asaram bapu
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आशाराम बापू को शत्-शत् अभिनन्दन |


यूँ तो धरा पर जन्म एक आम इंसान भी लेता है और वहीं एक जीव भी लेता है | पर उसके कर्म ही उसको दिव्य बनाते हैं | पूज्य गुरुदेव ने भी सत्संग में कई बार इसका वर्णन किया है “जन्म कर्म च में दिव्यं” अर्थात् उसके जन्म और कर्म दोनों ही दिव्य माने जाते हैं जो जीते जी परमात्मा के रास्ते चल पड़ता है और आत्मज्ञानी संतों की खोज करके अपने को ब्रह्म मस्ती में सराबोर कर परम पद को प्राप्त कर लेता है |

आज हम साधक भी धन्य हुए ऐसे गुरुदेव को पाकर जिन्होंने अपने जीवन काल में सदैव आत्म मस्ती  में रमण किया और जन जन तक इसका सन्देश पंहुचाया | स्वयं तो समाज सेवा और परहित के उत्थान में लगे ही रहे और सभी को इसका लाभ समझाया | बचपन से ही दैविक चमत्कारों से अनजान दुनियावालों को आकर्षित करने वाले पूज्य संत आज भी जन – जन के लोक लाडले और हिन्दू धर्म के हितैषी बनकर सबके दिलों पर राज कर रहे हैं | और उनके ही वचनों और संस्कारों का अनुसरण करते हुए उनके साधक भी समाज सेवा के कार्यों में नित्य प्रति उत्साह और जोश के साथ लगे रहते हैं |

यूँ तो बापूजी कहते हैं कि जन्म तो शरीर का होता है, आत्मा तो अजर-अमर-अविनाशी है पर भला उनके साधक कहाँ ये बात मानने वाले हैं | वो तो अपने गुरुदेव का जन्म दिवस मनाने हेतु कदम से कदम और ताल से ताल मिलाकर समाज सेवा के कार्यों में जोर-शोर से लगे हुए हैं और सदैव लगे रहते हैं |

ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की परम्पराओं पर दृष्टि डाली जाये तो वो आज के युग में भी जीवित है | आइये देखते हैं कैसे :

1) श्री राघवानंद जी महाराज

2) स्वामी रामानंद जी स्वामी

3) संत कबीर दास जी महाराज

4) संत कमाल साहिब

5) श्री दादू दीनदयाल जी महाराज

6) स्वामी निश्चलदास जी महाराज

7) स्वामी केशवानंद जी महाराज

8) स्वामी लीलाशाह जी महाराज

9) संत श्री आशारामजी बापू

गुरु स्वामी रामानंद जी महाराज की परम्परा अपने शिष्य संत कबीरदास जी पंथ से लेकर पूज्य संत श्री आशारामजी बापू जैसे महापुरुषों तक की ये संत परम्परा आज भी सजीव है । हमें विश्ववासियों को, भारत के सपूतों को इस सच्चाई से अवगत कराना होगा कि पूज्य संत श्री आशारामजी बापू कोई सामान्य संत नहीं हैं । ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की संत परम्परा हम आज भी प्रत्यक्ष देख सकते हैं |

हर युग में संतों पर श्रद्धा रखने वाले श्रधालु लाभ लेते आयें हैं वहीँ दूसरी ओर कुतर्की लोग संतों पर जुल्म भी करते आये हैं । लेकिन श्रद्धालुओं की आस्था कभी डिगाये नहीं डिगती क्योंकि श्रद्धा रखने वाले श्रद्धालुओं ने अपने जीवन में आदिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक लाभ एवं चमत्कार प्रत्यक्ष अनुभव किये हुए होते हैं इसलिए वे सत्पथ से कभी विचलित नहीं होते और अपने सत् धर्म का प्रचार-प्रसार करते चले जाते हैं ।

इसी तरह आज संत श्री आशारामजी बापू अपने 75 वर्षीय उम्र में भी लगातार 50 वर्षों से समाज हित के दैवी कार्य करते ही चले जा रहें हैं और आज कुतर्की और षड्यंत्रकारियों के कारण ऐसे महान संत को जेल में डाला गया । लेकिन उनके शिष्यों द्वारा समाज-उत्थान के कार्य आज भी प्रत्यक्ष हम विश्वभर में देख सकते हैं ।

