Uttam Swasthya

A Simpler Way To Fix Nutritional Imbalance


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You are constantly in search of that perfect diet. The diet that is super easy to follow, let you eat what you want, won’t force you to eat or not eat anything and also provide you with stunning fat loss results in record time. Well, let me make this quick and painful – such a diet doesn’t exist. Sad, I know but there’s not much you can do about it. The human body has certain unbreakable rules that help it function optimally and “Do not entertain any ridiculous physiological demands” is one of them.

The thing is that there is no one perfect diet. Everybody is different and every body is different. This is why you often hear about something working for someone you know but when you try it, you see hardly any changes. But the point isn’t to randomly start a diet and sit around fingers crossed hoping for results. The point is to find what works for you and build on that to arrive at a plan that will provide you with health, fitness and happiness in the long term.

First, some very basic science. In order to function optimally, the human body needs nutrients – proteins, carbohydrates, fats, vitamins and minerals – which we get from food. While experts from different camps constantly fight about which is the most important nutrient, the truth, as demonstrated by our ancestors, is that we need all these nutrients in order to thrive. It is true that the body can make do without one or few of them, but survival is not what we’re interested in anymore. We are in search of optimal health and for that we need enough of all these nutrients.

In other words, if you can find a way to consume meals that contain adequate quantities of carbohydrates, fats, protein, vitamins and minerals, your health and body should be in fairly good shape (assuming other factors like food quality, exercise, sleep and stress are taken care of). But the trick is in ensuring that you get enough of all these nutrients because the way things are today, it is highly probable you are getting too much of some nutrients and very little of the others. This balancing act is where the magic is but for most people, this is not easy.

Conventional approaches based on calories and percentages require a lot of planning, will power and self control and hence people resort to trying highly marketed diets or using a plan that worked for a friend or emptying their wallets to celebrity nutritionists. But, in reality, there is a much simpler way to fix this nutritional imbalance.

Step 1: Look into your diet and find what you get too much and too little of.

Step 2: Reduce what you get too much of and increase what you get too little of.

For example, if your diet is dominated by carbohydrates (upma, roti, rice, sweets, fruits etc) and is deficient in protein (milk, curd,etc), your solution is to eat lesser carbohydrates and more protein. If you get too much protein and very little carbohydrates, then you do the opposite. You get the idea.

I know it sounds too simple to be effective but trust me when I say it is not the giant leaps but these seemingly small yet consistent steps that take you closer to your goals.

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Mangalmay Channel, Uttam Swasthya

अच्छा स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए


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याद रखने लायक कुछ बातें :-

  • औषधियां बीमारियों से ज्यादा खतरनाक होती हैं इसलिए औषधियों का उपयोग ज्यादा नहीं करना चाहिए।
  • स्वस्थ रहने के लिए पर्याप्त जगह, शुद्ध वायु, शुद्ध जल, धूप, व्यायाम तथा शारीरिक क्रिया करना बहुत ही आवश्यक हैं तथा इसके बाद उचित भोजन का करना आवश्यक है।
  • भोजन, नींद, व्यायाम तथा विश्राम सम्बंधी नियमों का पालन करना चाहिए तभी स्वास्थ्य ठीक प्रकार से बना रह सकता है।
  • किसी भी बीमार व्यक्ति के लिए जल औषधि तथा आहार दवा के सामान होता है अत:किसी भी बीमारी को ठीक करने के लिए इनका उपयोग अधिक करना चाहिए।
  • किसी भी बीमारी को ठीक करने के लिए उपवास चिकित्सा का महत्वपूर्ण अंग है इस के द्वारा कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
  • किसी भी व्यक्ति को कोई भी कार्य करने के लिए जल्दबाजी नहीं करना चाहिए।
  • स्वस्थ रहने के लिए चिंता-फिक्र का त्याग कर देना चाहिए।
  • तेज मसालेदार तथा चिकनाई युक्त सब्जियां व्यक्ति को बीमार कर देती हैं इसलिए इन चीजों का बहुत ही कम उपयोग करना चाहिए।

अच्छा स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए कुछ आवश्यक बातों पर नजर :-

