लेकिन सुगन्धित पानी पीना हो, जिसमें डी.डी.टी पड़ती है, पेप्सी, कोका ये वो, तो ७-८ रुपये लगाओ, पेट को, दिमाग को और बुद्धि को तामसी बनाओ और उससे भी ज्यादा पैसा खर्चो ब्रांडी के लिए । घर से निकलते हो तो भोजन का टिफ़िन बना कर निकलते हो, पानी घर से नहीं ले जाते हो स्टेशन पर पानी मिलता है, भोजन से जीवन में पानी ज्यादा ज़रूरी है लेकिन सहज में मिलता है । भोजन से और पानी से श्वास ज्यादा ज़रूरी है उसके लिए न टिफ़िन भरते हो, न वाटर बैग लेते हो सहज में मिलता है । ऐसे ही परमात्मा का सुख सहज में है, परमात्मा का ज्ञान सहज में है, परमात्मा का माधुर्य सहज में है लेकिन अभागी नादानी, नासमझी ये मिले, ये मिले, मैं सी.ए. हो जाऊं । हो गए सी.ए., जॉब मिल जाए, मिल गयी जॉब फिर क्या ? मैरिज (शादी) हो जाये, हो गयी, बच्चे हो जाएँ, हो गए, फिर क्या ? बुढ़ापे में कुछ नहीं मर जायें तो अच्छा है, तो बेवकूफ मरने के लिए जीवन थोड़े था ! जीवन दाता का ज्ञान पाकर अपना नकली ‘मैं’ छोड़कर असली ‘मैं’ में मिलना था ।
कल मैंने बताया था कि जब तक सद्गुरु नहीं मिलते तब तक भगवान की शरण ली जाती है और ५ भगवान जो हैं, बड़े उदार हैं, बड़े दयालु हैं, बड़े हितैषी हैं, बड़े त्यागी हैं । भगवान विष्णु और उनके अवतार, भगवान शिव, गणपति, सूर्य और आद्यशक्ति, इनकी उपासना पूजा करोगे तो संसारी स्वार्थ से करोगे तो वो चीज़ें पाने के लिए भटक-भटक के थोड़ी बहुत मिलेगी लेकिन उनके साथ प्रीति करते हो कि बस हमारा जिसमें मंगल हो, प्रभु ! आप वो ही कृपा करना तो वो इष्ट देव आपको संत के द्वार पहुँचा देंगे । आपने इन ५ देवों में से किसी न किसी देवता की उपासना की है अथवा तो गॉड देवता मानकर, अल्ला को देवता मानकर कुछ न कुछ सत्कर्म किया है उसी का फल है कि आप संत के द्वार आ गए ।
प्रचेताओं की कथा –
इष्टदेव आपको प्रेरणा देते हैं, रक्षा करते हैं लेकिन इष्टदेव बहुत प्रसन्न होंगे तो प्रचेताओं को कहा शिवजी ने कि तुमको नारायण स्तवन का मंत्र मैं देता हूँ, नारायण तुमको मिलेंगे । साधना किया और भगवान नारायण मिले, नारायण भगवान ने कहा कि राजकुमारों दसों के दस भाई, पिता राज्य दे रहे थे न लेकर तुमने शिवजी का दर्शन किया, हमारा दर्शन किया अब तुमको जो चाहिए माँग लो । जैसे मारवाड़ में, मरू भूमि में वृक्ष होना कठिन है ऐसे ही जवानी में विवेक-वैराग्य होना कठिन है और तुम्हारे को है विवेक । ऐश-आराम छोड़कर, राज्य का दिखावटी सुख छोड़कर इष्ट के दर्शन करने में सफल हुए हो तो तुमको जो अभिष्ट हो मांग लो । प्रचेताओं ने कहा कि “प्रभु ! बच्चा जैसे अपनी मति से मांगता है तो ठगा जाता है, खिलोने मांग लेगा, चॉकलेट मांग लेगा और कुछ मांग लेगा । हम बालक बुद्धि के हैं, हमारा जिसमें परम हित हो और आप जिसको परम उत्कर्ष मानते हों, आपकी नज़र में जो परम श्रेष्ठ हो, परम हितकारी हो और जिसको पाने के बाद पाना न रहे, जानने के बाद जानना न रहे और जिसमें स्थित होने के बाद बड़े भारी दुःख से भी आदमी प्रभावित न हो, ऐसी कोई सर्वोपरि चीज़ जो आपकी नज़र में सर्वोपरि है वो ही हमको देने की कृपा करें ।” भगवान