, सत्य के लिए हारते चले जाते हैं, सत्य हरता नहीं है, सत्य अपने से मिला लेता है । वो जीत जाते हैं । दूसरे वे लोग हैं जो जीतने का रास्ता पकड़ते हैं । कावा-दावा करके, विरोधी पार्टी का कुछ का कुछ बदनामी करके, अपने वालों की जड़ें हटा के, काट के जीत-जीत-जीत–जीत में लगते रहते हैं लेकिन मृत्यु के समय देखा जाए तो उनकी सारी जीतें ख़्वाब का खेल बन जाती हैं और वासनाएं और कर्म बंधन लेकर मरते हैं, बुरी तरह हार जाते हैं ।

उसका एक नमूना – डायोजनिस हार के रास्ते चले, हारते-हारते अपने को हरा दिया उस आत्मा-परमात्मा में, बड़ी शांति बड़ी मस्ती से जीते थे । महान सिकंदर जीतते-जीतते कईयों के गले काटे, कई सैनिकों और फौजियों की महिलायें विधवा हुईं, कई माताएं अपने सपूत खो बैठीं और कई बालक-बालिकाएं अपने अब्बा और अपने फादर को खो बैठे । महान सिकंदर आ रहा है । जानबूझ कर वो महान सिकंदर का मद चूर करने वाला डायोजनिस उसी सकरी गली में लेट गया । हट जाओ महान सिकंदर आ रहा है !

बोले, “आ रहा है तो उधर से चला जाये, मेरे पैरों की तरफ से, मुझे क्यों हटा रहे हो ?”

डायोजनिस की वाणी में कुछ अदभुत प्रभाव था । सिकंदर के मंत्री ने जाकर कहा कि एक ऐसा प्रसिद्ध फ़कीर लेटा है, बोलता है उधर से निकल जायें ।

सिकंदर बोला, “ हैं !! मेरे रास्ते में पैर बिछा के बैठा है और वहां से निकल जायें, मैं देखता हूँ ।”

आये तो आग-बबूला, अंगारे बरसाते हुए लेकिन डायोजनिस को देखते ही ठंडे हो गए । ये आदमी इतना प्रसन्न, इतना निश्चिंत, इतना खुशदिल, इतना खुशनसीब मनुष्य, इनको देखकर हमें भी थोड़ी ख़ुशी की खबर मिली ।

डायोजनिस से पुछा, “Who are you?” (“तुम कौन हो?”)

बोले, “ मैं कौन हूँ, बता दूँगा । तुम कौन हो और कहाँ से आये हो ? ”

बोले, “ मैं महान सिकंदर कई छोटे-मोटे राज्य जीत कर आया हूँ, और जीतूँगा, पूरे विश्व पर विजय पाउँगा । ”

डायोजनिस ने मजाक के लहजे में हँसी उडाई कि, “ अच्छा ! विश्व को जीत लेगा । आज तक तो कोई ऐसा पैदा ही नहीं हुआ जो विश्व को जीत ले । तुम तो गज़ब के आदमी हो, विश्व जीतने निकले हो ! विश्व कैसे जीता जायेगा ? जब भी जीत होती है तो अपने आप पे जीत होती है, अंदर से आदमी जीतता है तब बाहर की जीत शोभा देती है और भीतर से हारता है तो बाहर की जीत पर तो खाली ख़याली पुलाव के तोहफे ले कर घूमता है, ये मेरा, ये मेरा, ये मेरा, ये मेरा । अपना शरीर तो अपना नहीं है, अपना मन अपने कहने में नहीं है, अपनी बुद्धि अपने विचारों के परिणामों के ख़याल से वंचित है । बुद्धि, मन और अपना शरीर इनको तो जीता नहीं जो बिल्कुल निकट हैं और जिनको जीतना ज़रूरी है और इनको छोड़कर दूसरों को जीतकर विश्व विजयी हो जाओगे ! मालूम होता है कि तुम शेख चिल्ली के किले बना रहे हो । शांति अपने आप में है, विजय अपने आप में है । सुखं शान्तस्य कुतः दुखं । शान्तात्मा को दुःख कहाँ और अशांत को सुख कहाँ ? तुम तो बड़े अशांत नज़र आते हो और विश्व विजय करने जा रहे हो । अभी तक जो विजय हुई उससे तो तुमको तसल्ली नहीं हुई, तृप्ति नहीं हुई, शांति नहीं हुई, जितना खाओगे उससे हज़ार-दस हज़ार गुना पड़ा है फिर भी भूख मिटी नहीं तो कब भूख मिटेगी ? ”

सिकंदर बोला, “You say truth. I like the happiness of soul, peace.” (“आप सत्य कह रहे हैं ।”)