जेल में होने के बावजूद ऐसे महान संत के दैवी कार्य बंद नहीं हुए हैं । आज भी कई जगह जप यज्ञ, भंडारे, जल सेवा, छाछ वितरण, कम्बल वितरण, हॉट केस आदि जीवनोपयोगी सामग्री जरूरतमंदों में वितरित की जाती है । साथ ही साथ बाल संस्कार, युवा सेवा संघ, महिला उत्थान कार्यक्रम, आश्रमों में पूजा-पाठ, भंडारा, योगासन आदि कई कार्यक्रम नित्यप्रति किये जा रहे हैं ।

कल आने वाले 10 अप्रैल 2015 को पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू के जन्मोत्सव को हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी “विश्व-सेवा दिवस” के रूप में मनाया जा रहा है  और जोधपुर में विशाल स्वच्छता अभियान भी पुरजोर तरीके से किया जा रहा है |

धन्य हैं ऐसे गुरुदेव और उनके ऐसे गुरुभक्त और उनकी सच्ची श्रद्धा और आस्था !! भारत के महान संतों-महापुरुषों को मेरा शत्-शत् नमन् !

 

 

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हजारों वर्षों से जीवित हैं सात महामानव


  1. बलि : असुरों के राजा बलि के दान के चर्चे दूर-दूर तक थे। देवताओं पर चढ़ाई करके राजा बलि ने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। और वह त्रिलोकाधिपति बन गया था। तीनों लोक पर राज करने वाला बलि असुरों के प्रति उदार और देवताओं के प्रति सख्त था। उसकी मनमानी से देवता तंग आ चुके थे। वह बहुत शक्तिशाली और घमंडी था। राजा बलि के घमंड को चूर करने के लिए भगवान विष्णु को वामन अवतार लेना पड़ा। भगवान ब्राह्मण का भेष धारण कर राजा बलि के समक्ष पहुंच गए, क्योंकि वह परमदानी था। भगवान ने उससे भिक्षा में तीन पग धरती दान में मांगी ली।

राजा बलि ने हंसते हुए कहा, ‘बस तीन पग? जहां आपकी इच्छा हो तीन पैर रख दो।’ तब भगवान ने अपना विराट रूप धारण कर दो पग में तीनों लोक नाप दिए और फिर बलि से पूछा अब बताओ तीसरा पग कहां रखूं अब तो तुम्हारे पास कोई जगह नहीं बची। तब बलि ने हाथ जोड़कर कहा प्रभु तीसरा पग मेरे सिर पर रख दो। अब यही बचा है मेरे पास। तब भगवान ने उसके वि‍नम्र उत्तर और दानी स्वभाव से प्रसंन्न होकर उसे चिरंजीवी रहने का वरदान दिया और उसके सिर पर पैर रखकर उसे पाताल लोक भेज दिया। बलि रसातल के राजा बन गए।

Raja Bali

  1. परशुराम : परशुराम को कौन नहीं जानता? राम के काल के पूर्व महान ऋषि रहे हैं परशुराम। उनके पिता का नाम जमदग्नि और माता का नाम रेणुका है। पति परायणा माता रेणुका ने पांच पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम क्रमशः वसुमान, वसुषेण, वसु, विश्वावसु तथा राम रखे गए। राम की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें फरसा दिया था इसीलिए उनका नाम परशुराम हो गया। भगवान पराशुराम राम के पूर्व हुए थे, लेकिन वे चिरंजीवी होने के कारण राम के काल में भी थे और कृष्ण के काल में भी थे।

भगवान परशुराम विष्णु के छठवें अवतार हैं। इनका प्रादुर्भाव वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ, इसलिए उक्त तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है। इनका जन्म समय सतयुग और त्रेता का संधिकाल माना जाता है। चक्रतीर्थ में किए कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तक तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया। कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है।

Parasuram

  1. हनुमान : अंजनी पुत्र हनुमान को भी अजर अमर रहने का वरदान मिला हुआ है। यह राम के काल में राम भगवान के परम भक्त रहे हैं। हजारों वर्षों बाद वे महाभारत काल में भी नजर आते हैं। महाभारत में प्रसंग है कि भीम उनकी पूंछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूंछ नहीं हटा पाता है। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के चालीसवें अध्याय में इस बारे में प्रकाश डाला गया है। लंका विजय कर अयोध्या लौटने पर जब श्रीराम उन्हें युद्घ में सहायता देने वाले विभीषण, सुग्रीव, अंगद आदि को कृतज्ञता स्वरूप उपहार देते हैं तो हनुमानजी श्रीराम से याचना करते हैं- यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय:।।

