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भगवान नाम जप के 20 नियम !


भगवान नाम जप के 20 नियम …जप के नियम जो इस प्रकार हैं : –

  1. जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक गुरू द्वारा प्राप्त मंत्र की अथवा किसी भी मंत्र की अथवा परमात्मा के किसी भी एक नाम की 1 से 200 माला जप करो।

  2. रूद्राक्ष अथवा तुलसी की माला का उपयोग करो।

  3. माला फिराने के लिए दाएँ हाथ के अँगूठे और बिचली (मध्यमा) या अनामिका उँगली का ही उपयोग करो।

  4. माला नाभि के नीचे नहीं लटकनी चाहिए। मालायुक्त दायाँ हाथ हृदय के पास अथवा नाक के पास रखो।

  5. माला ढंके रखो, जिससे वह तुम्हें या अन्य के देखने में न आये। गौमुखी अथवा स्वच्छ वस्त्र का उपयोग करो।

  6. एक माला का जप पूरा हो, फिर माला को घुमा दो। सुमेरू के मनके को लांघना नहीं चाहिए।

  7. जहाँ तक सम्भव हो वहाँ तक मानसिक जप करो। यदि मन चंचल हो जाय तो जप जितने जल्दी हो सके, प्रारम्भ कर दो।

  8. प्रातः काल जप के लिए बैठने के पूर्व या तो स्नान कर लो अथवा हाथ पैर मुँह धो डालो। मध्यान्ह अथवा सन्ध्या काल में यह कार्य जरूरी नहीं, परन्तु संभव हो तो हाथ पैर अवश्य धो लेना चाहिए। जब कभी समय मिले जप करते रहो। मुख्यतः प्रातःकाल, मध्यान्ह तथा सन्ध्याकाल और रात्रि में सोने के पहले जप अवश्य करना चाहिए।

  9. जप के साथ या तो अपने आराध्य देव का ध्यान करो अथवा तो प्राणायाम करो। अपने आराध्यदेव का चित्र अथवा प्रतिमा अपने सम्मुख रखो।

  10. जब तुम जप कर रहे हो, उस समय मंत्र के अर्थ पर विचार करते रहो।

  11. मंत्र के प्रत्येक अक्षर का बराबर सच्चे रूप में उच्चारण करो।

  12. मंत्रजप न तो बहुत जल्दी और न तो बहुत धीरे करो। जब तुम्हारा मन चंचल बन जाय तब अपने जप की गति बढ़ा दी।

  13. जप के समय मौन धारण करो और उस समय अपने सांसारिक कार्यों के साथ सम्बन्ध न रखो।

  14. पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुँह रखो। जब तक हो सके तब तक प्रतिदिन एक ही स्थान पर एक ही समय जप के लिए आसनस्थ होकर बैठो। मंदिर, नदी का किनारा अथवा बरगद, पीपल के वृक्ष के नीचे की जगह जप करने के लिए योग्य स्थान है।

  15. भगवान के पास किसी सांसारिक वस्तु की याचना न करो।

  16. जब तुम जप कर रहे हो उस समय ऐसा अनुभव करो कि भगवान की करूणा से तुम्हारा हृदय निर्मल होता जा रहा है और चित्त सुदृढ़ बन रहा है।

  17. अपने गुरूमंत्र को सबके सामने प्रकट न करो।

  18. जप के समय एक ही आसन पर हिले-डुले बिना ही स्थिर बैठने का अभ्यास करो।

  19. जप का नियमित हिसाब रखो। उसकी संख्या को क्रमशः धीरे-धीरे बढ़ाने का प्रयत्न करो।

  20. मानसिक जप को सदा जारी रखने का प्रयत्न करो। जब तुम अपना कार्य कर रहे हो, उस समय भी मन से जप करते रहो।

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पूजा में ध्यान रखने योग्य बातें !