डायोजनिस बोले, “जीत भीतर होती है, बाहर का किसी का गला काट के इकट्टा करने से जीत मानना ये तो अहंकार की बेवकूफी है । जो भीतर से कंगले होते हैं उनको बाहर बड़े-बड़े पद चाहिए, जो भीतर से तृप्त होते हैं उनको बाहर के पद बिना ही आत्मपद की बड़ी तृप्ति होती है । वो इतने खुशहाल होते हैं कि उनके दर्शन करके ही हज़ारों लाखों लोग शांति पाते हैं और अतृप्त राजे-महाराजे इतने अशांत होते हैं, बेवकूफ होते हैं कि उनको देखकर लोग डर के मारे घरों में घुस जाते हैं। अरे ! रावण आ गया, रावण आ गया तो लोग घरों में घुस जाते थे । और रामजी आये, रामजी आये तो घर छोड़कर उनके पीछे-पीछे भागते थे । अरे कंस आ गया ! घरों में भाग जाते थे । अरे कृष्ण आये हैं ! तो घरों से बाहर आ जाते थे, तो जीत तो कृष्ण की है, राम की है । रावण और कंस की जीत नहीं है । तो जो अपने अज्ञान को हटाता है, माया के स्वप्ने को स्वप्ना जानता है और चैतन्य को अपना जानता है उसने सच्ची जीत की । दूसरों को मार-काट के, चीज़-वस्तुओं पर कब्ज़ा करके साँप की नाई बैठ जाए तो साँप को मारने वाले देख लो कहाँ जाते हैं, उनसे लूट-खसोट करने वाले लोग दूसरे खड़े हो जायेंगे । देखो चुनाव के लिए कोई कुर्सी लेना चाहता है, प्रधानमंत्री बनूँगा, वो बनूँगा वो बनूँगा, उसके बनने न बनने के पहले ही देखो कैसा खींचा-खींची चालू हो जाती है । तौबा है तौबा !! अपने आत्मा को छोड़कर बाहर की वस्तु पाकर कोई बड़ा बनता है तो उसके लिए तो परिश्रम और नालत के सिवाय और थोड़ा बहुत मस्का-वस्का होगा बस । परिश्रम, नालत और थोड़ा बहुत चमचे मस्का मार देंगे बस । कबीरा कुत्ते की दोस्ती, दो बाजू जंजाल। रीझे तो मुँह चाटे, खीझे तो पैर काटे ।। संसारी रीझ गया, कुत्ता रीझ गया तो मुँह चाटेगा और खीज गया तो पैर काटेगा । ”

डायोजनिस की ऊँची सीख लेकिन सिकंदर को वासना थी ।

सिकंदर बोला, “You say truth, I like soul happiness but…” “आप सच कहते हैं, मुझे आत्मा की शांति पसंद है लेकिन…अभी मुझे जाने दो । मैं विश्व विजय करके आऊंगा । ”

डायोजनिस बोले, “ फिर नहीं आ सकोगे, अभी जगह पड़ी है बैठ जाओ मेरे साथ, लेट जाओ ख्वाईशें छोड़ो, जो सदा मौजूद है वो कभी मिटता नहीं और जो मिटने वाला है, किसी के पास टिका नहीं । इच्छा रहित हो जाओ और इच्छा करनी है तो आत्मा परमात्मा को पाने की इच्छा करो । ”

सारी सफलताओं की कुंजी बता दी डायोजनिस ने, लेकिन अभागी वासना कहाँ समझती है ।

सिकंदर बोला, “Let us go.” (“हमको जाने दो, मैं लौट के आता हूँ ।”)

डायोजनिस बोले, “जाओ, लौट के नहीं आओगे ।”  और नहीं आया लौट के मर गया रास्ते में, ऐसे कई तीसमारखाँ गए विश्व विजय करने, विश्व विजय नहीं होता, विश्व विजय करना हो तो विश्वेश्वर में अपनी वृत्ति को विश्राम दो । जो सहज में है, सुलभ है और शाश्वत है, विश्वेश्वर का ज्ञान पा लो ।

विश्वेश्वर का ज्ञान पाने के लिए ‘नारायण स्तुति’ पुस्तक पढ़ो –

विश्वेश्वर का ज्ञान पाने के लिए सारे शास्त्र ढूंढो, भागवत ढूंढो तो बड़ा परिश्रम पड़ेगा, मैंने ढूँढा है और एकत्रित किया और ‘नारायण स्तुति’ नाम की पुस्तक बना कर मेरे प्यारे साधकों के लिए तैयार किया है । उसको बार-बार पढ़ो, तो विश्व को जीतने वाले तो हार कर, रो कर गए लेकिन मेरे साधक जीतकर, प्रभु के होकर अमर हो जायेंगे । नारायण स्तुति पुस्तक पढ़ा करो, गौर से पढ़ो और भगवान कैसे हैं ? उसमें अपना मन लगाओ । बड़ा शरीर होने से आदमी बड़ा आदमी नहीं होता, बड़ा धन होने से बड़ा आदमी नहीं होता । बड़े में बड़ा जो तत्व है, श्रृष्टि के मूल तत्व में बुद्धि लगाने से व्यास विशालबुद्धये ।