Hanuman ji

अर्थात : ‘हे वीर श्रीराम। इस पृथ्वी पर जब तक रामकथा प्रचलित रहे, तब तक निस्संदेह मेरे प्राण इस शरीर में बसे रहे।’ इस पर श्रीराम उन्हें आशीर्वाद देते हैं- ‘एवमेतत् कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशय:। चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका तावत् ते भविता कीर्ति: शरीरे प्यवस्तथा। लोकाहि यावत्स्थास्यन्ति तावत् स्थास्यन्ति में कथा।’ अर्थात् : ‘हे कपिश्रेष्ठ। ऐसा ही होगा। इसमें संदेह नहीं है। संसार में मेरी कथा जब तक प्रचलित रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति अमिट रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण भी रहेंगे ही। जब तक ये लोक बने रहेंगे, तब तक मेरी कथाएं भी स्थिर रहेगी।’

  1. विभीषण : रावण के छोटे भाई विभीषण, जिन्होंने राम के नाम की महिमा जपकर अपने भाई के विरु‍द्ध लड़ाई में उनका साथ दिया और जीवन भर राम नाम जपते रहे। कोटा के कैथून में विभीषण का एकमात्र मंदिर है।

Vibhishan

  1. ऋषि व्यास : महाभारतकार व्यास ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र थे, ये सांवले रंग के थे तथा यमुना के बीच स्थित एक द्वीप में उत्पन्न हुए थे। अतएव ये सांवले रंग के कारण ‘कृष्ण’ तथा जन्मस्थान के कारण ‘द्वैपायन’ कहलाए। इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्रवीर्य संतानहीन मर गया। कृष्ण द्वैपायन ने धार्मिक तथा वैराग्य का जीवन पसंद किया, किन्तु माता के आग्रह पर इन्होंने विचित्रवीर्य की दोनों सन्तानहीन रानियों द्वारा नियोग के नियम से दो पुत्र उत्पन्न किए जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाए, इनमें तीसरे विदुर भी थे। व्यासस्मृति के नाम से इनके द्वारा प्रणीत एक स्मृतिग्रन्थ भी है। भारतीय वांड्मय एवं हिन्दू-संस्कृति व्यासजी की ऋणी है।

Ved Vyas ji

  1. अश्वत्थामा : अश्वथामा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। अश्वस्थामा के माथे पर अमरमणि है और इसलिए वह अमर हैं, लेकिन अर्जुन ने वह अमरमणि निकाल ली थी। ब्रह्मास्त्र चलाने के कारण कृष्ण ने उन्हें शाप दिया था कि कल्पांत तक तुम इस धरती पर जीवित रहोगे, इसीलिए अश्वत्थामा सात चिरन्जीवियों में गिने जाते हैं। माना जाता है कि वे आज भी जीवित हैं तथा अपने कर्म के कारण भटक रहे हैं। हरियाणा के कुरुक्षेत्र एवं अन्य तीर्थों में यदा-कदा उनके दिखाई देने के दावे किए जाते रहे हैं। मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के किले में उनके दिखाई दिए जाने की घटना भी प्रचलित है।

Ashwathama

 

  1. कृपाचार्य : शरद्वान् गौतम के एक प्रसिद्ध पुत्र हुए हैं कृपाचार्य। कृपाचार्य अश्वथामा के मामा और कौरवों के कुलगुरु थे। शिकार खेलते हुए शांतनु को दो शिशु प्राप्त हुए। उन दोनों का नाम कृपी और कृप रखकर शांतनु ने उनका लालन-पालन किया। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की ओर से सक्रिय थे।

Kripacharya

श्लोक : ‘अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः॥’
अर्थात् : अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और भगवान परशुराम ये सभी चिरंजीवी हैं। ये इस कल्प के अंत तक इस पृथ्वी पर विद्यमान रहेंगे।

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राम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज


गोस्वामी तुलसीदास का जन्म- 1532 ई. में हुआ था । तुलसीदास एक साथ कवि, भक्त तथा समाज सुधारक तीनों रूपों में मान्य है।