पूजा साधना करते समय बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन पर सामान्यतः हमारा ध्यान नही जाता है लेकिन पूजा साधना की द्रष्टि से ये बातें अति महत्वपूर्ण हैं |

शास्त्रो में बांस की लकड़ी जलाना मना है फिर भी लोग अगरबत्ती जलाते है, जो कि बांस की बनी होती है। अगरबत्ती जलाने से पितृदोष लगता है। शास्त्रो में पूजन विधान में कही भी अगरबत्ती का उल्लेख नहीं मिलता | सब जगह धूप ही लिखा हुआ मिलता है। अगरबत्ती तो केमिकल से बनाई जाती है भला केमिकल या बांस जलने से भगवान खुस कैसे होंगे ? अगरबत्ती जलाना बांध करे सब पंडित लोग। पूजन सामग्री में जब आप यजमान को अगरबत्ती लिख कर देंगे ही नहीं तो जलाने का सवाल ही नहीं। इस सत्य से यजमानो को अवगत कराये। आजकल लोगो को पितृ दोष बहुत होते है इसका एक कारण अगरबत्ती का जलना भी है।

1.       गणेशजी को तुलसी का पत्र छोड़कर सब पत्र प्रिय हैं | भैरव की पूजा में तुलसी का ग्रहण नही है|
2.       कुंद का पुष्प शिव को माघ महीने को छोडकर निषेध है |

3.       बिना स्नान किये जो तुलसी पत्र जो तोड़ता है उसे देवता स्वीकार नही करते |

4.       रविवार को दूर्वा नही तोडनी चाहिए |

5.       केतकी पुष्प शिव को नही चढ़ाना चाहिए |

6.       केतकी पुष्प से कार्तिक माह में विष्णु की पूजा अवश्य करें |

7.       देवताओं के सामने प्रज्जवलित दीप को बुझाना नही चाहिए |

8.       शालिग्राम का आवाह्न तथा विसर्जन नही होता |

9.       जो मूर्ति स्थापित हो उसमे आवाहन और विसर्जन नही होता |

10.   तुलसीपत्र को मध्याहोंन्त्तर ग्रहण न करें |

11.   पूजा करते समय यदि गुरुदेव ,ज्येष्ठ व्यक्ति या पूज्य व्यक्ति आ जाए तो उनको उठ कर प्रणाम कर उनकी आज्ञा से शेष कर्म को समाप्त करें |

12.   मिट्टी की मूर्ति का आवाहन और विसर्जन होता है और अंत में शास्त्रीयविधि से गंगा प्रवाह भी किया जाता है |

13.   कमल को पांच रात ,बिल्वपत्र को दस रात और तुलसी को ग्यारह रात बाद शुद्ध करके पूजन के कार्य में लिया जा सकता है |

14.   पंचामृत में यदि सब वस्तु प्राप्त न हो सके तो केवल दुग्ध से स्नान कराने मात्र से पंचामृतजन्य फल जाता है |

15.   शालिग्राम पर अक्षत नही चढ़ता | लाल रंग मिश्रित चावल चढ़ाया जा सकता है |

16.   हाथ में धारण किये पुष्प , तांबे के पात्र में चन्दन और चर्म पात्र में गंगाजल अपवित्र हो जाते हैं |

17.   पिघला हुआ घृत और पतला चन्दन नही चढ़ाना चाहिए |

18.   दीपक से दीपक को जलाने से प्राणी दरिद्र और रोगी होता है | दक्षिणाभिमुख दीपक को न रखे | देवी के बाएं और दाहिने दीपक रखें | दीपक से अगरबत्ती जलाना भी दरिद्रता का कारक होता है |

19.    द्वादशी , संक्रांति , रविवार , पक्षान्त और संध्याकाळ में तुलसीपत्र न तोड़ें |

20.   प्रतिदिन की पूजा में सफलता के लिए दक्षिणा अवश्य चढाएं |

21.   आसन , शयन , दान , भोजन , वस्त्र संग्रह , ,विवाद और विवाह के समयों पर छींक शुभ मानी गयी है |

22.   जो मलिन वस्त्र पहनकर , मूषक आदि के काटे वस्त्र  , केशादि बाल कर्तन युक्त और मुख दुर्गन्ध युक्त हो, जप आदि करता है उसे देवता नाश कर देते हैं |

23.   मिट्टी , गोबर को निशा में और प्रदोषकाल में गोमूत्र को ग्रहण न करें |

24.   मूर्ती स्नान में मूर्ती को अंगूठे से न रगड़े ।

25.   पीपल को नित्य नमस्कार पूर्वाह्न के पश्चात् दोपहर में ही करना चाहिए | इसके बाद न करें |
26.   जहाँ अपूज्यों की पूजा होती है और विद्वानों का अनादर होता है , उस स्थान पर दुर्भिक्ष , मरण , और भय उत्पन्न होता है |