  • सभी प्रकार के रोगों को ठीक करने की शक्ति शरीर में ही मौजूद होती है।
  • थकान, बीमारी, दर्द होने पर तथा तनाव की स्थिति या फिर जल्दबाजी में भोजन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
  • किसी भी रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लेना चाहिए,क्योंकि यह चिकित्सा सर्वाधिक सुरक्षित और स्थायी होती है।
  • भोजन करने से आधा घण्टा पहले पानी पीना चाहिए तथा भोजन करने के कम से कम1 घण्टे के बाद ही पानी पीना चाहिए। भोजन करने के समय में कभी भी पानी नहीं पीना चाहिए।
  • रोगकी अवस्था में उचित भोजन का ही उपयोग करना चाहिए तथा कभी भी ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए जिससे बीमारी का प्रकोप और बढ़ जाए।
  • अच्छा स्वास्थ्य संतुलित भोजन और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है अत: भोजन उतना ही करना चाहिए जितना आवश्यक हो।
  • नशीली चीजें, तम्बाकू, शराब तथा अन्य विषैले पदार्थों का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों से स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
  • स्वस्थ रहने के लिए प्रतिदिन दिन में 10 से 12 गिलास पानी पीना चाहिए।
  • रातके भोजन और सोने के बीच में कम से कम 3 घण्टे का अन्तर रखना चाहिए इस से स्वास्थ्य सही रहता है।
  • धनसे दवाई खरीदी जा सकती है स्वास्थ्य नहीं यह ध्यान रखना चाहिए।
  • चाय, कॉफी का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
  • अनुशासित जीवन आपको दीर्घजीवी और खुशहाल बनाता है अत: अपने जीवन मेंअनुशासित रूप अपनाना चाहिए।
  • परिवर्तन संसार का नियम है इसलिए इसके साथ-साथ छेड़-छाड़ नहीं करनी चाहिए।
  • शरीर, मस्तिष्क व आत्मा को शुद्ध रखने के लिए योग सबसे आसन तरीका है। इसलिएअपने जीवन में योग का अच्छी तरह से इस्तेमाल करना चाहिए।
  • किसीभी रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा और योग एक ही गाड़ी के 2पहिए हैं।
  • रोगको ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा पर विश्वास करना बहुत ही आवश्यकहै। इसके फलस्वरूप रोग जल्द ही ठीक हो जाता है।
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Satsang

नासमझी है दुःखों का घर 


hami se hai jaman 382

 