इनकी राम भक्ती अटूट थी । इन्हें प्रत्यक्ष भगवान श्री हनुमानजी और उनके प्रभु श्री राम जी के दर्शन हुए थे, साथ ही साथ इन्हें श्री हनुमानजी की कृपा से अपनी आँखों से श्री राम लीला जो त्रेतायुग में घटी थी वो देखने को मिली थी | इन्होंने प्रभु श्री राम जी के दर्शन और उनकी करुणा से त्रेतायुग में घटी एक एक घटना को अपनी आँखों से देखा था ।

भगवान शंकर और माता पार्वति का भी इन पर बहुत अनुग्रह था | भगवान शंकर ने आदशक्ति माँ पार्वती जी के साथ प्रगट होकर इन्हें श्रीरामचरित्रमानस लिखने की आज्ञा की थी ।

इन्हें भगवान वेदव्यास का अंशअवतार भी माना जाता है । कहते हैं अपने शास्त्रों को सरल रीती से समाज को समझाने के लिए इनका जन्म हुआ था ।चित्रकूट के घाट पर इन्हें प्रभु श्रीराम के दर्शन हुए थे । वो कथा भी बडी रोचक है । इनके द्वारा विरचित भगवान श्री राम को समर्पित श्रीरामचरितमानस को समस्त भारत में बड़े भक्तिभाव से पढ़ा जाता है। इसके बाद विनय पत्रिका तुलसीदासकृत एक अन्य महत्वपूर्ण काव्य है।

तुलसीदासजी का जन्म संवत 1589 को उत्तर प्रदेश (वर्तमान बाँदा ज़िला) के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। पैदा होते ही इनके चेहरे पर अनुपम तेज था । कहा जाता है की इनके जन्मजात ही दाँत और आँखों में विशेष प्रकार की चमक भी थी । इनके इस रूप को देखकर सभी थोडा घबरा भी रहे थे पर इनके पिता राजपुर के नामचिन ज्योतिष भी थे । जब उन्होंने इनकी कुंडली बनाई तो देखा की इनके जीवन में बचपन से ही मातृ-पितृ स्नेह नहीं है अर्थात इनके जन्म से कुछ समय पश्चात ही इनके माता पिता का देहांत हो गया था । बचपन में बडे दुख से समय इनका कटा । इनकी ऐसी दशा और प्रकाशमय मुख को देखकर इनके गुरु को इन्हें समझते देर ना लगी । भगवान श्री रामानंद संप्रदाय के सदगुरुदेव बाबा श्री नरहरीदास जी इन्हें अपने आश्रम ले आये और वहीें इन्हें संस्कृत का ज्ञान भी देने लगे | साथ ही साथ श्री राम चरीत्र रामायण का भी पाठ करवाने लगे ।

गोस्वामी जी अपने गुरुदेव के बारे में लिखते हैं कि भगवान जब कलम लेकर भाग्य लिख रहे थे तब सभी मानव नंबर से भगवान से भाग्य अपने माथे पर लिखवा रहे थे जब मेरा नंबर आया तो भगवान की कलम में स्याही खत्म हो गयी तो भगवान ने मेरा भाग्य कोरा ही छोड दिया | मेरे नसीब में तो कुछ ना था पर मेरे गुरुदेव स्वामी को दया आ गयी । एक दिन कलम लेकर बैठे थे कुछ लिखने को कागज न था तो मेरा कोरा मस्तक देखकर उन्होने मेरा भाग्य लिख डाला । कैसी अन्न्य गुरुप्रेम था गोस्वामी जी में ।

गोस्वामी जी की युवा अवस्था आने पर उनका विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। अपनी पत्नी रत्नावली से अत्यधिक प्रेम के कारण तुलसी को रत्नावली की फटकार सुननी पड़ी ।

हाड माँस की देह मम, ता में इतनी प्रीती ।

याते आधी राम में, तो कबहु ना लगे भवभीती ।।

“लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ”

इस फटकार के बाद से जैसे इनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। पत्नी के उपदेश से तुलसी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी तथा अयोध्या में बीता ।