27.   पौष मास की शुक्ल दशमी तिथि , चैत्र की शुक्ल पंचमी और श्रावण की पूर्णिमा तिथि को लक्ष्मी प्राप्ति के लिए लक्ष्मी का पूजन करें |

28.   कृष्णपक्ष में , रिक्तिका तिथि में , श्रवणादी नक्षत्र में लक्ष्मी की पूजा न करें |

29.   अपराह्नकाल में , रात्रि में , कृष्ण पक्ष में , द्वादशी तिथि में और अष्टमी को लक्ष्मी का पूजन प्रारम्भ न करें |

30.   मंडप के नव भाग होते हैं , वे सब बराबर-बराबर के होते हैं अर्थात् मंडप सब तरफ से चतुरासन होता है | अर्थात् टेढ़ा नही होता |

31.   जिस कुंड की श्रृंगार द्वारा रचना नही होती वह यजमान का नाश करता है |

 

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गुरूभक्त का लक्ष्य !!


हर गुरूभक्त को पढ़ना चाहिए..

शिष्य का एक ही लक्ष्य होता है, पूर्ण रूप से गुरु मे विलीन हो जाना | अपना संपूर्ण अस्तित्व को समाप्त कर पूर्ण गुरुरूपेण हो जाना | इस सत्य को वही समझ सकते हैं,जिन्होने गुरु भक्ति एवं गुरु तत्व को जीवन मे अपनाया है | शेष वे लोग जो साधना को मात्र चमत्कार दिखाने वाली सिद्धि प्राप्त करने का माध्यम मानते है, यह सत्य उनके समझ नही आएगा |

एक गुरु भक्त को चाहिए कि वे बार-बार गुरु से मिले, चाहे काम हो या ना हो | जिससे कि वे गुरु से दीक्षा ले और सतत साधना करता हुआ अनेक बार दीक्षा ले | दीक्षा/शक्तिपात द्वारा गुरुदेव शिष्य के कर्म काट कर उसके चित्त को स्वच्छ-उज्जवल बनाते है | साधना के पथ पर आगे बढ़ाते हैं |
शिष्य को चाहिए कि वो गुरु मंत्र का रोज जाप करे, नियमित-निरंतर-निर्बाध रूप से गुरु मंत्र का जाप करे | गुरु मंत्र से शिष्य का जीवन तर जाता है | अंतःकरण का परिष्कार होता है, कर्म बंधन शिथिल होते है, चक्रों मे उर्जा आती है, कुण्डलिनी जागरण होता है | गुरु मंत्र का महात्म लिखना इस कागज कलम के बस की बात नही | कई गुरु भाई गुरुमंत्र जप द्वारा साक्षात सद्गुरुदेव के दर्शन करते हैं | किसी ख़ास विधि की जरूरत नही, ज़रूरत है बस श्रद्धा-समर्पण-विश्वास की नियमितता-निरंतरता की |

शिष्य को चाहिए कि वे गुरु-सेवा करे | यदि साक्षात गुरु से मिलना संभव ना हो तो गुरु का कार्य ही गुरु की सच्ची सेवा होती है | शिष्य पूरे तन-मन धन से गुरु का कार्य करे | गुरु कार्य में अपना समय-धन-श्रम-साधन-परिवार को होम कर दे | गुरु के संतोष मात्र से शिष्य के करोड़ो जन्मो के व्रत-अनुष्ठान सफल हो जाते हैं |

शिष्य को बीज बनना चाहिए | एक बीज मे पूर्ण वृक्ष होने की क्षमता होती हैं, परन्तु वह कुछ प्राप्त नही करना चाहता | एक बीज तो सिर्फ़ गलना जानता है, अपने आप को मिट्टी मे मिला देना और समाप्त कर देना ही बीज का उद्देश्य होता है और वो कर भी देता है | फिर ईश्वर खाद-पानी की दिव्य वर्षा कर उस मिट चुके बीज को वृक्ष होने का वरदान देते है | कल का छोटा सा बीज आज पूर्ण वृक्ष बन जाता है, छाँव देता है, फल देता है, और अपने जैसे अनेक नये बीज पैदा कर देता है| शिष्य को भी बीज रूप मे गलना-ढ़लना चाहिए | काम-क्रोध-मद-लोभ-दंभ-दुर्भाव-अहंकार को समाप्त करते हुए अपने अस्तित्व को गुरु चरणों में न्यौछावर कर दें | जैसे ही हमारा समर्पण पूर्ण होता है, गुरुकृपा की अमृत वर्षा होती है और वो शिष्य को पूर्ण वृक्ष मे बदल देती है | शिष्य को पूर्णता का वरदान मिलता है और वो निखिलमय हो जाता है |