नारायण विशेष प्रसन्न हुए कि प्रचेताओं तुम्हारी बुद्धि धन्य है ! सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ तो अपने आत्मदेव को जानना है जिससे भगवान ब्रह्मा, ब्रह्मा हैं, विष्णु विष्णु हैं, शिव शिव हैं, तुम तुम हो और हम हम हैं, जो सबका सार सदा मौजूद है । दुःख सदा मौजूद नहीं है, सुख सदा मौजूद नहीं हैं, बचपन मौजूद नहीं है, जवानी मौजूद नहीं है लेकिन उसको जानने वाला सदा मौजूद है । मैं मैं जहाँ से उठती हैं, उस आत्मदेव को जानने के लिए तुमको देवऋषि नारदजी का सत्संग मिलेगा, ये मैं आशीर्वाद देता हूँ । देवऋषि नारदजी का सत्संग मिलने का भगवान ने आशीर्वाद दिया । शिवजी ने दर्शन दिया, विष्णुजी ने दर्शन दिया और बाद में परम कल्याण के लिये नारदजी का सत्संग मिलने का आशीर्वाद मिला । वहां तक तो तुम पहुँच गए हो, अब नारदजी नहीं तो बापूजी लेकिन है तो सत्संग वही तत्वज्ञान का । अब छोटी-मोटी चीज़ों में उलझने की गलती न करो, बस ।
शुकदेवजी महाराज की पूजा करके सोने की चौखट में चरण धोकर, अर्घ्यपात्र से पूजन करके राजा परीक्षत ने हाथ जोड़ कर स्तुति की, मौन खड़े रहे तो ‘राजन ! कुछ पूछना चाहते हो ?’ बोले, जी प्रभु ।
मनुष्य को जीवन काल में क्या जान लेना चाहिए और मृत्यु नज़दीक हो तो क्या करना चाहिए ?
शुकदेवजी ने कहा तुमने ऊँचे में ऊँची बुद्धि की पराकाष्ठा का परिचय दिया है ।
तस्मात् सर्व आत्मन: राजन हरि अभिधीयते ।
श्रोतव्य कीर्तितव्यश्च स्मृतव्यो भगवत गणम ।।
भगवान का ज्ञान पा लेना चाहिए, भगवान के गुण गान करना चाहिए, भगवान की कीर्ति में अपने दिल को, अपने मन को तदाकार करना चाहिए । और मृत्यु नज़दीक आये तो शरीर को मैं मानने की गलती छोड़ना चाहिए । मरने वाला शरीर मरेगा तुम अमर हो, बीमार शरीर होता है लेकिन बेवकूफ बोलते हैं मैं बीमार हूँ, दुःख मन में आता है निगुरे बोलते हैं मैं दुखी हूँ । चिंता चित्त में आती है बावरे बोलते हैं मैं चिंतित हूँ, ये सब प्रकृति में होता है, तुम आत्मा हो, परमात्मा के सनातन सपूत हो, इसको जान लो । ये जगत स्वप्ना है देखते-देखते बदल रहा है लेकिन फिर भी जो नहीं बदलता है वो अपना आपा अपना है ।
उमा कहूँ मैं अनुभव अपना सत्य हरि भजन जगत सब स्वप्ना ।
ये जगत स्वप्ने जैसा है लेकिन निगुरों को सच्चा लगता है, ठोस लगता है इसलिए टेंशन-टेंशन-टेंशन, स्वप्ने के जगत को सच्चा मान के टेंशन के शिकार हो रहे हैं । टेंशनों (चिंताओं) की दावा एलोपेथी वालों के पास नहीं है । शारीरिक टेंशन, मानसिक टेंशन, बौधिक टेंशन, हाँ नींद की गोली देंगे पड़े रहो, तन्द्रा में, पक्की नींद नहीं आती । पेन किलर (दर्द निवारक गोलियाँ) देंगे, बदमाशी का नाम है पेन किलर, पेन (दर्द) तो नहीं मरता पेन की खबर देने वाले कई सेलस (कोशिकाएं) मर जाते हैं और कई सेलस मूर्छित हो जाते हैं, फिर पेन होने लगता है । क्या ख़याल है, बात सच्ची लगती है ! पेन किलर्स के चक्कर में मत आओ । ये टेंशन तुमको देखकर टेंशन में आ जाये, शारीरिक, मानसिक, बौधिक, भगवद ज्ञान पा लो । भगवद शांति पा लो, भगवद लाभ पा लो ।
भगवद्ज्ञान, भगवद्शांति, भगवद्लाभ कैसे मिले ?