पत्नी परिवार सब छोडकर ये चित्रकूट चले गये | वहाँ कई दिनों तक उपवास करते रहे और राम नाम का अविरत जाप करते रहे । भगवान राम के दर्शन की इन्हें अनुपम लालसा थी | वहाँ ये प्रतिदिन एक वृक्ष पर एक लोटा पानी डालते थे | अचानक एक दिन इनकी राम भक्ति और इनके हाथों के स्पर्श जल से उस वृक्ष में स्थित प्रेत कि मुक्ती हो गयी | जाते समय उसने इन्हें कुछ देना चाहा पर तुलसी दास जी ने उस प्रेत से केवल श्री राम दरश की आश ही व्यक्त की | तब उसने कहा की हम अधोगती मे रहने वाले जीव उस परमेश्वर को देख नहीं पाते पर श्री हनुमानजी यहीँ इसी धरा पर घूमते रहते हैं । जहाँ भी श्रीराम कथा होती है वहाँ वे अवश्य जाते हैं । आप इसी चित्रकुट में राम कथा में जायें वहाँ जो सबसे पीछे कोढी के रूप में बैठते हैं वो श्री हनुमानजी ही हैं | आप श्रद्धा भक्ति से उनकी शरण जाइये और उनके चरणों को तब तक ना छोडियेगा जब तक वो अपने दर्शन आपको ना दें । ऐसा ही हुआ, गोस्वामी जी ने रामकथा में छिपे श्री हनुमानजी को पहचान लिया और उनका अनुपम दर्शन प्राप्त किया । श्री हनुमानजी से इन्होंने प्रभु श्रीराम के दर्शन की आशा व्यक्त की | तब श्री हनुमानजी ने इन्हें चित्रकुट के घाट पर चंदन घिसने को कहा और कहा, “प्रभु से मैं प्रार्थना करूँगा, वहाँ प्रभु जरूर आयेंगे । आप उन्हें पहचान लेना ।” तुलसी दास जी भी चित्रकुट के घाट पर चंदन घिसने का कार्य करने लगे | एक दिन प्रभु वहाँ पधारे और चंदन लगाने को माँगा तब तुलसी दास जी महाराज कहीं चूक ना जायें इस लिए हनुमानजी ने एक तोते के रूप में ये चौपाई गानी शुरु की ।

चित्रकुट के घाट पर भयी संतन की भीड, तुलसी दास चंदन घिसे तिलक करे रघुबीर ।

Shri Ram Hanuman

प्रभु को पहचानकर उनके चरणों में गिरे ये भक्तराज और प्रभु श्री राम ने इन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिये । प्रभु के चरित्र दर्शन की आशा व्यक्त करने पर प्रभु ने इन्हें त्रेता में घटे पूरे रामायण चरित्र का प्रत्यक्ष दर्शन कराया । इन्होंने समाज के बहुत विरोध के बावजूद भी श्री रामायण जी की रचना की और प्रभु का चरित्र लिखा । पर वो संस्कृत में होने के कारण प्रभु ने इन्हें उसे सरल भाषा में अनुवादित करने की आज्ञा दी । भगवान शंकर और माता पार्वति ने भी इन्हें दर्शन देकर प्रभु का चरित्र लिखने में सहायता की और आशिर्वाद भी दिया । इन्होंने फिर सरल भाषा में प्रभु श्रीराम का चरित्र श्री रामचरित्र मानस का ग्रंथ लिखा जो समाज में आज भी अति लोकप्रिय है । कहते है जब इन्होंने रामायण की चौपाईयाँ गाकर लोगों को सुनाना प्रारंभ किया तो इनके पास भीड बढने लगी । इससे दुखी होकर काशी के विद्वानों ने इनके द्वारा रचित ग्रंथ रामायण जी की निंदा शुरु कर दी । विरोध इस कदर बढा के लोगों ने इनसे प्रमाण मांगना प्रारंभ कर दिया | इनके द्वारा रचित रामचरित्र मानस को काशी विश्वनाथ के मंदिर में रखा गया । प्रातः जब पट खोले गये तब उस पर प्रभु भगवान शंकर के हस्ताक्षर और उस ग्रंथ के चारों और अनुपम प्रकाश तेजोवलय पाया गया । उस ग्रंथ पर प्रभु भगवान शंकर के हस्ताक्षर में सत्यं शिवं सुंदरम लिखा था जिसे देखकर तब से तुलसी दास जी महाराज को सब बडी श्रद्धा से मानने लगे ।