कुछ वर्ष पहले की बात हैः किसी व्यक्ति ने आकर मुझसे कहाः “बापू ! इतने सारे लोग भजन कर रहे हैं, एक मैं नहीं करूँ तो क्या घाटा होगा ? मुझे मुक्ति नहीं चाहिए।”
उसकी बात सुनकर मुझे हँसी आयी क्योंकि वह सरलता से बोल रहा था। मैंने कहाः “अच्छा, मुक्ति नहीं चाहिए किन्तु सुख तो चाहते हो न ? परेशानियाँ तो मिटाना चाहते हो न ?”
उसने कहाः “जी।”
“तो फिर हमारे ये सारे प्रयास किसलिये हैं ? हम कहाँ कहते हैं कि तुम मोक्ष पा लो। हम तो यही चाहते हैं कि तुम्हारी परेशानियाँ मिट जायें और परेशानी मिटाना ही तो मोक्ष है। छोटी परेशानी मिटाने में कम मेहनत है, बड़ी परेशानी के लिये ज्यादा, जन्म-मरण की परेशानी मिटाने के लिए आत्मज्ञान की मेहनत करनी पड़ती है।”
यदि थोड़ी-थोड़ी परेशानियों, दुःखों, बंधनों से थोड़ समय के लिए छूटना चाहते हो तो थोड़ा ज्ञान, थोड़ा पुरुषार्थ और थोड़ा सुख ही काफी है और यदि सदा मुक्ति चाहिए, पूर्ण निर्दुःख, पूर्ण निर्बन्ध, पूर्ण सुख चाहिए तो पूर्ण ज्ञान के लिए पूर्ण पुरुषार्थ करना ही चाहिए।
दुःख कोई नहीं चाहता। मुक्ति नहीं चाहते तो क्या बंधन चाहते हो ? तुम्हें कोई जेल में डाल दे, कोई तुम्हारे पर आदेश चलाये, पत्नी तुम्हें आँखें दिखाये तो क्या तुम्हें अच्छा लगता है ? नहीं, क्योंकि तुम स्वतंत्रता चाहते हो, मुक्ति चाहते हो और मुक्ति पानी है तो फिर ध्यान भजन, जप, सेवा-स्वाध्याय भी करना पड़ेगा। मुक्ति की मंजिल तक पहुँचना है तो उसकी राह पर तो चलना ही होगा।
अनेकों को ऐसा लगता है कि ʹभाई ! हममें तो भगवान के रास्ते चलने की ताकत नहीं है, हमें ज्ञान नहीं चाहिए….ʹ ज्ञान नहीं चाहिए, मुक्ति नहीं चाहिए तो क्या मुसीबतें चाहिए ? दुःख चाहिए ? यह तो नासमझी है। आदमी तमोगुण में आ जाता है तब कहता है कि ʹहमें ईश्वर से क्या लेना देना ? संत-वंत कुछ नहीं, पुण्य-वुण्य कुछ नहीं।ʹ तो पाप करके भी तो तुम सुख ही चाहते हो न ? यदि पाप करने में सुख होता तो सभी पापी आज मजे में ही होते, अशान्त और दुःखी न होते और मरने के  बाद प्रेत या पशु होकर न भटकते, मुक्त हो जाते, शाश्वत स्वरूप से एक हो जाते।
सुख पाप में नहीं, सुख वासना में नहीं, सुख इच्छाओं की पूर्ति में नहीं वरन् सुख है मुक्ति में, सुख है मुक्ति पाये हुए ब्रह्मवेत्ताओं के श्रीचरणों में। इच्छा वासना की निवृत्ति में परम सुख है।
मैंने सुना है। एक बार हनुमानप्रसाद पोद्दार और जयदयाल गोयन्द का आपस में चर्चा कर रहे थेः “आजकल तो कहलाने लगे बड़े ज्ञानी, बड़े संन्यासी… पहले लोग कितना-कितना तप करते थे। इन्द्र ने 108 वर्ष तक ब्रह्माजी की सेवा की, तब ब्रह्मज्ञान मिला। और आज…? घर छोड़कर बन गये साधु-संन्यासी और लिख देंगेः 1008 स्वामी फलानानंद जी…”
तब एक किसान ने उठकर पोद्दार जी से कहाः “भाई जी ! 108 वर्ष तक इन्द्र ने ब्रह्मा जी की सेवा की, तब ज्ञान मिला, तो 108 वर्ष देवताओं के कि मनुष्य के 108 वर्ष ? अगर देवताओं के वर्ष गिनते हो तो उनकी आयुष्य तो 100 वर्ष से अधिक नहीं होती और अगर मनुष्य के 108 वर्ष गिनते हो तो देवताओं के 108 दिन से अधिक नहीं होते।”
तब हनुमानप्रसाद पोद्दार को हुआ कि किसान के वेष में भी ये कोई पहुँचे हुए महात्मा लगते हैं। उनकी सात्त्विक श्रद्धा थी न !
एक बार पोद्दार जी के मुख से निकल गयाः “जो मिर्ची का अचार नहीं छोड़ सकते, जो चाय नहीं छोड़ सकते, जो दो वक्त का भोजन नहीं छोड़ सकते, वे ब्रह्मज्ञान कैसे पा सकते हैं ?”
पहले वे इस प्रकार की आलोचना किया करते थे। साधना काल में इस प्रकार का कभी हो जाता है उऩकी इस बात को अखंडानंद सरस्वतीजी ने सुन लिया। वे भिक्षा लेने पोद्दार जी के घर। उनकी धर्मपत्नी ने बड़े प्रेम से भिक्षा दी। तब अखंडानंदजी ने कहाः “बहन जी ! मिर्ची का अचार है ?”
धर्मपत्नी ने कहाः “हाँ महाराज है।”
“अच्छा, तो दो-तीन टुकड़े दे दो।”
धर्मपत्नी ने अचार दिया। तब पुनः अखंडानंदजी बोलेः “बहन जी ! भाई जी घर पर हैं ?”
“जी हाँ महाराज ! भीतर के कक्ष में कुछ लेखन कार्य कर रहे हैं।”
“अच्छा ! जरा भाई जी को बुलाना।”
भाई जी बाहर आये और आकर प्रेम व श्रद्धा से प्रणाम कियाः “महाराज ! ૐ नमो नारायणाय।”
अखंडानंद जीः ૐ नमो नारायणाय। सेठजी ! आपने प्रवचन में कहा थाः ʹअचार चाहिए, खिचड़ी चाहिए, चाय चाहिए… जो ʹचाहिए-चाहिएʹ में लगे हैं और अपने को ब्रह्मज्ञानी मानते हैं वे क्या ब्रह्मज्ञानी होते हैं ? जो दो समय का भोजन नहीं छोड़ सकते, वे क्या ब्रह्मज्ञान पा सकते हैं ?ʹ
….. तो जिन्हें वास्तव में ब्रह्म परमात्मा का अनुभव हो गया है उनके लिए सेठजी ! मैं पूछता हूँ कि कमबख्त दो मिर्चियाँ, क्या उऩकी ब्रह्मनिष्ठा के स्वाद को कम कर देगी ? क्या अचार की ये दो मिर्चियाँ उऩके परमात्मज्ञान के रस को छीन लेगी ?”
तब हनुमानप्रसाद पोद्दार जी हाथ जोड़ते हुए बोलेः “महाराज ! क्षमा कीजिए। आप जैसों के आगे तो हम नतमस्तक हैं।”
जिनको ब्रह्म-परमात्मा का अनुभव हो गया है उनके लिए मिर्ची का अचार तो क्या, छप्पन पकवान तो क्या देवताओं के भोग भी नीरस हैं। वे उनको आसक्त नहीं कर सकते। ऐसे दिव्य ब्रह्मज्ञान के रस का वे आस्वाद कर चुके होते हैं कि जिसके आगे ब्रह्मलोक के सुख तक फीके पड़ जाते हैं तो मनुष्य लोक के तुच्छ में वे क्या आसक्त होंगे ? जिनको आत्मा-परमात्मा का शुद्ध अनुभव हो जाता है, उनके लिए संसार के सुख-दुःख, ऊँचाई-नीचाई कोई मायने नहीं रखती क्योंकि उऩ्होंने अपने शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप को जान लिया है।