जिनको भगवद शांति लाभ मिला है ऐसे पुरुषों का संग करो । ऐसे पुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ो, ऐसे पुरुषों को आदर्श मानकर, ऐसे पुरुषों के सिद्धांत में अपने मन को चलाओ और भगवान का ज्ञान पा लो तो भगवान कैसे हैं ? सब शास्त्रों में खोजकर भगवान की एड्रेस ले लो तो तुम्हारी मर्ज़ी नहीं तो हमने खोज-खोज के जितना भी खोज सके, एक छोटा-सा पुस्तक तैयार किया है । ब्रह्माजी भगवान की स्तुति करते हैं प्रभु ! आप ऐसे हैं, ऐसे हैं । नारदजी स्तुति करते हैं, प्रह्लाद्जी करते हैं । धृतराष्ट्र करते हैं जिन-जिन को परमात्मा का साक्षत्कार हुआ है उन्होंने परमात्मा के विषय में वर्णन किया है । आपको तैयार माल मिलता है, ‘नारायण स्तुति’ पुस्तक पढ़ते जाओ, जैसे भगवान हैं स्वीकार करते जाओ । तो आपके हृदय में जल्दी भगवद्ज्ञान प्रकट हो जायेगा । दूसरा ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तक को पढ़ो तो जो जगत के तरफ आकर्षण होने के कारण जीव न करने जैसे कर्म करता है और बंधनों में पड़ता है उससे बच जाओगे । ‘ईश्वर की ओर’, ‘नारायण स्तुति’ और ‘जीवन विकास’ पुस्तक पढ़ें, ये इस गुरु पूनम पर साधकों के लिए पैकेज है पैकेज । जैसे दसवी वाला ग्यारहवीं में और ग्यारहवीं वाला बारहवीं, बारहवीं वाला कॉलेज में जाता है, ऐसा ये जम्प है ।
श्रावणी पूनम ब्राह्मणों के लिए, दशहरा क्षत्रियों के लिए, दिवाली बनियों के लिए, होली चारों वर्णों के लिए लेकिन ये गुरु पूनम तो चारों वर्णों के लिए और देवता ब्रहस्पति गुरु का पूजन करते हैं गुरु पूनम पर, दैत्य शुक्राचार्य का पूजन करते हैं और भगवान कृष्ण और राम अपने गुरुओं का पूजन करते हैं, वो आज गुरु पूर्णिमा है । लघु को गुरु बना दे । लघु चीज़, लघु वस्तु, लघु ‘मैं’ में उल्झे हुए को गुरु तत्व में जगा दे, गुरु ज्ञान में जगा दे, इस गुरु पूनम के निमित्त ये कार्यक्रम में जो आये हैं उनको जो पुण्य होता है उसके आगे हज़ार तीर्थ करने का फल क्या है, लाख तीर्थ करने का फल क्या है ? सेंकडों एकादशी का व्रत अच्छा है, सत्संग की तुलना कौन कर सकता है ?
तीर्थ नहाये एक फल, संत मिले फल चार ।
सतगुरु मिले अनंत फल कहत कबीर विचार ।।
जिसने सत्संग तीर्थ में गोता मार लिया उसने तो अरसठ तीर्थ कर लिए । अरसठ तीर्थ गुरूजी ना चरणे, गुरूजी नी चरण रज उड़ी-उड़ी लागे । मोहे अंग बेनुड़ी मने भाग्ये मिलो सत्संग ।। जिसको सत्संग रुपी तीर्थ में गोता मारने का अवसर आ गया वो कुम्भ के तीर्थ में काहे को दौड़-धुप करेगा ! जिसको सत्संग रुपी तीर्थ में अवगाहन करने का अवसर आ गया वो काशी और मथुरा के तीर्थ में क्यों धक्के खायेगा ?