शिष्य को चाहिए कि वो नदी की तरह बहना सीखे | एक नदी तब-तक बहती रहती है जब तक वो समुद्र से मिल नही जाती | रास्ते मे आने वाली हर बाधा को पार करती हुई नदी समुद्र मे मिल कर शांत हो जाती है | शिष्य को भी नदी की भांति सदैव साधना पुरुषार्थ मे लगे रहना चाहिए जब तक वह परमात्मा मे पूर्ण रूप से समाहित नही हो जाता | रास्ते में आने वाली हर बाधा घर-परिवार-रिश्तेदार-आंतरिक दुर्बलता-बाहरी विपत्ति को पार करता हुआ वीर भाव से सतत साधनात्मक पुरुषार्थ करता हुआ जीवन भर चलता रहे | ना रुके ना थके तो वो भी एक ना एक दिन समुद्र मे अवश्य समाहित हो जाएगा |

एक शिष्य को सदैव इन 5 बातों का ध्यान रखना चाहिए :
1) अहंकार की समाप्ति
2) आसक्ति की समाप्ति
3) मोह की समाप्ति
4) अपस्मा-चोरी करने की प्रवृति की समाप्ति
5) गुरु भक्ति मे कभी किसी परिस्थिति में भी न्यूनता ना आने देना…

रोज रात मे सोने से पहले अपना आत्मनिरीक्षण कर देखना चाहिए कि आज मैने अहंकार, आसक्ति, मोह, अपस्मा, भक्ति मे कुछ गड़बड़ तो नही करी | ग़लतियों के लिए गुरुदेव से क्षमा माँगते हुए फिर ना करने का संकल्प लेना चाहियें | इस प्रकार साधक-शिष्य-गुरुमय होता हुआ अपने लक्ष को अवश्य ही पा लेता है |

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ॐ की महिमा !


ॐ , ओउम् तीन अक्षरों से बना है।

“अ उ म्” ।

“अ” का अर्थ है उत्पन्न होना,

“उ” का तात्पर्य है उठना, उड़ना अर्थात् विकास,

“म” का मतलब है मौन हो जाना अर्थात् “ब्रह्मलीन” हो जाना।

ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और पूरी सृष्टि का द्योतक है।

ॐ का उच्चारण शारीरिक लाभ प्रदान करता है।

जानिए “ॐ”  कैसे है स्वास्थ्यवर्द्धक और अपनाएं आरोग्य के लिए ॐ के उच्चारण का मार्ग…

  1. ॐ और थायराॅयडः-
    ॐ का उच्‍चारण करने से गले में कंपन पैदा होती है जो थायरायड ग्रंथि पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।

  2. ॐ और घबराहटः-
    अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ॐ के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं।

  3. ॐ और तनावः-
    यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है।

  4. ॐ और खून का प्रवाहः-
    यह हृदय और ख़ून के प्रवाह को संतुलित रखता है।

  5. ॐ और पाचनः-
    ॐ के उच्चारण से पाचन शक्ति तेज़ होती है।

  6. ॐ लाए स्फूर्तिः-
    इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है।

  7. ॐ और थकान:-
    थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं।

  8. ॐ और नींदः-
    नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है। रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चिंत नींद आएगी।

  9. ॐ और फेफड़े:-
    कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मज़बूती आती है।

  10. ॐ और रीढ़ की हड्डी:-
    ॐ के पहले शब्‍द का उच्‍चारण करने से कंपन पैदा होती है। इन कंपन से रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है और इसकी क्षमता बढ़ जाती है।

  11. ॐ दूर करे तनावः-
    ॐ का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव-रहित हो जाता है।

आशा है आप अब कुछ समय जरुर ॐ का उच्चारण  करेंगे। साथ ही साथ इसे उन लोगों तक भी जरूर पहुंचायेगे जिनकी आपको फिक्र है |
“पहला सुख निरोगी काया” !!