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Tatvik Satsang

मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ |


प्रसिद्ध ऋषि भृगु के मन में जिज्ञासा उठी कि ब्रह्म को जाना जाये — ब्रह्म को समझा जाये। उनके पिता वरुण जी वेदों को जानने वाले ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष थे। भृगुजी ने अपने ब्रह्मज्ञानी पिता वरुण जी से प्रार्थना की — “भगवन, मैं ब्रह्म को जानना चाहता हूँ, अतेव आप कृपा कर के मुझे ब्रह्म का अर्थ समझाइये।”

 वरुण जी ने भृगु से कहा, “तातन्न अन्न, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, मन और वाणी —  ये सब ब्रह्म की उपलब्धि के द्वार हैं। इन सब में ब्रह्म की सत्ता स्फ-रित हो रही है।” फिर साथ में यह भी बताया कि सब प्रत्यक्ष दिखने वाले प्राणी जिस से उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिसके सहारे जीते हैं, तथा प्रयाण करते हुए जिस में विलीन हो जाते हैं, वही ब्रह्म है।

भृगु जी कुछ समझ नहीं पाये। उन्होंने वरुण जी से विस्तार पूर्वक समझाने की विनती की।

“मेरे समझाने से कुछ नहीं होगा”, वरुण जी बोले, “यह तुम्हें स्वयं ही समझना होगा। जाओ,तपस्या करो और स्वयं जानो इसका अर्थ।”

भृगु जी ने निष्ठापूर्वक पिता के कथन पर विचार किया, मनन किया। यही उनका तप था।

मनन के बाद भृगु जी इस निश्चय पर पहुँचे कि अन्न ही ब्रह्म है। उन्हें अन्न में वे सारे लक्षण नजर आये जो पिता जी ने बताये थे —

समस्त प्राणी अन्न से ही (अन्न के परिणार्मभूत वीर्य से) उत्पन्न होते हैं, अन्न खा कर ही जीवित रहते हैं और मरणोपरान्त अन्न देने वाली पृथ्वी में ही प्रविष्ट हो जाते हैं।

लेकिन वरुण जी ने भृगु महाराज के इस निश्चय का समर्थन नहीं किया। वे जानते थे कि पुत्र ने ब्रह्म के स्थूल रूप को ही समझा है। ब्रह्म के वास्तविक रूप तक उसकी बुद्धि अभी हीं पहुँची है।

भृगु जी ने फिर प्रार्थना की, “भगवन्! यदि मैं ठीक नहीं समझा तो आप ही मुझे ब्रह्मतत्त्व समझाइये।” लेकिन वरुण जी नहीं माने। उन्होंने कहा, “तू तप के द्वारा ब्रह्म को समझने की कोशिश कर। तेरा तप ब्रह्म का बोध कराने में सर्वथा समर्थ है।”

पिता की आज्ञा पाकर भृगु जी ने फिर तप शुरू किया। इस बार उन्होंने निश्चय किया —

प्राण ही ब्रह्म है।

लेकिन इस बार भी वरुण जी ने न तो उनके निश्चय का समर्थन किया और न ही उसे ब्रह्म का अर्थ समझाया।

“तुम्हारा तप ही ब्रह्म की प्राप्ति का साधन है।” — ऐसा कह कर उन्होंने भृगु जी को फिर से तपस्या करने के लिए कहा।