घरमा छे काशी ने घरमा मथुरा, घरमा छे गोकुलियो गाँव रे ।
मारे नथी जाऊं नथी जाऊं तीरथ धाम रे ।।
अरसठ तीर्थ गुरूजी ना चरणे, गुरूनी चरण रज उड़ी-उड़ी लागे मोहे अंग ।
बेनुड़ी मने भाग्ये मिल्यो सत्संग ।। —मीरा बाई
सत्संग में ये द्रण निश्चय कर लो कि अब ज़रा से दुःख से हम दुखी हो जायें वो दिन गए । दुखाकार वृत्ति से जुड़ते हैं तो दुखी हैं, वृत्ति आती है चली जाती है, सुखाकार वृत्ति से जुड़कर अभिमान करते हैं तो हम सुखी हैं । लेकिन वास्तव में तो हम हैं अपने आप हर वृत्ति के बाप । दुखद वृत्ति आई-गयी, सुखद वृत्ति आई गयी, मूर्ख बच्चे जैसे खिलोनों में उलझते हैं ऐसे ही मूर्ख जनता सुख-दुःख की वृत्तियों में उलझती है । अब हम सत्संगी हुए हैं, ये वृत्तियाँ तो होती रहेंगी, तरंग तो उठते रहेंगे लेकिन पानी की गहराई ज्यों की त्यों है । ऐसे ही सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मरण ये सब खेल तो होता रहेगा लेकिन उसको जानने वाला आत्मदेव ज्यों का त्यों है । आप तो धन्य हो जाओगे, आपकी मीठी नज़र जिन पर पड़ेगी वो भी धनभागी हो जायेंगे ।
स तरति लोकान् तारयति ।
वो तर जायेंगे, दूसरों को तारने वाले हो जायेंगे । तो व्यास पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा, आषाणी पूर्णिमा का पर्व मनुष्यों के लिए, देवताओं के लिए, दैत्यों के लिए और भगवान के लिए महत्वपूर्ण है । गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आत्म शांति पाना, लेकिन जिनको प्रसिद्धि चाहिए, चलो रक्त दान करो, फलाना करो, कैसे भी स्टंट करके प्रसिद्ध हो जाओ, भक्तों का खून बांटो ।
अपने अंगों का दान न करें –
नेत्र दान करो, रक्त दान करो, रामसुखदास जी बोलते हैं शास्त्रों में मना किया हुआ है कि प्रकृति के दिए हुए अंग आप ज्यों के त्यों प्रकृति को सौंप दें । नेत्र दान करके जायेंगे, किडनी दान करेंगे, वो करेंगे, उसी नेत्र से वो दुराचार करेगा तो क्या करोगे ? अब इतने नेत्रों वाले हैं तो उन्होंने क्या झक-मार लिया, जो तुम्हारे दो नेत्र प्रकृति के नीयम के विरुद्ध तुम निकलवा के बड़े दानी बनते हो । ईश्वर को और प्रकृति को अपना मैं दान कर दो न ! प्रकृति के कायदे के विरुद्ध क्यों जाते हो ? प्रकृति के कायदे को क्यों तोड़ते हो ? दे डालोगे तो दूसरे जन्म में नेत्र विहीन प्राणी बनोगे तब तौबा हो जाएगी ! रामसुखदास महाराज ने शास्त्रों का उदाहरण दिया कि अपने अंगों का दान नहीं करना, अपने अंग, मेरी किडनी इसको दे दो, मेरा इसको ये दे दो, वो दे दो । हाँ किडनी वाले को किडनी ठीक करने के लिए पुनर्नवा खिलाओ । कल आये थे एक भक्त, उनको डॉक्टरों ने डायेलेसिस करवाने को कहा, पहले ८-८ होती थी फिर ४-४ होने लगी अब ठीक हो गए । पुनर्नवा पौधा है, उसके रस से बनती हैं गोलियाँ, पुनर्नवा को सातोड़ी बोलते हैं, साका भी बोलते हैं, वो खाओ खिलाओ, ठीक हो जाओगे । एक मंत्र है हार्ट अटैक कभी नहीं होगा, बाय-पास सर्जरी कभी नहीं करना । अपने पास है हृदय सुधा, २-२ चम्मच पियो