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भगवान की खोज !


अकबर ने बीरबल के सामने अचानक एक दिन 3 प्रश्न उछाल दिये।
प्रश्न यह थे –
1) “भगवान कहाँ रहता है?
2) वह कैसे मिलता है ? और
3) वह करता क्या है?”

बीरबल इन प्रश्नों को सुनकर सकपका गये और बोले – ”जहाँपनाह ! इन प्रश्नों  के उत्तर मैं कल आपको दूँगा।”

जब बीरबल घर पहुँचे तो वह बहुत उदास थे। उनके पुत्र ने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया –

”बेटा! आज बादशाह ने मुझसे एक साथ तीन प्रश्न पूंछे हैं :
✅ ‘भगवान कहाँ रहता है?
✅ वह कैसे मिलता है?
✅ और वह करता क्या है?’

मुझे उनके उत्तर सूझ नही रहे हैं और कल दरबार में इनका उत्तर देना है।”

बीरबल के पुत्र ने कहा – ”पिता जी ! कल आप मुझे दरबार में अपने साथ ले चलना मैं बादशाह के प्रश्नों के उत्तर दूँगा।” पुत्र की हठ के कारण बीरबल अगले दिन अपने पुत्र को साथ लेकर दरबार में पहुँचे। बीरबल को देख कर बादशाह अकबर ने कहा – ”बीरबल मेरे प्रश्नों के उत्तर दो। बीरबल ने कहा – ”जहाँपनाह आपके प्रश्नों के उत्तर तो मेरा पुत्र भी दे सकता है।”

अकबर ने बीरबल के पुत्र से पहला प्रश्न पूछा – “बताओ ! ‘भगवान कहाँ रहता है?”

बीरबल के पुत्र ने एक गिलास शक्कर मिला हुआ दूध बादशाह से मँगवाया और कहा – जहाँपनाह दूध कैसा है ?

अकबर ने दूध चखा और कहा कि ये मीठा है। परन्तु बादशाह सलामत क्या आपको इसमें शक्कर दिखाई दे रही है ?

बादशाह बोले नही। वह तो घुल गयी।

जी हाँ, जहाँपनाह ! भगवान भी इसी प्रकार संसार की हर वस्तु में रहता है। जैसे शक्कर दूध में घुल गयी है और वह दिखाई नही दे रही है।

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब दूसरे प्रश्न का उत्तर पूछा – ”बताओ ! भगवान मिलता केैसे है ?” बालक ने कहा – ”जहाँपनाह थोड़ा दही मँगवाइए।”

” बादशाह ने दही मँगवाया तो बीरबल के पुत्र ने कहा – ”जहाँपनाह ! क्या आपको इसमें मक्खन दिखाई दे रहा है ?

बादशाह ने कहा – ”मक्खन तो दही में है पर इसको मथने पर ही दिखाई देगा।”

बालक ने कहा – ”जहाँपनाह ! मन्थन करने पर ही भगवान के दर्शन हो सकते हैं।”

बादशाह ने सन्तुष्ट होकर अब अन्तिम प्रश्न का उत्तर पूछा – ”बताओ ! भगवान करता क्या है?”

बीरबल के पुत्र ने कहा – ”महाराज ! इसके लिए आपको मुझे अपना गुरू स्वीकार करना पड़ेगा।”

अकबर बोले – ”ठीक है, आप गुरू और मैं आप का शिष्य।”

अब बालक ने कहा – ”जहाँपनाह गुरू तो ऊँचे आसन पर बैठता है और शिष्य नीचे।

अकबर ने बालक के लिए सिंहासन खाली कर दिया और स्वयं नीचे बैठ गये।

अब बालक ने सिंहासन पर बैठ कर कहा – ”महाराज ! आपके अन्तिम प्रश्न का उत्तर तो यही है।”

अकबर बोले- ”क्या मतलब ? मैं कुछ समझा नहीं।”

बालक ने कहा – ”जहाँपनाह ! भगवान यही तो करता है। “पल भर में राजा को रंक बना देता है और भिखारी को सम्राट बना देता है।”

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