नमस्ते व्यास विशाल बुद्धये  फुल्लारविंदा यत पत्र नेत्र:

येन त्वया भारत तैल पूर्ण प्रज्वालितो ज्ञानमय प्रति ।।

    बुद्धि में ज्ञान का दिया जले तब विशाल बुद्धि बनोगे । तुच्छ चीज़ों को पाकर जो सुखी होते हैं वो तो बालक बुद्धि है, बच्चों के आगे खिलोने रखो, चॉकलेट, बिस्कुट, लॉलीपॉप, माल पूए रखो और सच्चे हीरे रखो तो मूर्ख बच्चे खिलोनों में राज़ी हो जायेंगे और असली चीज़ छोड़ देंगे । ऐसे ही सारा संसार है जो छोड़ के मरना है उसके पीछे मारे जा रहे हैं और जिसको पाकर मौत भी शरणागत हो जाती है ऐसे आत्मदेव को छोड़ देते हैं । श्रुति भगवती कहती है –

आत्मज्ञानात परं ज्ञानं न विद्यते ।

आत्मलाभात परं लाभं न विद्यते ।

आत्मसुखात परं सुखं न विद्यते ।

    आत्मलाभ से बढ़कर कोई लाभ नहीं, आत्मज्ञान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं, आत्मसुख से बढ़कर कोई सुख नहीं है । सदा के लिए दीनता-हीनता मिटाने की ताकत आत्मज्ञान में है । सदा समाहित चित्त करने का सामर्थ्य आत्मज्ञान में है । धर्म करो, अर्थ कमाओ, कामना भोगो लेकिन मुक्तिदाई ज्ञान से अगर वंचित रहे तो जीवन ऐसे ही व्यर्थ हो जाता है । धन भागी वे हैं जिनको हयात आत्मा परमात्मा के साक्षात्कार में संपन्न हुए महापुरुष मिलते हैं । महापुरुष तो मिल गए लेकिन महान सिकंदर महान गलती करके अभागा रह गया । इससे तो शबरी भीलन महान थी, मतंग गुरु के चरणों में बैठ गयी तो बैठ गयी । धन्ना जाट, रहिदास चमार महान आत्मा बने क्योकि गुरु के ज्ञान को पाकर तृप्त हो गए । परमात्म ज्ञान, परमात्म लाभ, परमात्म शांति सर्वोपरि है । खूब धन कमा ले, खूब तीर्थ कर ले, खूब यात्राएं कर ले लेकिन २ क्षण का सत्संग उससे कई गुना ज्यादा पुण्य प्रदायक है । स्वप्ने में तुमने खूब यात्रा की, खूब धन कमाया, खूब दान किया और खूब हेकड़ी आ गयी कि अब मेरे को स्वर्ग मिलेगा, मेरा तो जय घोष होगा लेकिन ये स्वप्ने का खयाली पुलाव है, आँख खुली तो वो ही ठन-ठनपाल ।

उमा कहूँ मैं अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब स्वप्ना ।

ये जगत स्वप्ने जैसा है, मूर्खों को सच्चा लगता है, इसीमें उलझ-उलझ के मर जाते हैं ।

पानी तेरा बुलबुला ये मानव की जात, देखत ही छुप जात है ज्यों तारा प्रभात ।

    आज तक की जो-जो उपलब्धियां हुईं देखो तो सब खयाली पुलाव है । आज तक जो तुमने जाना है, जो पाया है और आज के बाद जो जानोगे, जो पाओगे, मृत्यु के एक झटके में छूट जायेगा फिर भी जो नहीं छूटता, वो कौन है ? उसके तरफ आना, आत्मज्ञान । उसमें शांति और सामर्थ्य पाना, आत्मलाभ । उसमें परितृप्ति परम रस पाना आत्मसुख है । बहुत आसान तरीका है और बहुत ऊँची चीज़ है । आसान से आसान और ऊँची से ऊँची चीज़ सहज में मिलती है और तुच्छ चीज़ों के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है । जैसे शुद्ध तीर्थ का जल बुद्धि शुद्ध करता है, सहज में मिलेगा, नदी, तालाब, कुए का पानी

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