इनकी प्रसिद्धी उस समय के मुगल बादशाहों से बर्दाश्त नहीं हुई और इन संत को बिना किसी कारण के सताने का प्रयास किया | कहते हैं तुलसी दास जी के जीवन में कई चमत्कार घटे | जब इन्हें मुगल बादशाह के आदेश पर मुगल सैनिक पकडने आये तो चमत्कार के रूप में इन्होंने भगवान शंकर के नंदी के सामने प्रसाद रखा तो नंदी की मुर्ती ने जीभ निकालकर उस प्रसाद को ग्रहण किया पर इतने पर भी मुगल बादशाह का इन पर विश्वास न हुआ तो इनको पकडकर जेल में डाल दिया गया और चमत्कार दिखाने को कहा गया | तुलसी दास जी ने कहा हम तो साधारण मेरे प्रभु राम के सेवक हैं पर जब बादशाह न माना तो तुलसी दास जी ने उपवास के साथ रामनाम जप प्रारंभ कर दिया | 24 घंटे के अंदर मुगल सल्तनत में हजारों वानरों की सैना घुस आयी और वहाँ उत्पात मचाना प्रारंभ कर दिया | आखिरकार मुगल बादशाह को इनहें बाईज्जत छोडना पडा । इन पर भी लांछन लगाने में समाज के लोगों ने कोई कमी न छोडी थी | सच्चे संतों को हयाती काल में पहचान पाना बडा मुश्किल होता है । पर उनके चले जाने के बाद समाज उनका गुणगान करता रहता है ।

प्रभु धाम गमन 

तुलसीदास जी जब काशी के विख्यात् असीघाट पर रहने लगे तो एक रात कलियुग मूर्त रूप धारण कर उनके पास आया और उन्हें पीड़ा पहुँचाने लगा। तुलसीदास जी ने उसी समय हनुमान जी का ध्यान किया। हनुमान जी ने साक्षात् प्रकट होकर उन्हें प्रार्थना के पद रचने को कहा, इसके पश्चात् उन्होंने अपनी अन्तिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। श्रीराम जी ने उस पर स्वयं अपने हस्ताक्षर कर दिये और तुलसीदास जी को निर्भय कर दिया। संवत्‌ 1680 में श्रावण कृष्ण सप्तमी शनिवार को तुलसीदास जी ने “राम-राम” कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया और भगवान में विलीन हो गये । आज उनके द्वारा प्रभु श्री राम का चरित्र हम सबके दिलों में हैं और ऐसे संतों का महान योगदान भारत को, भारतीय संस्कृति को बचाये रखना और समाज तक पहुँचाना ये महान कार्य था । समाज को भक्ति रस में सराबोर कर दिया गोस्वामी जी ने । समाज को ईश्वर शक्ति का विश्वास दिलाया गोस्वामी जी ने । समाज में छुपि कूरितियों को हटाकर सत्य मार्ग दिखाया गोस्वामी जी ने ।

आज भले ही गोस्वामी तुलसीदास जी हमारे बीच नहीं है पर उनके द्वारा विरचित ग्रंथों ने हमारे हृदय और हमारे घरों में अपना स्थान बनाया हुआ है ।

ऐसे सच्चे महापुरुष कभी कभी धरती पर आते हैं उन्हें पहचानने के लिए केवल आँखें नहीं वो नजर भी चाहिए जिससे उन्हें पहचाना जा सके ।

संवत सोलह सौ असी ,असी गंग के तीर ।

श्रावण शुक्ला सप्तमी ,तुलसी तज्यो शरीर ।

आज संत आशारामजी बापू जैसे संतों को भी जेल में रखकर सताया जा रहा है | कहीं हम देश के एक महान संत को पहचानने में भूल तो नहीं कर रहे । ऐसे महापुरुषों को हयाती काल में तो सताती है दुनिया पर उनके चले जाने पर सोने चाँदी की मुर्ति बनाती है दूनिया । उनके बनाये ग्रंथों पर पीएचडी तो कर सकते हो आप पर संत तुलसी दास कहाँ से पाओगे ? कहाँ से पाओगे आज ?

जरूरी है संतों महापुरुषों के रहते हुए उनको पहचानकर अपना आत्म कल्याण करना । जो विरले ही कर पाते हैं ।

 

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