ब्लॉकेज खुल जाता है और सस्ते में मिलता है, अथवा दूसरे घरेलु उपास हैं । सीजरिन नहीं कराना चाहिए, गाय के गोबर का रस १० ग्राम दे दो, अपने आप प्रसूति होगी । बच्चा अन्दर कमज़ोर है, मर जायेगा, ये है वो है, डरा डरा के एबॉर्शन कराते हैं, ऐसे लोभियों के चक्कर में मत आओ । जितना दूध पीते हैं, ४०० ग्राम पीते हैं तो २०० पानी डाल दो, घर में जो सोने की अंगूठी या जो कुछ सोने का हो वो डाल दो उबालने को धो के अथवा चांदी का, उबलते-उबलते पानी सूख जाए वो ही दूध गर्भवती पिए । एक-आध खजूर डाल के उबालो, एक-आध चम्मच घी डाल दो, अपने आप बच्चा और माँ पुष्ट होगी । नारियल और मिश्री चबा के खाए, बुढ़ापा भी दूर रहे, नारंगी खाये बुढ़ापे की झुर्रियां दूर रहें, नारियल खाए, नारंगी खाए, बच्चा भी ठाक, माँ भी ठीक, बाप भी ठीक ।
ॐ….हरि ॐ…लम्बा श्वास लो, गहरा-गहरा-गहरा, ॐ…(कंठ से) २ बार ऐसा रोज़ करने से हाइपो थायराइड, हाइपर थायराइड होगा नहीं, है तो नियंत्रित रहेगा और सुख-दुःख में सम रहने का आपका आत्म बल बढेगा । फिर से गहरा श्वास लो ॐ…(कंठ से) । नशा पिला के गिरा दे ये तो सबको आता है साकी, लेकिन गिरते हुए को जगा दे, सम्हाल दे वो तो कोई संत महापुरुष का ही काम है । वाहवाही का नशा, धन का नशा, सत्ता का नशा, न जाने क्या-क्या नशा, जिसमें शांति नहीं है, सूझ-बूझ नहीं है वो नशा है । नशे में तो एक दूसरे को उल्लू बनाते रहते हैं । जहाज़ में भी बैठो तो तुम्हारे जहाज़ के कप्तान, फलाने जहाज़ में कमांडर हैं, कप्तान समझता है कि मेरा नाम हो रहा है लेकिन किसी कप्तान का नाम आज तक मेरे दिमाग में नहीं आया, हर जहाज़ में कप्तानों का नाम बोलते हैं । सेविकाओं का नाम बोलते हैं, सेविकाएँ समझती हैं कि हमारा नाम हो रहा है, वो उसी में बिचारे उल्लू होते रहते हैं । नशा पिला के गिराना तो सबको आता है लेकिन गिरते हुए को होश दे के सम्हालना ये सत्पुरुषों का काम है । नारायण हरि हरि ॐ हरि । मैं पक्का कहता हूँ, मैंने तो जहाज़ की कितनी मुसाफिरी की, महीने में लगभग १०-१५ बार, २० बार जहाज़ में बैठना होता है । आज तक किसी कैप्टन का, किसी कप्तान का, किसी परिचारिका का नाम मेरे स्मरण में नहीं है लेकिन वो सब हवा में रहते हैं कि अपना नाम होगा पायलट बनेंगे तो, उल्लू बन जाते हैं बिचारे । और नाम सच्चा भी नहीं है, जन्म के बाद रखा गया था ।
मान पुड़ी है ज़हर की खाए सो मर जाए । चाह उसी की राखता वो भी अति दुःख पाये ।।
गुरुजी के संकेत की अवहेलना का फल –
दादू दीन दयाल के शिष्य थे केशवदास और गुरु के संकेत में क्या चमत्कार होता है ! दीन दयाल का सेवक जैसे यहाँ रसोड़ा सम्हालने वाले हैं न…शैलेन्द्र और वासु, ऐसा उनका कोई था शैलेन्द्र वासु, उसका नाम था केशवदास । मिट्टी के चूल्हे बनते हैं उसमें लकड़ियाँ डालते हैं रसोई में, तो चूल्हे की मिट्टी थोड़ी गिर गयी थी, चूल्हा थोड़ा टूट गया था । भोजन तो पूरा हो गया दोपहर का, केशवदास ने


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