अगली दो बार भृगु जी के निश्चय थे —

मन ही ब्रह्म है।

विज्ञान ही ब्रह्म है।

लेकिन वरुण जी ने इन दोनों का भी समर्थन नहीं किया। उन्होंने सोचा — इस बार बेटा ब्रह्म के निकट आ गया है। उसका विचार स्थूल और सूक्ष्म दोनों जड़ तत्त्वों से ऊपर उठ कर चेतन तक तो पहुँच गया है, किन्तु ब्रह्म का स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है। इसे अभी और तपस्या की आवश्यकता है।

जब इस बार भी भृगु जी के निश्चय को समर्थन नहीं मिला तो वे पुनः तप करने चले गये।

पाँचवीं बार भृगु जी ने अन्तिम रूप से निश्चर्यपूर्वक जाना—

आनन्द ही ब्रह्म है।

सचमुच में आनन्द से ही सारे प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनन्द के सहारे ही वे जीते हैं, तथा इस लोक से प्रयाण करते हुए अन्त में आनन्द में ही विलीन हो जाते हैं।

इस प्रकार जान लेने पर भृगु जी को ब्रह्म का पूरा ज्ञान हो गया। तब से भृगु महाराज ब्रह्मज्ञानी कहलाने लगे।

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राजा हरिचन्द्र की कीर्ति


 

 

राजा हरिचन्द्र को सत्यवती राजा कहा जाता है| वह बहुत ही दानी पुरुष था| पौराणिक ग्रन्थों में भी उसकी कथा आती है| उन में लिखा है कि वह त्रिशुंक का पुत्र था| जो भी वचन करता था उस का पालन किया करता था| सत्य, दान, कर्म तथा स्नान का पाबंद था| उसकी भूल को देवता भी ढूंढ नहीं सकते थे| एक दिन उनके पास नारद मुनि आ गए| राजा ने उनकी बहुत सेवा की| देवर्षि नारद राजा की सारी नगरी में घूमे| नारद ने देखा कि राजधानी में कहीं भी राजा की निंदा सुनने में न आई|

राजा हरिचन्द्र के राज भवन से निकलकर प्रभु के गुण गाते हुए नारद इन्द्र लोक में जा पहुंचे| तीनों लोकों में नारद मुनि का आदर होता था| वह त्रिकालदर्शी थे| पर यदि मन में आए तो कोई न कोई खेल रचने में भी गुरु थे| किसी से कोई ऐसी बात कहनी कि जिससे उसको भ्रम हो जाए तथा जब वह दूसरे से निपट न ले, उतनी देर आराम से न बैठे| ऐसा ही उनका आचरण था|

इन्द्र-हे मुनि वर! जरा यह तो बताओ कि मृत्यु-लोक में कैसा हाल है जीवों का, स्त्री-पुरुष कैसे रहते हैं?

नारद मुनि-मृत्यु-लोक पर धर्म-कर्म का प्रभाव पड़ रहा है| पुण्य, दान, होम यज्ञ होते हैं| स्त्री-पुरुष खुशी से रहते हैं| कोई किसी को तंग नहीं करता| अन्न, जल, दूध, घी बेअंत है| वासना का भी बहुत प्रभाव है| गायों की पालना होती है| घास बहुत होता है, वनस्पति झूमती है| ब्राह्मण सुख का जीवन व्यतीत कर रहे हैं|

इन्द्र-हे मुनि देव! ऐसे भला कैसे हो सकता है? ऐसा तो हो ही नहीं सकता| ऐसा तभी हो सकता है यदि कोई राजा भला हो, राजा के कर्मचारी भले हो| पर मृत्यु-लोक के राजा भले नहीं हो सकते, कोई न कोई कमी जरूर होती है|

नारद ‘मुनि-ठीक है!’ मृत्यु-लोक पर राजा हरीशचंद्र है| वह चक्रवती राजा बन गया है| वह दान-पुण्य करता है, ब्राह्मणों को गाय देता है तथा अगर कोई जरूरत मंद आए तो उसकी जरूरत पूरी करता है, सत्यवादी राजा है| वह कभी झूठ नहीं बोलता| होम यज्ञ होते रहते हैं| राजा नेक और धर्मी होने के कारण प्रजा भी ऐसी ही है| हे इन्द्र! एक बार उसकी नगरी में जाने पर स्वर्ग का भ्रम होता है| वापिस आने को जी नहीं चाहता, सर्वकला सम्पूर्ण है| रिद्धियां-सिद्धियां उसके चरणों में हैं|

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